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अ॒ग्निर्व॑व्ने सु॒वीर्य॑म॒ग्निः कण्वा॑य॒ सौभ॑गम् । अ॒ग्निः प्राव॑न्मि॒त्रोत मेध्या॑तिथिम॒ग्निः सा॒ता उ॑पस्तु॒तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agnir vavne suvīryam agniḥ kaṇvāya saubhagam | agniḥ prāvan mitrota medhyātithim agniḥ sātā upastutam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ग्निः । व॒व्ने॒ । सु॒वीर्य॑म् । अ॒ग्निः । कण्वा॑य । सौभ॑गम् । अ॒ग्निः । प्र । आ॒व॒त् । मि॒त्रा । उ॒त । मेध्य॑अतिथिम् । अ॒ग्निः । सा॒तौ । उ॒प॒स्तु॒तम्॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:36» मन्त्र:17 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:11» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:17


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी इन सभाध्यक्षादि राजपुरुषों के गुण अग्नि के दृष्टान्त से अगले मंत्र में कहे हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - जो विद्वान् (अग्निः) भौतिक अग्नि के समान (सातौ) युद्ध में (उपस्तुतम्) उपगत स्तुति के योग्य (सुवीर्य्यम्) अच्छे प्रकार शरीर और आत्मा के बल पराक्रम (अग्निः) विद्युत् के सदृश (कण्वाय) उसी बुद्धिमान् के लिये (सौभगम्) अच्छे ऐश्वर्य्य को (वव्ने) किसी ने याचित किया हुआ देता है (अग्निः) पावक के तुल्य (मित्रा) मित्रों को (आवत्) पालन करता (उत) और (अग्निः) जाठराग्निवत् (उपस्तुतम्) शुभ गुणों से स्तुति करने योग्य (मेध्यातिथिम्) कारीगर विद्वान् को सेवे वही पुरुष राजा होने को योग्य होता है ॥१७॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यह भौतिक अग्नि विद्वानों का ग्रहण किया हुआ उनके लिये बल पराक्रम और सौभाग्य को देकर शिल्पविद्या में प्रवीण और उसके मित्रों की सदा रक्षा करता है वैसे ही प्रजा और सेना के भद्रपुरुषों से प्रार्थना किया हुआ यह सभाध्यक्ष राजा उनके लिये बल पराक्रम उत्साह और ऐश्वर्य्य का सामर्थ्य देकर युद्ध विद्या में प्रवीण और उनके मित्रों को सब प्रकार पाले ॥१७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुवीर्य - सौभग - सुरक्षण

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अग्निः) - वह अग्नणी प्रभु (सुवीर्य वव्ने) - उत्तम शक्ति के लिए याचना किया जाता है, अर्थात् उस प्रभु से उत्तम शक्ति की याचना करते हैं । शक्ति ही तो नीरोगता, निर्मलता व अन्य सद्गुणों की आधार है ।  २. (अग्निः) - वह अग्नणी प्रभु ही (कण्वाय) - मेधावी पुरुष के लिए (सौभगम्) - सौभाग्य को (वव्ने) - देता है । सब सौभाग्य ज्ञानमूलक हैं । हम ज्ञानपूर्वक कार्य करते हैं तो वे हमारे सौभाग्य के बढ़ानेवाले होते हैं । नासमझी से किये गये कार्य ही दौर्भाग्य को पैदा किया करते हैं ।  ३. (अग्निः) - वे अग्रणी प्रभु (मित्रा) - परस्पर स्नेह से रहनेवालों का (प्रावत्) - रक्षण करते हैं । इसके विपरीत 'मिथो विघ्नाना उप यन्तु मृत्युम्' परस्पर द्वेष करनेवाले मरा ही करते हैं, अर्थात् प्रभु की रक्षा का पात्र वह होता है जो निरन्तर पवित्र कर्मों की ओर चलता है ।  ४. (अग्निः) - वह अग्रणी प्रभु (उपस्तुतम्) - [उपगतैः गुणैः स्तूयते, दया०] प्राप्त गुणों के कारण प्रशंसित व्यक्ति को (सातौ) - धनादि की प्राप्ति में (प्रावत्) - रक्षित करता है, अर्थात् उपस्तुत को ही धन - प्राप्ति के योग्य बनाता है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु - कृपा से हमें 'सुवीर्य - सौभग व सुरक्षण' प्राप्त हो । हम 'कण्व - मित्र मेध्यातिथि व उपस्तुत' बनें ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(अग्निः) विद्युदिव सभाध्यक्षो राजा (वव्ने) याचते। वनु याचन इत्यस्माल्लडर्थे लिट् वन सम्भक्तावित्यस्माद्वा छन्दसो वर्णलोपो वा इत्यनेनोपधालोपः। (सुवीर्यम्) शोभनं शरीरात्मपराक्रमलक्षणं बलम् (अग्निः) उत्तमैश्वर्यप्रदः (कण्वाय) धर्मात्मने मेधाविने शिल्पिने (सौभगम्) शोभना भगा ऐश्वर्य योगा यस्य तस्य भावस्तम् (अग्निः) सर्वमित्रः (प्र) प्रकृष्टार्थे (आवत्) रक्षति प्रीणाति (मित्रा) मित्राणि। अत्र शेर्लोपः। (उत) अपि (मेध्यातिथिम्) मेध्याः संगमनीयाः पवित्रा अतिथयो यस्य तम् (अग्निः) सर्वाभिरक्षकः (सातौ) संभजन्ते धनानि यस्मिन्नयुद्धे शिल्पकर्मणि वा तस्मिन् (उपस्तुतम्) य उपगतैर्गुणैः स्तूयते तम् ॥१७॥

