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वै॒श्वा॒न॒रो म॑हि॒म्ना वि॒श्वकृ॑ष्टिर्भ॒रद्वा॑जेषु यज॒तो वि॒भावा॑। शा॒त॒व॒ने॒ये श॒तिनी॑भिर॒ग्निः पु॑रुणी॒थे ज॑रते सू॒नृता॑वान् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vaiśvānaro mahimnā viśvakṛṣṭir bharadvājeṣu yajato vibhāvā | śātavaneye śatinībhir agniḥ puruṇīthe jarate sūnṛtāvān ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वै॒श्वा॒न॒रः। म॒हि॒म्ना। वि॒श्वऽकृ॑ष्टिः। भ॒रत्ऽवा॑जेषु। य॒ज॒तः। वि॒भाऽवा॑। शा॒त॒ऽव॒ने॒ये। श॒तिनी॑भिः। अ॒ग्निः। पु॒रु॒ऽनी॒थे। ज॒र॒ते॒। सू॒नृता॑ऽवान् ॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:59» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:25» मन्त्र:7 | मण्डल:1» अनुवाक:11» मन्त्र:7


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर अगले मन्त्र में ईश्वर के गुणों का उपदेश किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो (विश्वकृष्टीः) सबका उत्पन्नकर्त्ता (यजतः) पूजन के योग्य (विभावा) विशेष करके प्रकाशमान (सूनृतावान्) प्रशंसनीय अन्नादि का आधार (वैश्वानरः) सबको प्राप्त करानेवाला (अग्निः) सूर्य्य के समान जगदीश्वर अपने जगद्रूप (महिम्ना) महिमा के साथ (भरद्वाजेषु) धारण करने वा जानने योग्य पृथिवी आदि पदार्थों में (शतिनीभिः) असंख्यात गतियुक्त क्रियाओं से सहित (पुरुणीथे) बहुत प्राणियों में प्राप्त (शातवनेये) असंख्यात विभागयुक्त क्रियाओं से सिद्ध हुए संसार में वर्त्तता है, उसका जो मनुष्य (जरते) अर्चन पूजन करता है, वह निरन्तर सत्कार को प्राप्त होता है ॥ ७ ॥
भावार्थभाषाः - जो असख्यात पदार्थों में असंख्यात क्रियाओं का हेतु बिजुलीरूप अग्नि के समान ईश्वर है, वही सब जगत् को धारण करता है, उसका पूजन जो मनुष्य करता है, वह सदा महिमा को प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ इस सूक्त में वैश्वानर शब्दार्थ वर्णन से इसके अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शातवनेय के १०० यज्ञ

पदार्थान्वयभाषाः - १. (वैश्वानरः) = सब मनुष्यों का नेतृत्व व पथ - प्रदर्शन करनेवाला (महिम्ना) = अपनी महिमा से (विश्वकृष्टिः) = [विश्वे कृष्टयो यस्य] सब मनुष्यों के परिवारवाला अथवा संसार का निर्माण करनेवाला (भरद्वाजेषु) = अपने में शक्ति का भरण करनेवालों में (यजतः) = यष्टव्य, संगतिकरण - योग्य, अर्थात् सशक्त पुरुषों में वास करनेवाला, (विभावा) = विशिष्ट दीप्तिवाला वह (अग्निः) = अग्रणी प्रभु (सूनृतावान्) = प्रिय - सत्यात्मिका वेदवाणीवाले हैं, हृदयस्थरूपेण सदा प्रिय सत्यवाणी से प्रेरणा प्राप्त कराते रहते हैं । २. ये प्रभु (शातवनेये) = [शातं क्रतून् वनति सम्भजति] सौ - के - सौ वर्ष यज्ञों का सेवन करनेवाले अथवा शत - संख्याक यज्ञों को करनेवाले (पुरुणीथे) = पालक और पूरक है नेतृत्व जिसका ऐसे पुरुष में (शतिनीभिः) = शत वर्ष - पर्यन्त चलनेवाली क्रियाओं से (जरते) = स्तुत होता है, अर्थात् सौ - के - सौ वर्ष क्रियामय जीवन बिताते हुए ये पुरुष उस प्रभु का स्तवन करते है इनका तो जीवन ही क्रियामय हो जाता है और क्रिया के द्वारा ही प्रभु का आराधन होता है, 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य' ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम सौ वर्ष के दीर्घ जीवन को 'शातवनेय' का जीवन बनाएँ । हमारे ये सौ यज्ञ ही प्रभु का आराधन हो जाएँ ।
टिप्पणी: विशेष - सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से होता है कि वे प्रभु अग्नियों के अग्नि हैं [१] । उस देव का दर्शन देव बनकर ही हो सकता है [२] । वे प्रभु सच्चे वसुमान् हैं [३] । उस सत्यशुष्म देव का ही हमारी वाणियाँ स्तवन करें [४] । हम सात्त्विक युद्ध के द्वारा ही देवीसम्पत्ति को प्राप्त करते हैं [५] । प्रभुकृपा से हमारे काम - क्रोध व लोभ का निवारण होता है [६] और हम 'शातवनेय' बनकर शतयज्ञमय जीवन से प्रभु का आराधन करें [७] । आराधन का स्वरूप अगले मन्त्र में कहते हैं -

