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यद्दे॒वानां॑ मित्रमहः पु॒रोहि॒तोऽन्त॑रो॒ यासि॑ दू॒त्य॑म् । सिन्धो॑रिव॒ प्रस्व॑नितास ऊ॒र्मयो॒ऽग्नेर्भ्रा॑जन्ते अ॒र्चयः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad devānām mitramahaḥ purohito ntaro yāsi dūtyam | sindhor iva prasvanitāsa ūrmayo gner bhrājante arcayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । दे॒वाना॑म् । मि॒त्र॒म॒हः॒ । पु॒रःहितः । अन्त॑रः । यासि॑ । दू॒त्य॑म् । सिन्धोः॑इव । प्रस्व॑नितासः । ऊ॒र्मयः॑ । अ॒ग्नेः । भ्रा॒ज॒न्ते॒ । अ॒र्चयः॑॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:44» मन्त्र:12 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:30» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:12


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मित्रमहः) मित्रों में बड़े पूजनीय विद्वान् ! आप मध्यस्थ होकर (दूत्यम्) दूत कर्म को (यासि) प्राप्त करते हो जिस (अग्नेः) आत्मा की (सिन्धोरिव) समुद्र के सदृश (प्रस्वनितासः) शब्द करती हुई (ऊर्मयः) लहरियाँ (अग्नेः) अग्नि के (अर्चयः) दीप्तियां (भ्राजन्ते) प्रकाशित होती हैं। (पुरोहितः) पुरोहित तथा (अन्तरः) मध्यस्थ होते हुए (देवानाम्) विद्वानों के (दूत्यम्) दूत के स्वभाव को (यासि) प्राप्त होते हो सो आप हम लोगों को सत्कार के योग्य क्यों न हों ॥१२॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में उपमालंकार है। हे मनुष्यो ! तुम जैसे परमेश्वर सबका मित्र पूजनीय पुरोहित अन्तर्यामी होकर दूत के समान सत्य असत्य कर्मों का प्रकाश करता है जैसे ईश्वर की अनन्त दीप्ति विचरती हैं जो ईश्वर सबका धाता, रचने वा पालन करने वा न्यायकारी महाराज सबको उपासने योग्य है, वैसे उत्तम दूत भी राजपुरुषों को माननीय होता है ॥१२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दीप्त व शान्त ज्ञान

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे प्रभो ! (मित्रमहः) - स्नेहयुक्त तेजस्वितावाले [महस् - तेजः], (पुरोहितः) - सबके सामने आदर्शरूप से स्थित (अन्तरः) - हृदय में स्थित हुए - हुए आप (यत्) - जब (देवानां दूत्यं यासि) - देवों के दूतकर्म को प्राप्त करते हैं, अर्थात् जब प्रभु ज्ञान का सन्देश प्राप्त कराते हैं तब (सिन्धोः) - समुद्र की (प्रस्वनितासः ऊर्मयः इव) - गर्जती हुई लहरों की भाँति (अग्नेः) - इस प्रगतिशील जीव की (अर्चयः) - ज्ञानदीप्तियाँ (भ्राजन्ते) - चमक उठती हैं ।  २. प्रभु तेजस्वी हैं परन्तु उनका तेज स्नेह से युक्त है, अतः वह तेज कभी सन्तापक नहीं होता ।  ३. वे प्रभु सभी के पुरोहित हैं - सभी के सामने आदर्शरूप से स्थित हैं । हमें अपने पिता प्रभु का ही तो अनुरूप पुत्र बनना है ।  ४. ये प्रभु हमारे हृदयों में स्थित हैं, हृदयस्थ होकर हमें ज्ञान दे रहे हैं ।  ५. इस प्रकार जब हमें प्रभु के ज्ञान का यह सन्देश प्राप्त होता है तब हमारी ज्ञान की दीप्तियाँ इस प्रकार चमकती हैं मानो समुद्र की गर्जती हुई लहरें हों । इस उपमा का सौन्दर्य इस बात में है कि ज्ञान अग्नि के समान देदीप्यमान है तो जल के समान शान्ति देनेवाला भी है । लहरों की उच्चता ज्ञान की उच्चता का संकेत कर रही है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु से प्राप्त होनेवाला ज्ञान हमें दीप्त व शान्त बनानेवाला है ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(यत्) यः (देवानाम्) विदुषाम् (मित्रमहः) यो मित्राणां महः पूज्यः (पुरोहितः) पुर एनं दधति पुरोऽयं दधाति सः (अन्तरः) मध्यस्थः सन् (यासि) गच्छसि (दूत्यम्) दूतस्य भागं कर्म वा (सिंधोरिव) यथा समुद्रस्य (प्रस्वनितासः) प्रकृष्टतया शब्दायमानाः (ऊर्मयः) वीचयः (अग्नेः) विद्युतो भौतिकस्य वा (भ्राजन्ते) प्रकाशन्ते (अर्चयः) दीप्तयः ॥१२॥

अन्वय:

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मित्रमहो विद्वन् ! यस्त्वं सिंधोरिव प्रस्वनितास ऊर्मयोऽग्नेरर्चयो भ्राजंते पुरोहितोऽन्तरस्सन्देवानां दूत्यं यासि सोऽस्माभिः सत्कर्त्तव्यः कथं न स्याः ॥१२॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्याः ! यूयं यथा परमेश्वरः सर्वेषां मनुष्याणां मित्रः पूज्यः पुरोहितोन्तर्य्यामी सन् दूतवदन्तरात्मनि सत्यमसत्यं कर्म जानाति। एवं यस्येश्वरस्यानंता दीप्तयश्चरन्ति स एव जगदीश्वरः सर्वस्य धाता रचकः पालको न्यायकारी महाराजः सर्वैरुपास्योऽस्ति तथोत्तमो दूतः सत्करणीयो भवति ॥१२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Lord of light, you are the greatest friend of the brilliant men of knowledge and vision, morning call of the high-priest in the mind, leading light of the voice divine, and the invitation to live by the yajna fire. And the flames of fire blaze like the rolling waves of the sea (at the dawn).

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is that Agni is taught in the 12th Mantra.

अन्वय:

(1) O learned person adored by your friends, like the resounding" billows of the ocean and roaring flames of the fire, your lusters of knowledge shine forth when you act as ministering priest or as an ambassador.

पदार्थान्वयभाषाः - ( मित्रमहः ) यो मित्राणां महः पूज्य: ( मह-पूजायाम् ) = To be adored by friends. ( पुरोहित ) पुर एनं दधाति, पुरो यं दधाति सः = High priest.
भावार्थभाषाः - O men, God is the Adorable Friend of all, well-wisher High Priest of all men and their innermost Spirit, knows like a messenger the good or bad acts of all souls, whose unlimited lusters shine forth all around the world. Such a God is the Creator, Sustainer and Nourisher of the universe and its Sovereign Dispenser of Justice. He must be worshipped by all. In the same manner, a noble ambassador or messenger should also be respected by all.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. हे माणसांनो तुम्ही (हे जाणा) जसा परमेश्वर सर्वांचा मित्र, पूजनीय, पुरोहित, अंतर्यामी असून दूताप्रमाणे सत्य-असत्य कर्म जाणतो. ज्या ईश्वराची दीप्ती सर्वत्र विचरण करते तो ईश्वर सर्वांचा धाता, निर्माणकर्ता किंवा पालनकर्ता अथवा न्यायकारी राजा असून सर्वांनी उपासना करावी असा आहे. तसे उत्तम दूतही राजपुरुषाकडून मान्यता पावलेला असतो. ॥ १२ ॥