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उ॒वासो॒षा उ॒च्छाच्च॒ नु दे॒वी जी॒रा रथा॑नाम् । ये अ॑स्या आ॒चर॑णेषु दध्रि॒रे स॑मु॒द्रे न श्र॑व॒स्यवः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uvāsoṣā ucchāc ca nu devī jīrā rathānām | ye asyā ācaraṇeṣu dadhrire samudre na śravasyavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒वास॑ । उ॒षाः । उ॒च्छात् । च॒ । नु । दे॒वी । जी॒रा । रथा॑नाम् । ये । अ॒स्याः॒ । आ॒चर॑णेषु । द॒ध्रि॒रे । स॒मु॒द्रे । न । श्र॒व॒स्यवः॑॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:48» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:3» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:3


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसी हो, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - जो स्त्री उषा के समान (जीरा) वेगयुक्त (देवी) सुख देने वाली (रथानाम्) आनन्ददायक यानों के (उषास) वसती है (ये) जो (अस्याः) इस सती स्त्री के (आचरणेषु) धर्म्म युक्त आचरणों में (समुद्रेन) जैसे सागर में (श्रवस्यवः) अपने आप विद्या के सुनने वाले विद्वान् लोग उत्तम नौका से जाते आते हैं वैसे (दध्रिरे) प्रीति को धरते हैं वे पुरुष अत्यन्त आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में उपमालंकार है। जिसको अपने समान विदुषी पंडिता और सर्वथा अनुकूल स्त्री मिलती है वह सुख को प्राप्त होता है और नहीं ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु - प्रेम न कि धनासक्ति

पदार्थान्वयभाषाः - १. (उषाः) = उषः काल ने (उवास) = आज तक भी अन्धकार को दूर किया है (च नु) = और अब भी (देवी) = प्रकाशयुक्त उषः काल (उच्छात्) = अन्धकार को नष्ट करती है । २. यह उषः काल (रथानां जीरा) = रथों की प्रेरक है । उषः के होते ही हमारे शरीररूपी रथ कार्यों में प्रवृत्त होते हैं । ३. (ये) = जो भी व्यक्ति (अस्याः) = इस उषः काल के (आचरणेषु) = समन्तात् गति करने पर (दध्रिरे) = अपनी इन्द्रियों व मन का धारण करते हैं, अर्थात् चित्तवृत्ति - निरोधरूप योग में प्रवृत्त होते हैं, वे (समुद्रे) = [स मुद्रे] उस आनन्दस्वरूप प्रभु में निवास करते हैं । ये लोग (न श्रवस्यवः) = [श्रवस्-wealth] धन की कामनावाले नहीं होते । प्रभु और धन - दोनों की सेवा एकसाथ सम्भव नहीं । अच्छे व्यक्ति के ही है, जो उषा के होते ही क्रियाशील बनते हैं और इन्द्रियों व मन का निरोध करते हुए प्रभु में विचरते हैं, धन के प्रति आकृष्ट नहीं होते ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उषा हमारे वासनान्धकार को दूर करे । हम इसके निकलते ही क्रियाशील बनें । चित्तवृत्तिनिरोध द्वारा आत्मरूप में स्थित हों । प्रभु का ध्यान करें; धनासक्त न हो जाएँ ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(उवास) वसति (उषाः) प्रभावती (उच्छात्) विवसनात् (च) समुच्चये (नु) शीघ्रम् (देवी) सुखदात्री (जीरा) वेगयुक्ता (रथानाम्) रमणसाधनानां यानानाम् (ये) विद्वांसः (अस्याः) सत्स्त्रियाः (आचरणेषु) समन्ताच्चरन्ति जानन्ति व्यवहरन्ति येषु तेषु (दध्रिरे) धरन्ति (समुद्रे) जलमयेऽन्तरिक्षे वा (न) इष (श्रवस्यवः) आत्मनः श्रवणमिच्छवः ॥३॥

अन्वय:

पुनः सा कीदृशी भवेदित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - या स्त्री उषाइव वर्त्तमाना जीरा देवी रथानां मध्यउवास येऽस्याआचरणेषु समुद्रे न श्रवस्यवो दध्रिरे ते रथानामुच्छान्न्वध्वानं तरन्ति ॥३॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालंकारः। येन स्वसदृशी विदुषी सर्वथाऽनुकूला प्राप्यते स सुखमवाप्नोति नेतरः ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - As the brilliant dawn arrives and shines in splendour, it sets the wheels of life’s chariots in motion. On its arrival the yogis concentrate their minds in meditation as rich merchants send their ships over the sea. (As the sea is vast for the ships, so is the Divine presence vast for the yogi’s mind.)

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should woman be is taught in the third mantra.

अन्वय:

A woman who is beautiful and pleasant like the dawn, active and giver of pleasure and happiness travels by various pleasant vehicles. Those who are pleased with their (wives') good conduct and love them, enjoy happiness, as those who are desirous of wealth and send their ships to sea.

पदार्थान्वयभाषाः - (जीरा) वेगयुक्ता = Full of speed or active. (देवी) सुखदात्री = Giver of pleasure.
भावार्थभाषाः - It is only a person who gets a learned wife, quite agreeable to him enjoys happiness and none else (as a house holder).
टिप्पणी: देवो दानाद् वा दीपनाद् वा द्योतनाद्वा ( निरुक्ते ७.४.१६) So the first meaning of देव given by Yaskacharya in the Nirukta has been taken here by Rishi Dayananda.य उषसि योगमम्यस्यन्ति ते किं प्राप्नुवन्तीत्याह

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. ज्याला आपल्याप्रमाणे विदुषी पंडिता व सर्वस्वी अनुकूल स्त्री मिळते त्याला सुख मिळते, इतराला नाही. ॥ ३ ॥