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शुके॑षु मे हरि॒माणं॑ रोप॒णाका॑सु दध्मसि । अथो॑ हारिद्र॒वेषु॑ मे हरि॒माणं॒ नि द॑ध्मसि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śukeṣu me harimāṇaṁ ropaṇākāsu dadhmasi | atho hāridraveṣu me harimāṇaṁ ni dadhmasi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शुके॑षु । मे॒ । ह॒रि॒माण॑म् । रो॒प॒णाका॑सु । द॒ध्म॒सि॒ । अथो॒ इति॑ । हा॒रि॒द्र॒वेषु॑ । मे॒ । ह॒रि॒माण॒म् । नि । द॒ध्म॒सि॒॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:50» मन्त्र:12 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:8» मन्त्र:7 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:12


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - जैसे श्रेष्ठ वैद्य लोग कहें वैसे हम लोग (शुक्रेषु) शुत्रों के समान किये हुए कर्मो और (रोपणाकासु) लेप आदि क्रियाओं से (मे) मेरे (हरिमाणम्) चित्त को खैंचने वाले रोगनाशक ओषधियों को (दध्मसि) धारण करें (अथो) इसके पश्चात् (हारिद्रवेषु) जो सुख हरने मल बहाने वाले रोग हैं उनमें (मे) अपने (हरिमाणम्) हरणशील चित्त को (निदध्मसि) निरन्तर स्थिर करें ॥१२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य लोग लेपनादि क्रियाओं से रोगों का निवारण करके बल को प्राप्त होवें ॥१२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

हरिमा निराकरण

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार सूर्याभिमुख बैठकर ध्यान करते हुए हम (मे हरिमाणम्) = अपनी हरिमा - रोग के कारण उत्पन्न होनेवाली चेहरे की इस प्रीतिमा को (शुकेषु रोपणाकासु) = तोतों व मैनाओं में (दध्मसि) = स्थापित कर सकते हैं । यह पीतिमा [yellowish green colour] तोतों व मैनाओं में ही शोभा देती है । इसका स्थान हमारा चेहरा थोड़े ही है ? २. (अथ) = और अब (मे हरिमाणम्) = हम अपनी इस हरिमा को (हारिद्रवेषु) = हरिताल द्रुम के पत्तों में (निदध्मसि) = निश्चय से स्थापित करते हैं । इस हरिमा का स्थान हरिताल द्रुम ही हैं, मेरे चेहरे का सम्बन्ध इस हरिमा से नहीं है । यह हरिमा वहीं रहे, मुझे पीड़ित करनेवाली न हो । ३. 'शुक' शब्द शिरीष वृक्ष का वाचक भी है और 'हारिद्रव' कदम्ब वृक्ष का । यह भी सम्भव है कि इन वृक्षों के पत्तों आदि का प्रयोग हरिमा रोग को दूर करने के लिए उपयोगी हो । उस समय 'रोपणाका' [Healing application] लेपविशेष की प्रक्रिया का नाम होगा । शिरीष व कदम्ब वृक्षों का लेप - सा बनाकर प्रयोग होना सम्भव है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उचित उपचार से हमारा यह हरिमा रोग दूर हो और हम पुनः कान्ति - सम्पन्न बन पाएँ ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(शुक्रेषु) शुक्रवत्कृतेषु कर्मसु (मे) मम (हरिमाणम्) हरणशीलं रोगम् (रोपणाकासु) रोपणं समन्तात्कामयन्ति तासु क्रियासु लिप्तास्वोषधीषु (दध्मसि) धरेम (अथो) आनन्तर्ये (हारिद्रवेषु) ये हरन्ति द्रवन्ति द्रावयन्ति च तेषामेतेषु (मे) मम (हरिमाणम्) चित्ताकर्षकं व्याधिम् (नि) नितराम् (दध्मसि) स्थापयेम ॥१२॥

अन्वय:

पुनस्ते किं कुर्य्युरित्याह इत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - यथा सद्वैद्या ब्रूयुस्तथा वयं शुक्रेषु रोपणाकासु मे हरिमाणं दध्मस्यथो हारिद्रवेषु मे मम हिरमाणं निदध्मसि ॥१२॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। मनुष्या लेपनादिक्रियाभिः सर्वान्रोगान्निवार्य बलं प्राप्नुवन्तु ॥१२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Our consumptive and bilious diseases we attribute to abuse, fear, infatuation, schizophrenia, infect any severe mental disturbance, and for cure we assign these to green and yellow birds, and green and yellow fluids, soma, sandal, acasia sirissa and turmeric, and close it with cicatrix.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

We put our disease which takes away all happiness in parrot like actions i.e. taking various fruits and walking in regions full of trees and in herbs which strengthen us and ointments etc. which take away pain. We also put them in substances that take away diseases and are liquid.

पदार्थान्वयभाषाः - (शुकेषु ) शुक्रवत् कृतेषु कर्मसु = In parrot-like actions as explained above. ( रोपणाकासु ) रोपणं समन्तात् कामयन्ते तासु क्रियासु लिप्तासु ओषधीषु = Ointments and other medicines. ( हारिद्रवेषु ) ये हरन्ति द्रवन्ति द्रावयन्ति च = Which take away pain and disease. Other translators simply translate the Mantra as 'let us transfer the yellowness (of my body) to the parrots, to the starlings, or to the Haritala trees.' (Wilson). “To parrots and to starlings let us give away my yellowness or this my yellowness let us transfer to Haritala trees" (Griffith). But there is not much sense in it शुक, रोपणाका and हारिद्रव seem to indicate a group of herbs, medicines and trees by the proper use of which heart disease, jaundice and other diseases may be checked and cured according to the Ayurvedic literature. In the Atharva Veda the reading in the text is सुक instead of शुक which means that which gives pleasure well.
भावार्थभाषाः - Men should get rid of all diseases and acquire strength by adopting necessary means, using fruits, herbs and ointments etc.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी लेप इत्यादी क्रियांनी रोगांचे निवारण करून बल प्राप्त करावे. ॥ १२ ॥