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देवता: अग्निः ऋषि: कण्वो घौरः छन्द: बृहती स्वर: मध्यमः
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घ॒नेव॒ विष्व॒ग्वि ज॒ह्यरा॑व्ण॒स्तपु॑र्जम्भ॒ यो अ॑स्म॒ध्रुक् । यो मर्त्यः॒ शिशी॑ते॒ अत्य॒क्तुभि॒र्मा नः॒ स रि॒पुरी॑शत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ghaneva viṣvag vi jahy arāvṇas tapurjambha yo asmadhruk | yo martyaḥ śiśīte aty aktubhir mā naḥ sa ripur īśata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

घ॒नाइ॑व । विष्व॑क् । वि । ज॒हि॒ । अरा॑व्णः । तपुः॑जम्भ । यः । अ॒स्म॒ध्रुक् । यः । मर्त्यः॑ । शिशी॑ते । अति॑ । अ॒क्तुभिः॑ । मा । नः॒ । सः । रि॒पुः । ई॒श॒त॒॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:36» मन्त्र:16 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:11» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:16


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी अगले मंत्र में उसी सभाध्यक्ष का उपदेश किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (तपुर्ज्जम्भ) शत्रुओं को सताने और नाश करने के शस्त्र बांधनेवाले सेनापते ! (विष्वक्) सर्वथा सेनादिबलों से युक्त होके आप (अराव्णः) सुखदानरहित शत्रुओं को (घनेव) घन के समान (विजहि) विशेष करके जीत और (यः) जो (मर्त्यः) मनुष्य (अक्तुभिः) रात्रियों से (अस्मद्ध्रुक्) हमारा द्रोही (अतिशिशीते) अति हिंसा करता हो (सः) सो (रिपुः) वैरी (नः) हम लोगों को पीड़ा देने में (मा) मत (ईशत) समर्थ होवें ॥१६॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में उपमा अलंकार है। सेनाध्यक्षादि लोग जैसे लोहा के घन से लोहे और पाषाणादिकों को तोड़ते हैं वैसे ही अधर्म्मी दुष्टशत्रुओं के अङ्गों को छिन्न-भिन्न कर दिन रात धर्म्मात्मा प्रजाजनों के पालन में तत्पर हों जिससे शत्रुजन इन प्रजाओं को दुःख देने को समर्थ न हो सकें ॥१६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अरावा - द्रोही व चोर' का नाश

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (तपुर्जम्भ) - [तपूंषि जम्भानि - आयुधानि यस्य] सन्तापकारी अस्त्रोंवाले प्रभो ! (अराव्णः) - राष्ट्र में उचित कर आदि न देनेवाले व्यक्तियों को (विष्वक् विजहि) - सब ओर से नष्ट कर दीजिए, उसी प्रकार नष्ट कर दीजिए (इव) - जैसेकि (घना) - दृढ़ पाषाण आदि से मृत्पिण्डों को नष्ट कर देते हैं ।  २. (यः) - जो भी (अस्मध्रुक्) - हम सबका द्रोह करता है और (यः मर्त्यः) - जो मनुष्य (अक्तुभिः) - रात्रियों के समय अति (शिशीते) - अतिशयेन क्षीण कर देता है अर्थात् धन - धान्यों को चुराकर हमारी अवस्था को क्षीण कर देता है (सः) - वह (रिपुः) - शत्रु (नः) - हमारा (मा ईशत) - ईश न बन जाए, अर्थात् हमपर प्रबल न हो जाए ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की व्यवस्था से कर व दान न देनेवालों का, दूसरों का द्रोह करनेवालों का तथा रात्रि में चोरी करके औरों का क्षय करनेवालों का प्राबल्य न हो, इन शत्रुओं का नाश ही हो ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(घनेव) घनाभिर्यष्टिभिर्यथा घटं भिनत्ति तथा (विष्वक्) सर्वतः (वि) विगतार्थे (जहि) नाशय (अराव्णः) उक्तशत्रून् (तपुर्जम्भ) तप संताप इत्यस्मादौणादिक उसिन् प्रत्ययः सन्ताप्यन्ते शत्रवो यैस्तानि तपूंषि। जभि नाशन इत्यस्मात् करणे घञ् जभ्यन्त एभिरिति जम्भान्यायुधानि तपूंष्येव जम्भानि यस्य भवतस्तत्संबुद्धौ (यः) मनुष्यः (अस्मद्ध्रुक्) अस्मान् द्रुह्यति यः सः (यः) (मर्त्त्यः) मनुष्यः (शिशीते) कृशं करोति। शो तनूकरण इत्यस्माल्लटि विकरणव्यत्ययेन श्यनः स्थाने श्लुरात्मनेपदं बहुलं छन्दसि इत्यभ्यासस्येत्वम्। ईहल्यधोः अ० ६।४।११३। इत्यनभ्यासस्येकारादेशश्च। (अति) अतिशये (अक्तुभिः) अञ्जंति मृत्युं नयन्ति यैस्तैः शस्त्रैः। अंजू धातोर्बाहुलकादौणादिकस्तुः प्रत्ययः (मा) निषेधार्थे (नः) अस्मान् (सः) (रिपुः) शत्रुः (ईशत) ईष्टां समर्थो भवतु। अत्र लोडर्थे लङ्, बहुलं छन्दसि इति शपो लुक् ॥१६॥

