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पति॒र्ह्य॑ध्व॒राणा॒मग्ने॑ दू॒तो वि॒शामसि॑ । उ॒ष॒र्बुध॒ आ व॑ह॒ सोम॑पीतये दे॒वाँ अ॒द्य स्व॒र्दृशः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

patir hy adhvarāṇām agne dūto viśām asi | uṣarbudha ā vaha somapītaye devām̐ adya svardṛśaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पतिः॑ । हि । अ॒ध्व॒राणा॑म् । अग्ने॑ । दू॒तः । वि॒शाम् । असि॑ । उ॒षः॒बुधः॑ । आ । व॒ह॒ । सोम॑पीतये । दे॒वान् । अ॒द्य । स्वः॒दृशः॑॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:44» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:29» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:9


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर यह विद्वान् कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) विद्वन ! जो तू (हि) निश्चय करके (अध्वराणाम्) यज्ञ और (विशाम्) प्रज्ञाओं के (पतिः) पालक (असि) हो इससे आप (अद्य) आज (सोमपीतये) अमृतरूपी रसों के पीने रूप व्यवहार के लिये (उषर्बुधः) प्रातःकाल में जागनेवाले (स्वर्दृशः) विद्यारूपी सूर्य्य के प्रकाश से यथावत् देखने वाले (देवान्) विद्वान् वा दिव्यगुणों को (आवह) प्राप्त हूजिये ॥९॥
भावार्थभाषाः - सभासेनाध्यक्षादि विद्वान् लोग विद्या पढ़के प्रजा पालनादि यज्ञों की रक्षा के लिये प्रजा में दिव्य गुणों का प्रकाश नित्य किया करें ॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अध्वराणां पतिः

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अग्ने) - परमात्मन् ! आप (अध्वराणाम्) - सब हिंसारहित कर्मों के, यज्ञों के (पतिः) - रक्षक (असि) - हैं । आपकी कृपा से ही सब यज्ञ पूरे हुआ करते हैं ।  २. हे अग्ने ! आप ही (विशाम्) - सब प्रजाओं को (दूतः) - ज्ञान का सन्देश प्राप्त करानेवाले हैं ।  ३. आप ही (उषर्बुधः) - प्रातः काल में जागनेवाले (स्वः दृशः) - ज्ञान के सूर्य को देखनेवाले, अर्थात् प्रातः काल उठकर स्वाध्यायशील (देवान्) - देववृत्ति के लोगों को (अद्य) - आज (सोमपीतये) - सोम के रक्षण व शरीर में पीने व व्याप्त करने के लिए (आवह) - प्राप्त कराइए । वस्तुतः शरीर में सोम - वीर्य के रक्षण के लिए आवश्यक है कि [क] हम प्रातः काल जागें, [ख] स्वाध्यायशील हों [ग] देववृत्ति को अपनाएँ ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उषः जागरण, स्वाध्याय व देववृत्ति को अपनाने पर हम शरीर में सोम का रक्षण कर पाते हैं । इस सोम का रक्षण होने पर हमारे जीवन में यज्ञात्मक कर्म चलते हैं और हम प्रभु के ज्ञान - सन्देश को सुन पाते हैं ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(पतिः) पालयिता (हि) खलु (अध्वराणाम्) यज्ञानाम् (अग्ने) नीतिज्ञ विद्वन् (दूतः) यो दुनोति शत्रून् भेत्तुं जानाति सः (विशाम्) प्रजानाम् (असि) (उषर्बुधः) य उषसि बुध्यन्ते तान् (आ) आभिमुख्ये (वह) प्राप्नुहि (सोमपीतये) सोमानाममृतरसानां पानं यस्मिन् व्यवहारे तस्मै। अत्र सह#सुपा इति समासः। (देवान्) विदुषो दिव्यगुणान्वा (अद्य) अस्मिन्दिने (स्वर्दृशः) ये सुखेन विद्यानन्दं पश्यन्ति तान् ॥९॥ #[अ० २।१।४।]

अन्वय:

पुनरयं विद्वान् कीदृश इत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने विद्वन् ! यस्त्वमध्वराणां विशां पतिरसि तस्मात्तमद्य हि सोमपीतय उषर्बुधः स्वर्दृशो देवानावह ॥९॥
भावार्थभाषाः - सभासेनाद्यध्यक्षादयो विद्वांसो विद्यापाठन प्रजापालनादियज्ञानां रक्षायै प्रजासु दिव्यगुणान्नित्यं प्रकाशयेयुः ॥९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light and knowledge, protector and promoter of the noblest yajnic acts of humanity, you are the conscience of the people and harbinger of joy for them. Bring here the brilliancies of nature and humanity who wake up with the dawn. They have the vision of light and heaven. Let them come for partici pation in the celebration of soma-success of the yajna.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is this learned person is further taught in the ninth mantra.

अन्वय:

O learned person well-versed in Politics, you are protector of the Yajnas (non-violent sacrifices) and the people. You know how to destroy enemies. Therefore bring here learned persons who happily see the joy of knowledge or divine virtues and get up early in the morning, to drink the invigorating juice of various kinds.

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) नीतिज्ञ विद्वन् = o learned person well-versed in Politics. (स्वदृश:) ये सुखेन विद्यानन्दं पश्यन्ति तान् = To them who happily see the bliss or joy of knowledge.
भावार्थभाषाः - The President of the assembly, the Commander-in-Chief of the Army and other learned persons should always manifest divine virtues among the people for the protection of knowledge, the preservation of the subjects and other Yajnas.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सभासेनाध्यक्ष इत्यादी विद्वान लोकांनी विद्या शिकून प्रजापालनरूपी यज्ञाच्या रक्षणासाठी प्रजेमध्ये दिव्य गुण नित्य प्रकट करावेत. ॥ ९ ॥