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त्वे इद॑ग्ने सु॒भगे॑ यविष्ठ्य॒ विश्व॒माहू॑यते ह॒विः । स त्वं नो॑ अ॒द्य सु॒मना॑ उ॒ताप॒रं यक्षि॑ दे॒वान्त्सु॒वीर्या॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tve id agne subhage yaviṣṭhya viśvam ā hūyate haviḥ | sa tvaṁ no adya sumanā utāparaṁ yakṣi devān suvīryā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वे । इत् । अ॒ग्ने॒ । सु॒भगे॑ । य॒वि॒ष्ठ्य॒ । विश्व॑म् । आ । हू॒य॒ते॒ । ह॒विः । सः । त्वम् । नः॒ । अ॒द्य । सु॒मनाः॑ । उ॒त । अ॒प॒रम् । यक्षि॑ । दे॒वान् । सु॒वीर्या॑॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:36» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:9» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:6


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अग्नि के दृष्टान्त में राजपुरुषों के गुणों का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (यविष्ठ्य) पदार्थों के मेल करने में बलवान् (अग्ने) सुख देनेवाले राजन् ! जैसे होता (अग्नौ) अग्नि में (विश्वम्) सब (हविः) उत्तमता से संस्कार किया हुआ पदार्थ (आहूयते) डालाजाता है वैसे जिस (सुभगे) उत्तम ऐश्वर्य युक्त (त्वे) आपमें न्याय करने का काम स्थापित करते हैं सो (सुमनाः) अच्छे मनवाले (त्वम्) आप (अद्य) आज (उत) और (अपरम्) दूसरे दिन में भी (नः) हम लोगों को (सुवीर्या) उत्तम वीर्यवाले (देवान्) विद्वान् (इत्) हो (यक्षि) कीजिये ॥६॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् लोग वन्हि में पवित्र होम करके योग्य घृतादि पदार्थों को होम के संसार के लिये सुख उत्पन्न करते हैं वैसे ही दुष्टों को बन्दीघर में डाल के सज्जनों को आनन्द सदा दिया करें ॥६॥ राजपुरुष। सं०

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुभग - यविष्ठ्य

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अग्ने) - अग्नणी प्रभो ! हे (यविष्ठ्य) - बुराइयों को दूर करने और अच्छाइयों को हमारे जीवनों के साथ संगत करने में सर्वोत्तम प्रभो ! (सुभगे) - उत्तम भग - ऐश्वर्यवाले (त्वे इत्) - तुझमें ही (विश्वं हविः) - सम्पूर्ण हवि (आहूयते) - आहुत की जाती है, अर्थात् तेरी प्राप्ति के निमित्त ही कण्व, अर्थात् मेधावी लोग [प्रस्तुत मन्त्र के ऋषि] दानपूर्वक अदन [हु] करते हैं । इस त्यागपूर्वक उपभोग से ही आपकी प्राप्ति होती है और आपको प्राप्त होनेवाला व्यक्ति आपकी कृपा से बुराइयों से दूर व अच्छाइयों से युक्त होता है तथा सुभग, अर्थात् उत्तम ऐश्वर्यवाला बनता है ।  २. हे प्रभो ! (सः त्वम्) - वे आप (सुमनाः) - [शोभनं मनो यस्मात्] हमारे मनों को उत्तम बनानेवाले हैं । (नः) - हमें (अद्य) - आज (उत) - और (अपरम्) - अगले, अगले दिन (सुवीर्या देवान्) - उत्तम शक्तिवाले सूर्यादि देवों के साथ (यक्षि) - संगत कीजिए । प्रत्येक देव हमारी शक्ति की वृद्धि का कारण बने । यह शक्ति - वृद्धि हमारे मनों को भी उत्तम बनानेवाली हो ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - त्यागपूर्वक उपभोग के द्वारा हम प्रभु को प्राप्त करें । प्रभु - कृपा से सूर्यादि देव हमारी शक्ति का वर्धन करनेवाले हों ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(त्वे) त्वयि (इत्) एव (अग्ने) सुखप्रदातः सभेश (सुभगे) शोभनमैश्वर्यं यस्मिँस्तस्मिन् (यविष्ठ्य) यो वेगेन पदार्थान् यौति संयुनक्ति संहतान् भिनत्ति वा स युवातिशयेन युवा यविष्ठो यविष्ठ एव यविष्ठ्यस्तत्सम्बुद्धौ (विश्वम्) सर्वम् (आ) समन्तात् (हूयते) दीयते (हविः) सुसंस्कृतं वस्तु (सः) त्वम् (नः) अस्मान् (अद्य) अस्मिन्नहनि (सुमनाः) शोभनं मनो विज्ञानं यस्य सः (उत) अपि (अपरम्) श्वोदिनं प्रति (यक्षि) संगमय। अत्र लडर्थे# लङडभावश्च। (देवान्) विदुषः (सुवीर्या) शोभनानि वीर्याणि येषां तान्। अत्र सुपां सुलुग् इत्याकारादेशः ॥६॥ #[लोडर्थे,। सं०]

अन्वय:

अथाग्निदृष्टान्तेन राजपुरुषगुणा उपदिश्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे यविष्ठ्याग्ने यथा होत्राग्नौ विश्वं हविराहूयते यस्मिन् सुभगे त्वे त्वयि सर्वो न्यायोस्माभिरधिक्रियते स सुमनास्त्वमद्योताप्यपरं दिनं प्रति नोस्मान् सुवीर्या श्रेष्ठपराक्रमयुक्तानि* देवान्यक्षि संगमय ॥६॥ *[पराक्रमयुक्त्तान्।सं०]
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा विद्वांसो वन्हौ शुद्धं हव्यं द्रव्यं प्रक्षिप्य जगते सुखं जनयंति तथैव राजपुरुषा दुष्टान् कारागृहे प्रक्षिप्य धार्मिकेभ्य आनन्दं प्रादुर्भावयन्तु ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, fire and power of yajna, strongest catalyser and noblest creative and constructive agent, to you alone are offered all the inputs of yajna (for the sustenance and advancement of life). Right to-day and to-morrow and all through future, be good and kind to us, act with the generous powers of yajna and help us grow as brave and noble people.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Now by the illustration of fire, the attributes of the officers of the State are taught.

अन्वय:

O President of the Assembly, giver of happiness, O most youthful and auspicious, as all oblations are put in sacrificial fire, we have put all right of dispensing justice in you who are external as well endowed with good wealth of all kinds internal in the form of wisdom. Be ever cheerful, having always noble thoughts in your mind and unite us today tomorrow and for ever with energetic enlightened persons.

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) सुखप्रदातः सभेश = President of the Assembly, giver of happiness. (यविष्ठ्य) यो वेगेन पदार्थान् यौति संयुनक्ति संहतान् भिनत्ति वा स युवा प्रतिशयेन युवा यविष्ठ: यविष्ठ एव यविष्ठ्यः तत्सम्बुद्धौ = Most youthful or powerful and active. ( सुमना ) शोभनं मनो विज्ञानं यस्य सः = Possessing good knowledge.
भावार्थभाषाः - As learned persons give happiness to the people of the world by putting pure oblation in the sacrificial fire, in the same. manner, the officers and workers of the State should put in prison wicked unrighteous persons and give delight to righteous persons.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसे विद्वान लोक अग्नीत शुद्ध द्रव्य घालून होम करतात व जगात सुख निर्माण करतात तसेच दुष्टांना राजपुरुषांनी बंदीगृहात घालून धार्मिकांना सदैव आनंद द्यावा. ॥ ६ ॥