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य उ॒दृची॑न्द्र दे॒वगो॑पाः॒ सखा॑यस्ते शि॒वत॑मा॒ असा॑म। त्वां स्तो॑षाम॒ त्वया॑ सु॒वीरा॒ द्राघी॑य॒ आयुः॑ प्रत॒रं दधा॑नाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya udṛcīndra devagopāḥ sakhāyas te śivatamā asāma | tvāṁ stoṣāma tvayā suvīrā drāghīya āyuḥ prataraṁ dadhānāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ये। उ॒त्ऽऋचि॑। इ॒न्द्र॒। दे॒वऽगो॑पाः। सखा॑यः। ते॒। शि॒वऽत॑माः। असा॑म। त्वाम्। स्तो॒षा॒म॒। त्वया॑। सु॒ऽवीराः॑। द्राघी॑यः। आयुः॑। प्र॒ऽत॒रम्। दधा॑नाः ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:53» मन्त्र:11 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:16» मन्त्र:6 | मण्डल:1» अनुवाक:10» मन्त्र:11


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर ये लोग परस्पर कैसे वर्त्तें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्र) सभासेनाध्यक्ष ! (ते) आप के (देवगोपाः) रक्षक विद्वान् वा दिव्य गुण कर्मों की रक्षा करने (शिवतमाः) अतिशय करके कल्याण लक्षणयुक्त (सखायः) परस्पर मित्र हम लोग (असाम) होवें (त्वया) आपके साथ रक्षा वा शिक्षा किये (सुवीराः) उत्तम वीरयुक्त (अतरम्) दुःख दूर करते (द्राघीयः) अत्यन्त विस्तारयुक्त सौ वर्ष से अधिक (आयुः) उमर को (दधानाः) धारण करके (उदृचि) उत्तम ऋचा युक्त अध्ययन व्यवहार में (त्वाम्) शुभलक्षणयुक्त आप के (स्तोषाम) गुणों का कीर्त्तन करें ॥ ११ ॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्यों को परस्पर निश्चित मैत्री, सब स्त्री पुरुषों को उत्तम विद्या युक्त जितेन्द्रियपन आदि गुणों को ग्रहण कर और कराके पूर्ण आयु का भोग करना चाहिये ॥ ११ ॥ इस सूक्त में विद्वान् सभाध्यक्ष तथा प्रजा के पुरुषों को परस्पर प्रीति से वर्त्तमान रहकर सुख को प्राप्त करना कहा है। इससे सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विज्ञान का अध्ययन