अन्वय:

पुनस्तेषां गुणा अग्नि दृष्टान्तेनोपदिश्यंते।

पदार्थान्वयभाषाः - यो विद्वान् राजाग्निरिव सातौ संग्रामे उपस्तुतं सुवीर्यमग्निरिव कण्वाय सौभगं वव्नेग्निरिव मित्राः सुहृदः प्रावदग्निरिवोताग्निरिव मेध्यातिथिं च सेवेत स एव राजा भवितुमर्हेत् ॥१७॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथायं भौतिकोग्निर्विद्वद्भिः सुसेवितः सन् तेभ्यो बलपराक्रमान् सौभाग्यं च प्रदाय शिल्पविद्याप्रवीणं तन्मित्राणि च सर्वदा रक्षति। तथैव प्रजा सेनास्थैर्भद्रपुरुषैर्याचितोयं सभाध्यक्षो राजा तेभ्यो बलपराक्रमोत्साहानैश्वर्य्यशक्तिं च दत्वा युद्धं विद्याप्रवीणान् तन्मित्राणि च सर्वथा पालयेत् ॥१७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni is mighty power for one who cares and prays for it. It is great good fortune for the man of knowledge. It is a great friend and protector in battle, and provides all help and encouragement to the man who is loved and admired by his colleagues and disciples.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued-

अन्वय:

That learned man who is like electricity in the battle, who prays for the admirable strength of the body and the soul and who gives prosperity to a highly intelligent righteous artist, who protects his friends and who like the fire serves the host of the holy guests (Sanyasis etc. ) deserves to be a King.

पदार्थान्वयभाषाः - ( अग्नि: ) विद्युदिव सभाध्यक्षो राजा = King as President of the Assembly who is full of splendor like electricity. ( वच्ने) याचते वनु याचने इत्यस्मात् लडर्थे लिट् वन संभक्तौ इत्यस्माद् छान्दसो वर्णलोपो वेत्यनेनोपधालोपः ।। = Begs or requests. ( सातो) संभजन्ते धनानि यस्मिन् युद्धे शिल्पकर्मणि वा = In the battle or industrial or artistic work.
भावार्थभाषाः - As this material fire when properly utilized by the learned, gives them strength and prosperity and protects an expert artist and his friends; in the same manner, the President of the Assembly, when requested by the men of army and others gives them strength and encouragement and wealth should preserve experts in the science of war and their friends.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसा हा भौतिक अग्नी विद्वानांनी ग्रहण केलेला असतो व त्यांच्यासाठी बल, पराक्रम व सौभाग्य देणारा असतो व शिल्पविद्येत प्रवीण असलेल्या त्याच्या मित्रांचे सदैव रक्षण करतो, तसेच प्रजा व सेनेच्या सज्जन माणसांनी प्रार्थित केलेल्या या सभाध्यक्ष राजाने त्यांच्यासाठी बल, पराक्रम, उत्साह व ऐश्वर्याचे सामर्थ्य द्यावे आणि युद्धविद्येत प्रवीण होऊन त्यांच्या मित्रांचे सर्व प्रकारे पालन करावे. ॥ १७ ॥