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श्रेष्ठं॒ यवि॑ष्ठ॒मति॑थिं॒ स्वा॑हुतं॒ जुष्टं॒ जना॑य दा॒शुषे॑ । दे॒वाँ अच्छा॒ यात॑वे जा॒तवे॑दसम॒ग्निमी॑ळे॒ व्यु॑ष्टिषु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śreṣṭhaṁ yaviṣṭham atithiṁ svāhutaṁ juṣṭaṁ janāya dāśuṣe | devām̐ acchā yātave jātavedasam agnim īḻe vyuṣṭiṣu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

श्रेष्ठ॑म् । यवि॑ष्ठम् । अति॑थिम् । सुआ॑हुतम् । जुष्टम् । जना॑य । दा॒शुषे॑ । दे॒वान् । अच्छ॑ । यात॑वे । जा॒तवे॑दसम् । अ॒ग्निम् । ई॒ळे॒ । विउ॑ष्टिषु॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:44» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:28» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:4


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर किस प्रकार के विद्वान् को ग्रहण करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - मैं (व्युष्टिषु) विशिष्ट पढ़ने के योग्य कामनाओं में (यातवे) प्राप्ति के लिये (दाशुषे) दाता (जनाय) धार्मिक विद्वान् मनुष्य के अर्थ (श्रेष्ठम्) अति उत्तम (यविष्ठम्) परम बलवान् (जुष्टम्) विद्वान् से प्रसन्न वा सेवित (स्वाहुतम्) अच्छे प्रकार बुलाके सत्कार के योग्य (जातवेदसम्) सब पदार्थों में व्याप्त (अतिथिम्) सेवा करने के योग्य (अग्निम्) अग्नि के तुल्य वर्त्तमान सज्जन अतिथि और (देवान्) दिव्य गुण वाले विद्वानों को (अच्छे) अच्छे प्रकार सत्कार करूं ॥४॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को अति योग्य है कि उत्तम धर्म बल वाले प्रसन्न स्वभाव सहित सब के उपकारक विद्वान् और अतिथियों का सत्कार करें जिससे सब जनों का हित हो ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रातःकाल की प्रारम्भिक क्रिया [प्रभुस्तवन]

पदार्थान्वयभाषाः - १. (व्युष्टिषु) - उषः कालों में, अर्थात् प्रतिदिन दिन के आरम्भ में (देवान् अच्छ) - देवों की ओर (यातवे) - प्राप्त होने के लिए अर्थात् दिव्यगुणों की प्राप्ति के लिए, उस (जातवेदसम्) - सर्वज्ञ व सर्वधन (अग्निम्) - अग्रणी प्रभु को (ईळे) - मैं उपासित करता हूँ जो प्रभु  २. (श्रेष्ठम्) - प्रशस्यतम हैं, सब देवों में श्रेष्ठ है, श्रेष्ठता की चरमसीमा है, (यविष्ठम्) - हम उपासकों को भी दुर्गुणों से असम्पृक्त तथा सद्गुणों से सम्पृक्त करनेवाले हैं, (अतिथिम्) - हमारे हित के लिए निरन्तर क्रियाशील हैं [अत सातत्यगमने], (स्वाहुतम्) - सब उत्तम वस्तुओं को प्राप्त करानेवाले हैं [सु आ हुतं यस्मात्] ।  ३. उस प्रभु का स्तवन करते हैं जो कि (दाशुषे जनाय) - अपना समर्पण करनेवाले मनुष्य के लिए (जुष्टम्) - [प्रीतिम्] प्रीतिवाले होते हैं ।  ४. वस्तुतः प्रभुस्तवन हममें दिव्यगुणों का वर्धन करता है । प्रभु की स्तुति से हम वासनाओं से बचकर अच्छाइयों का अपने से मेल करनेवाले बनते हैं । प्रभुस्मरण ही हमें इस प्रलोभनमय संसार में बचानेवाला है । हम प्रभु के प्रति अपना अर्पण करते हैं । प्रभु हमसे प्रसन्न होते हैं और हमें दुर्गुणों से दूर करके सद्गुणों से अलंकृत करते हैं ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - दिव्यगुणों की प्राप्ति के लिए हम प्रतिदिन प्रातः काल को प्रभुस्तवन से प्रारम्भ करें ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(श्रेष्ठम्) अत्युत्तमम् (यविष्ठम्) बलवत्तरम् (अतिथिम्) नित्यं भ्रमणशीलं सेवितुमर्हम् (स्वाहुतम्) यः सुष्ठु आहूयते तम् (जुष्टम्) विद्वद्भिः प्रीतं सेवितं वा (जनाय) धार्मिकाय विदुषे मनुष्याय (दाशुषे) दात्रे (देवान्) विदुषो दिव्यगुणान्वा (अच्छ) उत्तमेन प्रकारेण। अत्र निपातस्य च इति दीर्घः। (यातवे) यातुं प्राप्तुम्। अत्र तुमर्थे से० इति तवेन् प्रत्ययः। (जातवेदसम्) जातेषु पदार्थेषु विद्यमानमिव व्याप्तविद्यम् (अग्निम्) वह्निवद्वर्त्तमानं विद्वांसम् (ईडे) सत्कुर्याम् (व्युष्टिषु) विशिष्टासु कामनास्वध्येषितासु सतीषु ॥४॥

