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होता॑रं वि॒श्ववे॑दसं॒ सं हि त्वा॒ विश॑ इ॒न्धते॑ । स आ व॑ह पुरुहूत॒ प्रचे॑त॒सोऽग्ने॑ दे॒वाँ इ॒ह द्र॒वत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

hotāraṁ viśvavedasaṁ saṁ hi tvā viśa indhate | sa ā vaha puruhūta pracetaso gne devām̐ iha dravat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

होता॑रम् । वि॒श्ववे॑दसम् । सम् । हि । त्वा॒ । विशः॑ । इ॒न्धते॑ । सः । आ । व॒ह॒ । पु॒रु॒हू॒त॒ । प्रचे॑तसः । अग्ने॑ । दे॒वान् । इ॒ह । द्र॒वत्॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:44» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:29» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:7


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह किस प्रकार का है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पुरुहूत) बहुत विद्वानों ने बुलाये हुए (अग्ने) विशिष्ट ज्ञानयुक्त विद्वन् ! (प्रचेतसः) उत्तम ज्ञानयुक्त (विशः) प्रजा जिस (होतारम्) हवन के कर्त्ता (विश्ववेदसम्) सब सुख प्राप्त (त्वा) आपको (हि) निश्चय करके (समिन्धते) अच्छे प्रकार प्रकाश करती हैं (सः) सो आप (इह) इस युद्ध आदि कर्मों में उत्तम ज्ञान वाले (देवान्) शूरवीर विद्वानों को (आवह) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये ॥७॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों के सहाय के विना प्रजा के सुख को वा दिव्य गुणों की प्राप्ति और शत्रुओं से विजय नहीं हो सकता इससे यह सब मनुष्यों को प्रयत्न के साथ सिद्ध करना चाहिये ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

होता - विश्ववेदस्

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे प्रभो ! (होतारम्) - सब पदार्थों के देनेवाले, (विश्ववेदसम्) - सर्वज्ञ व सर्वधन (त्वा) - आपको (हि) - निश्चय से (विशः) - सब प्रजाएँ, संसार में प्रवेश करनेवाले व्यक्ति (समिन्धते) - अपने हृदयों में दीप्त करते हैं । वस्तुतः प्रभु को अपने हृदय में दीप्त करने की साधना 'होतारं व विश्ववेदसम्' इन शब्दों से ही सूचित हो रही है । हम होता - देनेवाले, देकर यज्ञशेष को खानेवाले बनें तथा (विश्ववेदस्) - सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयत्न करें । २. हे (पुरुहूत) - बहुतों से पुकारे गये अथवा जिनको पुकारना हमारा पूरक व पालक है, ऐसे (अग्ने) - अग्रणी प्रभो ! (सः) - वे आप (प्रेचतसः देवान्) - प्रकृष्ट चेतनावाले विद्वानों को (द्रवत्) - शीघ्र (इह) - इस हमारे जीवन में (आवह) - प्राप्त कराइए । इनके सम्पर्क में आकर हम भी प्रचेतस् बनें और दिव्य गुणों को प्राप्त करने के लिए सदा यत्नशील हों ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वे प्रभु होता हैं, विश्वेदस् है । उनकी कृपा से हमारा दिव्य गुणोंवाले विद्वानों से सम्पर्क हो और हम भी देव बनें ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(होतारम्) हवनस्य कर्त्तारम् (विश्ववेदसम्) विश्वानि सर्वाणि सुखानि विन्दति यस्मात्तम् (सम्) सम्यगर्थे (हि) खलु (त्वा) त्वाम् (विशः) प्रजाः (इन्धते) प्रदीप्यन्ते (सः) (आ) अभितः (वह) प्राप्नुहि (पुरुहूत) यः पुरुभिर्बहुभिर्विद्वद्भिर्हूयते स्तूयते तस्तम्बुद्धौ (प्रचेतसः) प्रकृष्टं चेतो विज्ञानं यासां ताः (अग्ने) विशिष्टज्ञानयुक्त (देवान्) वीरान्विदुषो दिव्यगुणान् वा (इह) अस्मिन् युद्धादिव्यवहारे (द्रवत्) द्रवतु ॥७॥

अन्वय:

पुनः स कीदृशोऽस्तीत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे पुरुहूताग्ने विद्वन् ! प्रचेतसो विशो यं होतारं विश्ववेदसं त्वां हि खलु समिंधते ताः प्रति भवान् द्रवत् ॥७॥
भावार्थभाषाः - नहि विद्वत्सहायेन विना प्रजासुखं दिव्यगुणप्राप्तिः शत्रुविजयश्च जायते तस्मादेतत्सर्वैः प्रयत्नेन संसाधनीयमिति ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light and life, ruler of the world, the people invoke, kindle and honour you, lord omniscient and high-priest of cosmic yajna. Lord universally celebrated, let the brilliancies of nature and humanity come and bless us here straight at the earliest and fastest. Let the wise scholars come and bless us.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is he (Agni) is taught in the seventh Mantra.

अन्वय:

O highly learned person, invoked and remembered by many, the people possessing good knowledge you invite (literally kindle)you who are doer of Yajnas-a noble sacrificer. Quickly bring hither other excellently wise divine persons and virtues and to help them in all good dealings.

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) विशिष्टज्ञानयुक्त = Highly educated person or leader. ( प्रचेतसः) प्रकृष्टं चेतो विज्ञानं यासां ताः (विशः) = The people possessing good knowledge. ( देवान्) वीरान् विदुषो दिव्यगुणान् वा = Brave learned persons or divine attributes.
भावार्थभाषाः - It is not possible to bring about the happiness of the subjects, the attainment of divine virtues without much effort and victory over the enemies. Therefore all should accomplish it with great endeavor.
टिप्पणी: The word Agni ( अग्नि ) is derived from अगि गतौ गतेस्त्रयोऽर्था: or ज्ञानं गमनं प्राप्तिश्च Taking the first meaning ज्ञान knowledge and basing on the etymology of the word as given by Yaskacharya in Nirukta अग्नि: कस्मादग्रणीर्भबति ( निरुक्ल ७.१ ) Rishi Dayananda has interpreted it as विशिष्ट ज्ञान युक्त which is certainly and clearly corroborated by the adjectives used in the Mantra होतारम्-विश्ववेदसम् which Sayanacharya interprets as होमनिष्पादकम् -सर्वज्ञम् Prof. Wilson translates these words as sacrificer and Omniscient. Are these adjectives applicable to inanimate fire. ?

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - विद्वानांच्या साह्याशिवाय प्रजेला सुख, दिव्य गुणांची प्राप्ती व शत्रूंवर विजय प्राप्त होऊ शकत नाही. त्यामुळे हे सर्व माणसांनी प्रयत्नपूर्वक सिद्ध केले पाहिजे. ॥ ७ ॥