वांछित मन्त्र चुनें
760 बार पढ़ा गया

आ सूर्ये॒ न र॒श्मयो॑ ध्रु॒वासो॑ वैश्वान॒रे द॑धिरे॒ऽग्ना वसू॑नि। या पर्व॑ते॒ष्वोष॑धीष्व॒प्सु या मानु॑षे॒ष्वसि॒ तस्य॒ राजा॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā sūrye na raśmayo dhruvāso vaiśvānare dadhire gnā vasūni | yā parvateṣv oṣadhīṣv apsu yā mānuṣeṣv asi tasya rājā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। सूर्ये॑। न। र॒श्मयः॑। ध्रु॒वासः॑। वै॒श्वा॒न॒रे। द॒धि॒रे॒। अ॒ग्ना। वसू॑नि। या। पर्व॑तेषु। ओष॑धीषु। अ॒प्ऽसु। या। मानु॑षेषु। अ॒सि॒। तस्य॑। राजा॑ ॥

760 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:59» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:25» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:11» मन्त्र:3


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे जगदीश्वर ! जिस इस द्रव्यसमूह जगत् के आप (राजा) प्रकाशक (असि) हैं (तस्य) उस के मध्य में (या) जो (पर्वतेषु) पर्वतों में (या) जो (ओषधीषु) ओषधियों में जो (अप्सु) जलों में और (मानुषेषु) जो मनुष्यों में वसूनि द्रव्य हैं, उन सबको (सूर्ये) सवितृलोक में (रश्मयः) किरणों के (न) समान (अग्ना) (वैश्वानरे) आप में (ध्रुवासः) निश्चल प्रजाओं को विद्वान् लोग (आ दधिरे) धारण कराते हैं ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। तथा पूर्व मन्त्र से (देवासः) इस पद की अनुवृत्ति आती है। मनुष्यों को योग्य है कि जैसे प्राणी लोग प्रकाशमान सूर्य के विद्यमान होने में सब कार्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे मनुष्यों को उपासना किये हुए जगदीश्वर में सब कार्यों को सिद्ध करना चाहिये। इसी प्रकार करते हुए मनुष्यों को कभी सुख और धन का नाश होकर दुःख वा दरिद्रता उत्पन्न नहीं होते ॥ ३ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वसुमान् [प्रभु]

पदार्थान्वयभाषाः - १. (न) = जैसे (आ रश्मयः) = ये चारों ओर वर्तमान रश्मियाँ सूर्य - सूर्य में (ध्रुवासः) = ध्रुव होकर स्थापित हैं, जैसे सूर्य से ये किरणें पृथक् नहीं की जा सकतीं, उसी प्रकार (वैश्वानरे) = मानवमात्र के हितकारी सर्व अग्रणी प्रभु में (वसूनि) = सब धन - निवास के लिए आवश्यक तत्त्व (आदधिरे) = स्थापित हैं । प्रभु से वसुओं को अलग नहीं किया जा सकता । २. (या) = जो वसु (पर्वतेषु) = पर्वतों में स्थित हैं, जो वसु (ओषधिषु) = ओषधियों में विद्यमान हैं, या (अप्सु) = जो वसु जलों में वर्तमान हैं अथवा (मानुषेषु) = जो धन मनुष्यों के पास हैं (तस्य राजा असि) = उस सबके राजा आप ही हो । उस - उस पदार्थ में स्थित वसु के उस - उसमें स्थापित करनेवाले आप ही हैं । सब वसुओं का अधिपति प्रभु ही है । प्रभु से ही अन्यत्र वसु प्राप्त कराये जाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु वसुमान् हैं, वसुमान प्रभु से हमें भी वसु प्राप्त होते हैं ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे जगदीश्वर ! यस्यास्य जगतस्त्वं राजाऽसि तस्य मध्ये या पर्वतेषु यौषधीषु याऽप्सु यानि मानुषेषु वसूनि वर्त्तन्ते, तानि सर्वाणि सूर्ये रश्मयो नेव वैश्वानरेऽग्ना त्वयि सति ध्रुवासः प्रजाः सर्वे देवास आदधिरे धरन्ति ॥ ३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आ) समन्तात् (सूर्ये) सवितृमण्डले (न) इव (रश्मयः) किरणा (ध्रुवासः) निश्चलाः (वैश्वानरे) जगदीश्वरे (दधिरे) धरन्ति (अग्ना) विद्युदिव वर्त्तमाने। अत्र सुपां सुलुग्० इति डादेशः। (वसूनि) सर्वाणि द्रव्याणि (या) यानि (पर्वतेषु) शैलेषु (ओषधीषु) यवादिषु (अप्सु) जलेषु (या) यानि (मानुषेषु) मानवेषु (असि) (तस्य) द्रव्यसमूहस्य जगतः (राजा) प्रकाशकः ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। अत्र पूर्वस्मान्मन्त्राद्देवास इति पदमनुवर्त्तते। मनुष्यैर्यथा प्रकाशमाने सूर्ये विद्यमाने सति कार्याणि निर्वर्त्तन्ते तथैवोपासिते जगदीश्वरे सर्वाणि कार्याणि सिध्यन्ति। एव कुर्वन्नृणां नैव कदाचित् सुखधननाशो दुःखदारिद्र्ये चोपजायेते ॥ ३ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as the sun-rays abide in the sun, so do the stars and planets and the Vasus, abodes of life, abide in Vaishvanara Agni, self-existent power and force of the universe. Lord supreme, whatever wealth and vitality is there in mountains, herbs, waters and humanity, you are the ruler and ordainer of it all.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

O God, Thou art the Sovereign of all this Universe. Thou art the Lord of all objects that exist in the mountains, in the herbs, in the waters or treasures amongst men. All these objects are established in Thee like the permanent rays of light in the sun. All enlightened persons relying upon Thee, uphold the subjects.

पदार्थान्वयभाषाः - ( वसूनि) सर्वाणि द्रव्याणि = All objects.
भावार्थभाषाः - Men should know that as in the light of the Sun, all works are well-accomplished, in the same way, all acts are accomplished well when God is earnestly and sincerely worshipped. Those who thus adore the Lord in right earnest, never lose happiness and wealth. They never feel misery and poverty.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. पूर्वमंत्राने (देवासः) या पदाची अनुवृत्ती होते. जसे प्रकाशमान सूर्यामुळे प्राणी सर्व कार्य सिद्ध करतात. तसे माणसांनी उपासना केलेल्या जगदीश्वरात सर्व कार्य सिद्ध केले पाहिजे. याप्रकारे वागल्यास माणसांच्या सुखाचा व धनाचा नाश होणार नाही, दुःख व दारिद्र्य उत्पन्न होणार नाही. ॥ ३ ॥