अन्वय:

पुनस्तं कीदृशं गृह्णीयुरित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - अहं व्युष्टिषु यातवे दाशुषे जनाय श्रेष्ठं यविष्ठं जुष्टं स्वाहुतं जातवेदसमतिथिमग्निमिव प्रकाशमानं विद्वांसं दूतमन्यान्देवान्वाऽच्छेडे ॥४॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। मनुष्यैः श्रेष्ठानां धर्मबलानां सर्वैर्विद्वद्भिः सत्कृतानां प्रसन्नस्वभावानां सर्वोपकारकाणां विदुषामतिथीनामेव सत्कारः कर्त्तव्यः यतः सर्वहितं स्यात् ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In the lights of the dawn of desire and to reach the holy splendours of Divinity, I invoke, worship and serve Agni, lord of light and life and universal knowledge, best and youngest holy light, loving, burning and ever on the move as a blessing for the man of faith and charity with surrender to the Lord.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

I praise a learned person who is well-versed in various sciences, is purifier like the fire, the noblest and most youthful (energetic), going from place to place like a guest, well-invited, loved and served by enlightened persons for the fulfilment of noble desires, that he may bring well other truthful learned men to us.

पदार्थान्वयभाषाः - (व्युष्टिषु) विशिष्टासु कामनासु अध्येषितासु सतीषु = On the occasion of or fulfilment of particular desires ( जातवेदसम्) जातेषु पदार्थेषु विद्यमानमिव व्याप्त विद्यम् =Pervading in or well-versed in various sciences.
भावार्थभाषाः - Men should honor such learned guests as are righteous, respected by all learned persons, of cheerful disposition and benevolent.
टिप्पणी: Many of the adjectives used in the Mantra for Agni are quite clear to show that here, it is not material fire that is meant, but learned person who is purifier like the fire as explained by Rishi Dayananda. Passages in the Brahmanas like... तस्मात् अनूचानमाहु रग्निकल्प इति ( शत. ६.१.१.१० ) अग्ने महां असि ब्राह्मण भारत (कोषी० ३.२ शत० १.४.२.२) एष वा अग्निवैश्वानरः । यद् ब्राह्मणः ( तैत्तिरीय ब्रा० २.१.४५ ) Fully substantiate Rishi Dayananda's interpretation, Even Wilson translates जातवेदसम् as “who knows all that are born, "following Sayanacharya who explains the word as जातानां वेदितारम् = Knower of all things. Is it applicable to inanimate fire ?

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. माणसांनी उत्तम धर्मबलयुक्त, सर्वात विद्वान, प्रसन्न स्वभावी, सर्वांचा उपकारक अशा विद्वान अतिथींचा सत्कार करावा. ज्यामुळे सर्व लोकांचे कल्याण होईल. ॥ ४ ॥