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (ये) = जो हम (उदृचि) = 'उत्कृष्टा ऋचो यस्मिन्नध्ययने दया.' उत्कृष्ट ऋचाओंवाले अध्ययन में, अर्थात् विज्ञान का उत्तम अध्ययन करते हुए (देवगोपाः) = [देवा गोपा येषाम्] सूर्यादि देवों को अपना रक्षक बनानेवाले (ते सखायः) = आपके मित्र, (शिवतमाः) = अत्यन्त कल्याणमय स्थितिवाले (असाम) = हों । प्रभु के बनाये हुए इस संसार को समझने के लिए विज्ञान का अध्ययन आवश्यक है । यही बात यहाँ 'उदृचि' शब्द से स्पष्ट की गई है । विज्ञान का अध्ययन ठीक से होने पर ये सब प्राकृतिक शक्तियाँ हमारा कल्याण - ही - कल्याण करनेवाली होती हैं । इनका ठीक उपयोग करनेवाले हम प्रभु के सच्चे मित्र बनते हैं और शिवतम स्थिति को प्राप्त करते हैं । २. उस समय हमें इन रचनाओं में प्रभु की महत्ता का अनुभव होने लगता है और हम हे प्रभो ! (त्वां स्तोषाम) = आपका स्तवन करते हैं । (त्वया सवीराः) = आपके सम्पर्क में आने से हम उत्तम वीर बनते हैं और (द्राघीयः) = दीर्घ तथा (प्रतरम्) = उत्कृष्ट (आयुः) = जीवन को (दधानाः) = धारण करनेवाले होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम विज्ञान द्वारा सूर्यादि देवों को समझें । इनके ठीक प्रयोग से कल्याण को सिद्ध करें । इनमें प्रभु - महिमा को देखकर प्रभुस्तवन करते हुए प्रभु - सम्पर्क से वीर बनें तथा दीर्घ व उत्कृष्ट जीवन को धारण करें ।
टिप्पणी: विशेष - सूक्त का आरम्भ इस प्रकार है कि हम पुरुषार्थ से धनार्जन कर दान देनेवाले हों [१] । वस्तुतः सब धनों के स्वामी व दाता प्रभु ही हैं [२] प्रभुभक्तों को किसी प्रकार की कमी नहीं रहती [३] । अमति व द्वेष को दूर करके हम उत्कृष्ट जीवनवाले बनें [४] । हम सम्पत्ति, शक्ति व सुमति को प्राप्त करें [५] । मनः प्रसाद, हितकर कार्यों तथा सोमरक्षण से हम प्रभु को प्रसन्न करें [६] | अंहकार को जीतें [७] । पर - पीड़न, चौर्य व कुटिल कार्यों से बचें [८] । शतशः प्रवाहोंवाली वासना - सरित् को तरें [९] । अपने को प्रभु द्वारा रक्षण का पात्र बनाएँ [१०] । विज्ञान के अध्ययन से देवों को अपना रक्षक बनाएँ और प्रभु के भक्त बनें [११] । प्रभु हमारा रक्षण करेंगे -
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरेते परस्परं कथं वर्त्तेरन्नित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे इन्द्र ! ते तव देवगोपाः शिवतमाः सखायो वयमसाम भवेम त्वया रक्षिताः सुवीराः प्रतरं द्राघीय आयुर्दधानाः सन्तो वयमुदृचि त्वां स्तोषाम ॥ ११ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ये) वक्ष्यमाणलक्षणा वयम् (उदृचि) उत्कृष्टा ऋचो यस्मिन्नध्ययने तस्मिन् (इन्द्र) सभाद्यध्यक्षं (देवगोपाः) देवा विद्वांसो गोपा रक्षका येषान्ते। यद्वा ये देवानां दिव्यानां गुणानां कर्मणां वा गोपा रक्षकास्ते (सखायः) परस्परं सुहृदः सन्तः (ते) तव (शिवतमाः) अतिशयेन शिवाः कल्याणकारकं कर्म कुर्वन्तः कारयन्तश्च (असाम) भवेम (त्वाम्) शुभलक्षणम् (स्तोषाम) गुणान् कीर्त्तयेम (त्वया) रक्षिताः शिक्षिता वा (सुवीराः) शोभनाश्च ते वीराश्च यद्वा सुष्ठु वीरा येषु ते (द्राघीयः) अतिशयेन विस्तीर्णं शताद् वर्षेभ्योऽप्यधिकम् (आयुः) जीवनम् (प्रतरम्) प्रकृष्टया तरति प्लावयति दूरीकरोति दुःखं येन तत् (दधानाः) धरन्तः सन्तः ॥ ११ ॥
भावार्थभाषाः - सर्वैर्मनुष्यैः परस्परं निश्चितां मैत्रीं कृत्वा सर्वान् स्त्रीपुरुषादिजनान् सुविद्यायुक्तान् सम्पाद्य जितेन्द्रियत्वादिगुणान् गृहीत्वा ग्राहयित्वा च पूर्णमायुर्भोक्तव्यम् ॥ ११ ॥ अस्मिन् सूक्ते विद्वत्सभाध्यक्षप्रजापुरुषैः परस्परमित्रभावेन वर्त्तित्वा सर्वदा सुखं प्राप्तव्यमित्युक्तमत एतत्सूक्तार्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति बोध्यम् ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord omnipotent of the world, dedicated as we are to the light of the Rks, we are protected by the divinities. All friends of yours, we pray, may we be at perfect peace in holy comfort and sing in praise of your glory. And by your grace, may we be blest with noble children and live a long, full and happy life.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should they deal with one another is taught in the. 11th verse.

अन्वय:

O Indra (President of the Assembly) may we the protectors of divine virtues and actions or protected by the enlightened truthful persons be thy most auspicious and prosperous friends, doing benevolent deeds and urging upon others to do the same. Thee do we praise through the hymns being noble and brave and enjoying long and happy life that drives away all misery.

भावार्थभाषाः - All men should enjoy fully mature life or ripe old age (of at least a hundred years) being friendly to one another and making all men and women educated, having control over their senses and urging upon others to do the same.
टिप्पणी: In this hymn the duties of the President of the assembly and the people are mentioned as before, so it has connection. with the previous hymn. Here ends the commentary on the fifty-third hymn of the first Mandala of the Rigveda.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सर्व माणसांनी परस्पर निखळ मैत्री, सर्व स्त्री-पुरुषांना उत्तम विद्यायुक्त जितेंद्रियता इत्यादी गुणांचे ग्रहण करून व करवून पूर्ण आयुष्याचा भोग करावा. ॥ ११ ॥