वांछित मन्त्र चुनें
491 बार पढ़ा गया

याभिः॒ कण्व॑म॒भिष्टि॑भिः॒ प्राव॑तं यु॒वम॑श्विना । ताभिः॒ ष्व १॒॑ स्माँ अ॑वतं शुभस्पती पा॒तं सोम॑मृतावृधा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yābhiḥ kaṇvam abhiṣṭibhiḥ prāvataṁ yuvam aśvinā | tābhiḥ ṣv asmām̐ avataṁ śubhas patī pātaṁ somam ṛtāvṛdhā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

याभिः॑ । कण्व॑म् । अ॒भिष्टि॑भिः । प्र । आव॑तम् । यु॒वम् । अ॒श्वि॒ना॒ । ताभिः॑ । सु । अ॒स्मान् । अ॒व॒त॒म् । शु॒भः॒ । प॒ती॒ इति॑ । पा॒तम् । सोम॑म् । ऋ॒त॒वृ॒धा॒॥

491 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:47» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:1» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:5


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे क्या करें इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (ऋतावृधा) सत्य अनुष्ठान से बढ़नेवाले (शुभस्पती) कल्याण कारक कर्म्म वा श्रेष्ठ गुण समूह के पालक ! (अश्विना) सूर्य और चन्द्रमा के गुण युक्त सभा सेनाध्यक्ष ! (युवम्) आप दोनों (याभिः) जिन (अभिष्टिभिः) इच्छाओं से (सोमम्) अपने ऐश्वर्य और (कण्वम्) मेधावी विद्वान् की (पातम्) रक्षा करें उनसे (अस्मान्) हम लोगों को (सु) अच्छे प्रकार (आवतम्) रक्षा कीजिये और जिनसे हमारी रक्षा करें उनसे सब प्राणियों की (अवतम्) रक्षा कीजिये ॥५॥
भावार्थभाषाः - सभा और सेना के पति राज पुरुष जैसे अपने ऐश्वर्य्य की रक्षा करें वैसे ही प्रजा और सेनाओं की रक्षा सदा किया करें ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शुभ के रक्षक प्राणापान

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अश्विना) = प्राणापानो ! आप (याभिः) = जिन (अभिष्टिभिः) = अपेक्षित रक्षणों से अथवा रोगादि पर आक्रमणों के द्वारा (कण्वम्) = मेधावी पुरुष को (प्रावतम्) = सुरक्षित करते हो (ताभिः) = उन्हीं रक्षणों से (अस्मान्) = हमें भी (स अवतम्) = खूब अच्छी प्रकार सुरक्षित करो । एक मेधावी पुरुष प्राणसाधना के महत्त्व को समझता है और उसमें प्रवृत्त होता है । हम भी मेधावी बनकर इस प्राणसाधना में प्रवृत्त हों, प्राणसाधना के महत्त्व को समझें और उसका अनुष्ठान करें । २. हे (शुभस्पती) = जीवन में सब अच्छाइयों का रक्षण करनेवाले प्राणापानो ! (ऋतावृधा) = ऋत का - जो कुछ ठीक है उसका वर्धन करनेवाले आप (सोमं पातम्) = सोम का रक्षण कीजिए । वस्तुतः शरीर में इस सोम [शक्ति] के रक्षण से ही सब अच्छाइयाँ सुरक्षित होती हैं, इसी से हमारे जीवनों में ऋत का वर्धन होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणापान ही हमारा रक्षण करते हैं और शक्ति की ऊर्ध्वगति के द्वारा सब शुभों को प्राप्त कराते हैं ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(याभिः) वक्ष्यमाणाभिः (कण्वम्) मेधाविनम् (अभिष्टिभिः) या आभिमुख्येनेष्यन्ते ताभिरभीष्टाभिरिच्छाभिः। अत्र एमन्नादिषु छन्दसि पररूपं वक्तव्यम् इति पूर्वस्येकारस्य पररूपम्। (प्र) प्रकृष्टार्थे (आवतम्) पालयतम् (युवम्) युवाम् (अश्विना) सूर्य्यचन्द्रमसाविव सभासेनाध्यक्षौ (ताभिः) उक्ताभिः (सु) शोभनार्थे (अस्मान्) धार्मिकान् पुरुषार्थिनो मनुष्यान् (अवतम्) (शुभः) कल्याणकरस्य कर्मणः शुभगुणसमूहस्य वा (पती) पालयितारौ (पातम्) रक्षतम् (सोमम्) ऐश्वर्य्यम् (ऋतावृधा) यावृतेन सत्यानुष्ठानेन वर्धेते तौ ॥५॥

अन्वय:

पुनस्तौ किं कुरुतमित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे ऋतावृधा शुभस्पती अश्विना सूर्य्याचन्द्रमोगुणायुक्तौ युवं याभिरभिष्टिभिः सोमं कण्वं च पातं ताभिरस्मान्सुप्रावतं याभिरस्मान्पातं ताभिः सर्वानवतम् ॥५॥
भावार्थभाषाः - सभासेनेशौ यथा स्वस्यैश्वर्य्यस्य रक्षां विधत्तां तथैव प्रजाः सेनाश्च सततं रक्षेताम् ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, universal harbingers of light and knowledge, defenders of good and promoters of Truth and Law, by the cherished plans and noble desires by which you protect and promote the sagely scholar, protect us too and promote the beauty and glory of the world.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

O President of the Assembly and Commander of the Army, who are endowed with the attributes of the sun and the moon, who increase with the observance of truth and are its supporters, who are guardians of all good deeds, protect and preserve us with those noble desires by which you protect the true wealth and a wise man.

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) सूर्यचन्द्रमसाविव सभासेनाध्यक्षौ = The President of the Assembly and the commander of the Army who shine on account of their merits like the sun and the moon.
भावार्थभाषाः - The President of the Assembly and the commander of the Army should protect their subjects and their armies incessantly as they preserve their own wealth.
टिप्पणी: For the meaning of the word Ashvinau as सूर्याचन्द्रमसौ or the sun and the moon, there is the clear authority of Yaskacharya in Nirukta 12.1 तत्कावश्विनौ ? द्यावापृथिव्यावित्येके | अहोरात्रावित्येके | सूर्याचन्द्रमसावित्येके । ( निरुक्ते १२.१ ) Having taken this third meaning, Rishi Dayananda has taken the President of the Assembly and the Commander of the Army by the way of illustration as acting or shining like the sun and the moon. It is wrong on the part of Sayanacharya, Prof. Wilson, Griffith and others to take कणव as the name of a particular sage, whereas according to the Vedic Lexicon-Nighantu 3.15 it simply means a highly intelligent or wise person. कण्व इति मेधाविनामसु पठितम् ( निघ० ३.१५ ) Rishi Dayananda's interpretation is in accordance with and based upon this authority.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सभा व सेनेचा पती राजपुरुष जसे आपल्या ऐश्वर्याचे रक्षण करतात तसेच प्रजेचे व सेनेचे सदैव रक्षण करावे. ॥ ५ ॥