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विश्वा॑न्दे॒वाँ आ व॑ह॒ सोम॑पीतये॒ऽन्तरि॑क्षादुष॒स्त्वम् । सास्मासु॑ धा॒ गोम॒दश्वा॑वदु॒क्थ्य १॒॑ मुषो॒ वाजं॑ सु॒वीर्य॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśvān devām̐ ā vaha somapītaye ntarikṣād uṣas tvam | sāsmāsu dhā gomad aśvāvad ukthyam uṣo vājaṁ suvīryam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विश्वा॑न् । दे॒वान् । आ । व॒ह॒ । सोम॑पीतये । अ॒न्तरि॑क्षात् । उ॒षः॒ । त्वम् । सा । अ॒स्मासु॑ । घाः॒ । गोम॑त् । अश्व॑वत् । उ॒क्थ्य॑म् । उषः॑ । वाज॑म् । सु॒वीर्य॑म्॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:48» मन्त्र:12 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:5» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:12


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (उषः) प्रभात के तुल्य स्त्रि ! मैं (सोमपीतये) सोम आदि पदार्थों को पीने के लिये (अन्तरिक्षात्) ऊपर से (विश्वान्) अखिल (देवान्) दिव्य गुण युक्त पदार्थों और जिस तुझ को प्राप्त होता हूं उन्हीं को तू भी (आवह) अच्छे प्रकार प्राप्त हो हे (उषः) उषा के समान हित करने और (सा) तू सब इष्ट पदार्थों को प्राप्त करानेवाली (अस्मासु) हम लोगों इन्द्रिय किरण और पृथिवी आदि से (अश्वावत्) और अत्युत्तम तुरंगों से युक्त (सुवीर्य्यम्) उत्तम वीर्य्य पराक्रम कारक (वाजम्) विज्ञान वा अन्न को (धाः) धारण कर ॥१२॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे यह उषा अपने प्रादुर्भाव में शुद्ध वायु जल आदि दिव्य गुणों को प्राप्त कराके दोषों का नाश कर सब उत्तम पदार्थ समूह को प्रकट करती है वैसे उत्तम स्त्री गृह कार्य्य में हो ॥१२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दिव्य गुण व सौम्य भोजन

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (उषः) = उषः काल ! (त्वम्) = तू (सोमपीतये) = शरीर में ही सोम के रक्षण के लिए (अन्तरिक्षात्) = [अन्तरा क्षि] सदा मध्य - मार्ग में चलने के द्वारा (विश्वान् देवान् आवह) = सब दिव्य गुणों को प्राप्त करा । मध्य - मार्ग में चलना कारण है और दिव्य गुणों का विकास उसका कार्य । दिव्य गुणों का विकास कारण है और वासना - विनाश उसका कार्य । वासना - विनाश कारण है और सोमरक्षण उसका कार्य । २. इस सोमरक्षण के लिए ही हे (उषः) = उषा ! तू (अस्मासु) = हममें (वाजम्) = उस अन्न को (धा) = धारण कर जो [क] (गोमत्) = उत्तम ज्ञानेन्द्रियों को प्राप्त करानेवाला है, [ख] (अश्वावत्) = कर्मेन्द्रियों को उत्तम बनानेवाला है, [ग] (उक्थ्यम्) = स्तोत्रों में उत्तम है, अर्थात् हमारी चित्तवृत्ति को प्रभुस्तवनपरायण बनानेवाला है तथा [घ] (सुवीर्यम्) = उत्तम वीर्यवाला है । वस्तुतः सौम्य भोजनों से शीतवीर्य की उत्पत्ति होती है और उसका शरीर में रक्षण सुगम होता है, अतः ये भोजन 'सुवीर्य' कहलाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम मध्यमार्ग में चलते हुए अपने अन्दर दिव्यगुणों का विकास करें और सात्त्विक भोजन करते हुए सोम का रक्षण करें ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(विश्वान्) अखिलान् (देवान्) दिव्यगुणयुक्तान् पदार्थान् (आ) समन्तात् (वह) प्राप्नुहि (सोमपीतये) सोमानां पीतिः पानं यस्मिन् व्यवहारे तस्मै (अन्तरिक्षात्) उपरिष्टात् (उषः) उषर्वदनुत्तमगुणे (त्वम्) (सा) (अस्मासु) मनुष्येषु (धाः) धेहि। अत्र लडर्थे लुङडभावश्च। (गोमत्) प्रशस्ता गाव इन्द्रियाणि किरणाः पृथिव्यादयी वा विद्यन्ते यस्मिँस्तत् (अश्वावत्) बहवः प्रशस्ता वेगप्रदा अश्वा अग्न्यादयः सन्ति यस्मिँस्तत्। अत्र मन्त्रे सोमाश्वेन्द्रिय०। अ० ६।३।१३१। इति दीर्घः। (उक्थ्यम्) उच्यते प्रशस्यते यत्तस्मै हितम् (उषः) उषर्वद्धितसंपादिके (वाजम्) विज्ञानमन्नं वा (सुवीर्य्यम्) शोभनानि वीर्य्याणि पराक्रमा यस्मात्तत् ॥१२॥

अन्वय:

पुनः सा किं कुर्यादित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे उषर्वद्वर्त्तमाने स्त्रि ! अहं सोमपीतयेऽन्तरिक्षाद्यान् विश्वान्देवान् यां त्वाञ्च प्राप्नोमि सा त्वमेतानावह। हे उषर्वत्सर्वेष्टप्रापिके ! त्वमस्मासूक्थ्यं गोमदश्ववत्सुवीर्यं वाजं धा धेहि ॥१२॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। यथेयमुषाः स्वप्रादुर्भावेन शुद्धजलवायुप्रकाशादीन् प्रापय्य दोषान्नाशयित्वा सर्वमुत्तमपदार्थसमूहं प्रकटयन्ति तथोत्तमा स्त्री गृहकृत्येषु भवेत् ॥१२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Light of Divinity, you bring us from the skies all the divine powers and energies of the world to partake of the soma of our yajna and vest in us the best of food, energy and virility of the early morning which may give us admirable wealth of sense and mind, speed and agility, and plenty of cows and horses.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should she (Usha) do is further taught in the 12th Mantra.

अन्वय:

O noble woman charming like the Dawn, as I get from the firmament all divine objects, pure air etc. for drinking the essence of herbs, you should also get them and bear all divine virtues in your heart. O lady, fulfiller of all desires benevolent like the Dawn, bestow upon us excellent and invigorating food and knowledge, along with noble speech and strength, the cattle and the horses and fire etc.

भावार्थभाषाः - As this Dawn by her appearance causes us to attain pure water, air and light etc., removing all evils and revealing all noble objects, a noble lady should be of the same nature in the discharge of her domestic duties.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जशी ही उषा आपल्या प्रादुर्भावाने शुद्ध वायू, जल इत्यादी दिव्य गुणांना प्राप्त करवून सर्व उत्तम पदार्थ समूह प्रकट करते तशी उत्तम स्त्री गृहकार्यदक्ष असावी. ॥ १२ ॥