अन्वय:

पुनस्तदेवाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे तपुर्ज्जम्भ सेनापते विष्वक् त्वमराव्णोरीन् घनेन विजहि यो मर्त्त्योक्तुभिरस्मद्ध्रुगति शिशीते स रिपुर्नोस्मान् मेशत ॥१६॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। सेनापत्यादयो यथा घनेनायः पाषाणादीस्त्रोटयन्ति तथैव शत्रूणामङ्गानि त्रोटयित्वाऽहर्निशं धार्मिकप्रजापालनतत्पराः स्युर्यतोऽरय एते दुःखयितुन्नो शक्नुयुरिति ॥१६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of fire and justice, whosoever is jealous and destructive toward us, whosoever is ungenerous and an exploiter, destroy wholly with the blow of the thunderbolt. Whosoever bleeds humanity with instruments of torture and death, such an enemy must not rule over us.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

O Commander of the army, possessing powerful destructive weapons, smite down the wicked miserly persons right and left (as potter's ware) with club, Let not the man who plots against us in the night or is inimical to us, nor any foe prevail over us.

पदार्थान्वयभाषाः - ( तपुर्जम्भ ) तप सन्ताप इत्यस्मात् औणादिकः उसिन् प्रत्यय: सन्ताप्यन्ते शत्रवो यैस्तानि तपूंषि । जभि नाशने इत्यस्मात् करणे घञ् जभ्यन्ते एभिरिति जम्भति आयुधानि यस्य भवतस्तत् सम्बुद्धौ = Possessing destructive weapons. ( अक्तुभिः) अजंति मृत्युं नयन्ति यैस्तैः शस्त्रैः अजू धातोर्बाहुलकात औणादिकस्तुः प्रत्ययः । = From the arms that kill enemies. ( The other meaning of अक्तु according to the Nighantu is night अक्तुरिति रात्रि नाम (निघ० १.७)
भावार्थभाषाः - There is Upamalankar or simile used in the Mantra. The Commander of an army and others should smite down the limbs of their enemies as artisans break the stones etc. They should then be engaged day and night in preserving their own subjects, so that enemies may not be able to give them trouble.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. सेनापती इत्यादी लोक लोखंडाचे घण घालून जसे लोखंड व पाषाणांना तोडतात तसे अधर्मी दुष्ट शत्रूंना नष्टभ्रष्ट करून रात्रंदिवस धर्मात्मा प्रजेचे पालन करण्यास तत्पर असावे. ज्यामुळे शत्रू प्रजेला दुःख देण्यास समर्थ होऊ शकणार नाही. ॥ १६ ॥