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यस्या॒ रुश॑न्तो अ॒र्चयः॒ प्रति॑ भ॒द्रा अदृ॑क्षत । सा नो॑ र॒यिं वि॒श्ववा॑रं सु॒पेश॑समु॒षा द॑दातु॒ सुग्म्य॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yasyā ruśanto arcayaḥ prati bhadrā adṛkṣata | sā no rayiṁ viśvavāraṁ supeśasam uṣā dadātu sugmyam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्याः॑ । रुश॑न्तः । अ॒र्चयः॑ । प्रति॑ । भ॒द्राः । अदृ॑क्षत । सा । नः॒ । र॒यिम् । वि॒श्ववा॑रम् । सु॒पेश॑सम् । उ॒षाः । द॒दा॒तु॒ । सुग्म्य॑म्॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:48» मन्त्र:13 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:5» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:13


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसी होकर क्या देवे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्रि ! (यस्याः) जिसके सकाश से ये (रुशन्तः) चोर डांकू अन्धकार आदि का नाश और (भद्राः) कल्याण करनेवाली (अर्चयः) दीप्ति (प्रत्यदृक्षत) प्रत्यक्ष होती है (सा) जैसे वह (उषा) सुरूप के देनेवाली प्रभात की वेला (नः) हम लोगों के लिये (विश्ववारम्) सब आच्छादन करने योग्य (सुपेशसम्) शोभनरूप युक्त (रयिम्) चक्रवर्त्ति राज्य लक्ष्मी (सुग्म्यम्) सुख को (ददाति) देती है वैसी होकर तू भी हमको सुखदायक हो ॥१३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे दिन की निमित्त उषा के विना सुख वा राज्य के कार्य्य सिद्ध नहीं होते और सुरूप की प्राप्ति भी नहीं होती वैसे ही समीचीन स्त्री के विना यह सब नहीं होता ॥१३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

"विश्ववार - सुपेशस् - सुग्म्य" रयि

पदार्थान्वयभाषाः - १. (यस्याः) = जिस उषः काल की (अर्चयः) = दीप्तियाँ (रुशन्तः) = शत्रुओं का हिंसन करनेवाली पवित्र भावनाओं को जगानेवाली तथा (भद्राः) = कल्याण व सुख को प्राप्त करानेवाली (प्रति - अदृक्षत) = प्रतिदिन दिखती हैं, (सा) = वह उषा (नः) = हमें (रयिं ददातु) = उस ऐश्वर्य को दे जो ऐश्वर्य [क] (विश्ववारम्) = सबसे वरणीय - चाहने योग्य है अथवा सब कष्टों का निवारण करनेवाला है, [ख] (सुपेशसम्) = सुन्दर आकृतिवाला है, शोभन रूपोपेत है, हमें बेडौल [कु - वेर] शरीरवाला नहीं बना डालता तथा २. (सुग्म्यम्) = जो उत्तम साधनों से प्राप्त करने योग्य है [सु+गमः] अथवा सुख का साधनभूत है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उषा हमारे जीवनों को प्रकाशमय करती है और हम वरणीय धनों को सुपथ से सिद्ध करते हुए सुखी होते हैं ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(यस्याः) प्रकाशिकायाः (रुशन्तः) चोरदस्य्वन्धकारादीन् हिंसन्तः (अर्चयः) प्रकाशाः (प्रति) प्रत्यक्षार्थे (भद्राः) कल्याणकारकाः (अदृक्षत) दृश्यन्ते (सा) (नः) अस्मभ्यम् (रयिम्) चक्रवर्त्तिराज्यश्रियम् (विश्ववारम्) येन विश्वं सर्वं वृणोति तत् (सुपेशसम्) शोभनं पेशो रूपं यस्मात्तत् (उषाः) उषर्वत्सुरूपप्रदा (ददातु) (सुग्म्यम्) सुखेषु भवमानन्दम्। सुग्ममितिसुखना०। निघं० ३।६। ॥१३॥

अन्वय:

पुनः सा कीदृशी भूत्वा किं दद्यादित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्रि ! यस्यारुशन्तो भद्रा अर्चयः प्रत्यदृक्षतः सोषानो विश्ववारं सुपेशसं रयिं सुग्म्यं सुखं च यथा ददाति तथासती ह्येतत्सर्वं भवती ददातु ॥१३॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। यथा दिननिमित्तयोषसा विना ! सुखेन कार्य्याणि न सिद्धन्ति स्वरूपप्राप्तिश्च तथा सत्स्त्रिया विनैतखिलं न जायते ॥१३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That light of Divinity whose bright and blazing lights of bliss shine for us to see and which dispel the darkness of the night and ignorance, may that dawn of light give us the wealth of life, universal, beautiful and auspicious.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

O noble woman, as the Ushas (Dawn) whose bright auspicious rays are visible all around, gives us desirable, agreeable and easily attainable wealth in the form of health and happiness, in the same manner, you should also give all this and gladden us.

पदार्थान्वयभाषाः - ( सुग्म्यम् ) सुखेषु भवम् आनन्दम् सुग्मम् इति सुखनाम (निघ० २.६) = Bliss born out of delight. (सुपेशसम् ) शोभनं पेशः रूपं यस्मात् तत् = Beautiful.
भावार्थभाषाः - As without the Dawn which is followed by day, works cannot be accomplished easily and things cannot be seen in their true form, in the same manner, without a chaste and noble woman, domestic happiness cannot be attained.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसे उषेशिवाय दिवसा सुख मिळत नाही, कार्य सिद्ध होत नाही व स्वरूपाची प्राप्तीही होत नाही तसेच योग्य स्त्रीशिवाय सर्व गोष्टी होत नाहीत. ॥ १३ ॥