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरीश्वरगुणा उपदिश्यन्ते ॥

अन्वय:

यो विश्वकृष्टीरुत्पादितवान् यजतो विभावा सूनृतावान् वैश्वानरोऽग्निः सर्वद्योतकः परमात्मा स्वमहिम्ना भरद्वाजेषु शतिनीभिः सह वर्त्तमानः सन् पुरुनीथे शातवनेये वर्तते तं यो जरतेऽर्चति स सत्कारं प्राप्नोति ॥ ७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (वैश्वानरः) सर्वनेता (महिम्ना) स्वप्रभावेण (विश्वकृष्टिः) विश्वाः सर्वाः कृष्टीर्मनुष्यादिकाः प्रजाः (भरद्वाजेषु) ये भरन्ति ते भरतः। वज्यन्ते ज्ञायन्ते यैस्ते वाजा भरतश्च ते वाजाश्च तेषु पृथिव्यादिषु। भरणाद्भारद्वाजः। (निरु०३.१७) (यजतः) यष्टुं सङ्गन्तुमर्हः (विभावा) यो विशेषेण भाति प्रकाशयति सः (शातवनेये) शतान्यसंख्यातानि वनयः सम्भक्तयो येषान्ते शतवनयस्तैर्निर्वृत्ते जगति (शतिनीभिः) शतसंख्याताः प्रशस्ता गतयो यासु क्रियासु ताभिः सह वर्त्तमानः (अग्निः) सूर्य्य इव स्वप्रकाशः (पुरुणीथे) यत्पुरुभिर्बहुभिः प्राणिभिः पदार्थैर्वा नीयते तस्मिन् (जरते) सत्करोति। जरत इत्यर्चतिकर्मसु पठितम्। (निघं०३.१४) (सूनृतावान्) सूनृता अन्नादीनि प्रशस्तानि विद्यन्ते यस्मिन् सः ॥ ७ ॥
भावार्थभाषाः - यो संख्यातेषु पदार्थेष्वसंख्यातक्रियाहेतुर्विद्युदिवेश्वरो वर्तते, स एव सर्वं जगद्धरति यो मनुष्यस्तद्विद्यां जानाति स सततं महीयते ॥ ७ ॥अत्र वैश्वानरशब्दार्थवर्णनादेतत्सूक्तार्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Vaishvanara, lord pervasive and leader of the world of existence, is the lord of world humanity by virtue of His might and grandeur. Among the sources of life sustenance such as earth and showers of rain, He is the light and glory of the man of yajna. Lord of the reality of existence and the word of truth, in the world of hundredfold splendour, Agni is praised and worshipped in a hundred manners in choric songs by the celebrants.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of God are taught in the seventh Mantra.

अन्वय:

He who worships or glorifies God-Creator of all men, most Adorable Unifier and Leader of all, Illuminator of all by His Greatness, who is present in earth and other worlds which uphold all beings and are to be known, consisting of innumerable objects and along with numberless admirable processes. He is the Lord of good corns and other articles, in whom all take their shelter.

पदार्थान्वयभाषाः - ( भरद्वाजेषु ) ये भरन्ति ते भरताः । वज्यन्ते ज्ञायन्ते ये ते वाजा: । भरतश्च ते वाजाश्च तेषु पृथिव्यादिषु भरणाद् भरद्वाज: (निघ० ३.१७) = The earth and other worlds which uphold many beings and which are to be known. ( शातवनये ) शतानि असंख्यातानि वनयः संभक्तयः येषां ते शतवनयः तैर्निवृते जगति = In the world consisting of hundred of substances. (जरते) सत्करोति जरत इत्यर्चतिकर्मा (निघ० ३.१४) (सूनृतानाम्) सूनृता अन्नादीनि प्रशस्यानि यस्मिन् सः = He who is the Master of food materials, सूनृता इत्यन्ननाम [निघ० २.७]
भावार्थभाषाः - God who is present like electricity in innumerable substances and is the cause of numberless acts and movements, upholds the entire world. He who knows the Science of God, is worshipped of respected by all.
टिप्पणी: In this hymn God and His devotees have been mentioned as Vaishwanara, so it has connection with the previous hymn. Here ends the commentary on the fifty-ninth hymn of the 1st Mandala of the Rigveda Sanhita.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - असंख्य पदार्थांमध्ये असंख्य क्रियांचा हेतू असलेल्या विद्युतरूपी अग्नीप्रमाणे ईश्वर असतो, तोच सर्व जगाचे धारण करतो. जो माणूस त्याची पूजा करतो त्याचा महिमा सदैव वाढतो. ॥ ७ ॥