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आ त्वा॒ विप्रा॑ अचुच्यवुः सु॒तसो॑मा अ॒भि प्रयः॑ । बृ॒हद्भा बिभ्र॑तो ह॒विरग्ने॒ मर्ता॑य दा॒शुषे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā tvā viprā acucyavuḥ sutasomā abhi prayaḥ | bṛhad bhā bibhrato havir agne martāya dāśuṣe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । त्वा॒ । विप्राः॑ । अ॒चु॒च्य॒वुः॒ । सु॒तसो॑माः । अ॒भि । प्रयः॑ । बृ॒हत् । भाः । बिभ्र॑तः । ह॒विः । अग्ने॑ । मर्ता॑य । दा॒शुषे॑॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:45» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:32» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:8


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसको कैसा जानें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) बिजुली के समान वर्त्तमान विद्वन् ! जो तू जैसे क्रियाओं में कुशल (दाशुषे) दानशील मनुष्य के लिये (प्रयः) अन्न (बृहत्) बड़े सुख करनेवाले (हविः) देने लेने योग्य पदार्थ और (भाः) जो प्रकाश कारक क्रियाओं को (बिभ्रतः) धारण करते हुए (सुतसोमाः) ऐश्वर्ययुक्त (विप्राः) विद्वान् लोग (त्वा) तुझको (अभ्यचुच्यवुः) सब प्रकार प्राप्त हों वैसे तू भी इन को प्राप्त हो ॥८॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् मनुष्यों को चाहिये जिस प्रकार उत्तम सुख हों उसको विद्याविशेष परीक्षा से प्रत्यक्ष कर अनुक्रम से सबको ग्रहण करावें जिससे इन लोगों के भी सब काम निश्चय करके सिद्ध होवें ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुतसोम आचार्य

पदार्थान्वयभाषाः - १.(अग्ने) - हे परमात्मन् ! (विप्राः) - ज्ञानी लोग - विशेषरूप से अपना पूरण करनेवाले लोग (त्वा) - आपको (अभि अचुच्यवुः) - जीवनकाल में और इस जीवन की समाप्ति पर प्राप्त करते हैं । कौन - से ज्ञानी लोग ? [क] (सुतसोमाः) - जो अपने शरीर में सोम का उत्पादन करते हैं । भोजन से उत्पन्न सोमशक्ति को शरीर में ही सुरक्षित रखते हैं । [ख] जो (दाशुषे मर्ताय) - दाश्वान् अपना अर्पण करनेवाले मनुष्य के लिए (प्रयः) - अन्न को (बृहद्भाः) - उत्कृष्ट ज्ञानज्योति को तथा (हविः) - दानपूर्वक अदन की वृत्ति को (बिभ्रतः) धारण करते हैं, अर्थात् वे आचार्य प्रभु को प्राप्त करते हैं जो उनके समीप आये हुए विद्यार्थियों को शरीर - धारण के लिए आवश्यक अन्न प्राप्त कराते हैं, ज्ञान की ज्योति देते हैं तथा उनके मन में दानपूर्वक अदन की वृत्ति को उत्पन्न करने का प्रयत्न करते हैं ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - अपने अन्दर शक्ति का उत्पादन व रक्षण करनेवाले आचार्य विद्यार्थियों को, 'अन्न, ज्ञान व त्यागपूर्वक उपभोग की वृत्ति' प्राप्त कराते हैं । ये आचार्य  इस प्रकार कर्तव्यपालन करते हुए प्रभु को प्राप्त करते हैं ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(आ) समन्तात् (त्वा) त्वाम् (विप्राः) विद्वांसः (अचुच्यवुः) च्यवन्तां प्राप्नुवन्तु (सुतसोमाः) सुता ओषध्यादिपदार्थसारा यैस्ते (अभि) अभितः (प्रयः) प्रीणयन्ति तृप्यन्ति येन तद्न्नम् (बृहत्) महत्सुखकारकम् (भाः) या भान्ति प्रकाशयन्ति ताः (बिभ्रतः) धरन्तः (हविः) ग्रहीतुन्दातुमत्तुं योग्यं पदार्थम् (अग्ने) विद्युदिव विद्वन् (मर्त्ताय) मनुष्याय (दाशुषे) दानशीलाय ॥८॥

अन्वय:

पुनस्ते कीदृशं जानीयुरित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! यस्त्वं यथा क्रियाकुशला दाशुषे मर्त्ताय प्रयो बृहद्धविर्भा बिभ्रतः सन्तः सुतसोमा विप्रास्त्वामभ्यचुच्यवुस्तथैताँस्त्वमपि प्राप्नुहि ॥८॥
भावार्थभाषाः - विद्वांसो येन मनुष्याणामुत्तमं सुखं स्यात्तं विद्याविशेषपरीक्षाभ्यां प्रत्यक्षीकृत्य यथाऽनुक्रमं सर्वान् ग्राहयेयुर्यतो ह्येतेषां सर्वाणि कार्याणि सिध्येयुः ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of blazing brilliance and treasure of wealth and knowledge, men of genius who have distilled soma, spirit of joy and meaning of life, from nature, bearing offers of yajna come to you for the sake of food and delight of living for the man of yajnic generosity.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued

अन्वय:

O learned person shining like lightning, as persons expert in practical work, bringing for a charitable man nourishing or gratifying food, great objects that create happiness, worthy of giving and taking and light-producing processes, extracting the juice of various herbs and plants approach you, so you should also approach them lovingly.

पदार्थान्वयभाषाः - [अचुच्यवुः] च्यवन्तां प्राप्नुवन्तु = Approach. [च्युङ् गतौ अत्र तृतीयः प्राप्त्यर्थः] [प्रयः] प्रीणयन्ति तृप्यन्ति येन तदन्नम् = food that gratifies (प्रय इत्यन्ननाम निघ० २.७)
भावार्थभाषाः - It is the duty of the learned persons to give instructions gradually about the things and acts that produce good happiness, after visualizing them with knowledge and experiments, so that all their works may be accomplished.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - विद्वान माणसांनी ज्या प्रकारे उत्तम सुख मिळेल त्या विद्या विशेष परीक्षा करून, प्रत्यक्ष अनुभव घेऊन अनुक्रमाने सर्वांना ग्रहण करवावी, ज्यामुळे त्या लोकांचेही सर्व काम निश्चयाने सिद्ध व्हावे. ॥ ८ ॥