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त्वम॑ग्ने प्रथ॒मो मा॑त॒रिश्व॑न आ॒विर्भ॑व सुक्रतू॒या वि॒वस्व॑ते। अरे॑जेतां॒ रोद॑सी होतृ॒वूर्येऽस॑घ्नोर्भा॒रमय॑जो म॒हो व॑सो ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvam agne prathamo mātariśvana āvir bhava sukratūyā vivasvate | arejetāṁ rodasī hotṛvūrye saghnor bhāram ayajo maho vaso ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम्। अ॒ग्ने॒। प्र॒थ॒मः। मा॒त॒रिश्व॑ने। आ॒विः। भ॒व॒। सु॒क्र॒तू॒ऽया। वि॒वस्व॑ते। अरे॑जेताम्। रोद॑सी॒ इति॑। हो॒तृ॒ऽवूर्ये॑। अस॑घ्नोः। भा॒रम्। अय॑जः। म॒हः। व॒सो॒ इति॑ ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:31» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:32» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे दोनों कैसे हैं, यह उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) परमात्मन् वा विद्वन् ! (प्रथमः) अनादिस्वरूप वा समस्त कार्यों में अग्रगन्ता (त्वम्) आप जिस (सुक्रतूया) श्रेष्ठ बुद्धि और कर्मों को सिद्ध करानेवाले पवन से (होतृवूर्ये) होताओं को ग्रहण करने योग्य (रोदसी) विद्युत् और पृथिवी (अरेजेताम्) अपनी कक्षा में घूमा करते हैं, उस (मातरिश्वने) अपनी आकाश रूपी माता में सोनेवाले पवन वा (विवस्वते) सूर्यलोक के लिये उनको (आविः भव) प्रकट कराइये । हे (वसो) सबको निवास करानेहारे ! आप शत्रुओं का (असघ्नोः) विनाश कीजिये, जिनसे (महः) बड़े-बड़े (भारम्) भारयुक्त यान को (अयजः) देश-देशान्तर में पहुँचाते हो, उनका बोध हमको कराइये ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - कारणरूप अग्नि अपने कारण और वायु के निमित्त से सूर्य रूप से प्रसिद्ध तथा अन्धकार विनाश करके पृथिवी वा प्रकाश का धारण करता है, वह यज्ञ वा शिल्पविद्या के निमित्त से कलायन्त्रों में संयुक्त किया हुआ बड़े-बड़े भारयुक्त विमान आदि यानों को शीघ्र ही देश-देशान्तर में पहुँचाता है ॥ ३ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु का प्रादुर्भाव

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अग्ने) - अग्रणी प्रभो! (त्वं प्रथमः) - आप विस्तारवाले हो तथा सर्वप्रथम हो । आप (विवस्वते) - परिचर्यावाले के लिए अथवा ज्ञान की रश्मियोंवाले के लिए (सुक्रतूया) - उत्तम कर्मों की प्रबल इच्छा से (मातरिश्वनः) - वायु के द्वारा - प्राणसाधना के द्वारा (आविर्भव) - प्रकट होते हो , अर्थात् प्रभु का दर्शन विवस्वान् , सुक्रतु तथा प्राणसाधक' को होता है । प्रभु - दर्शन के लिए परिचर्या [भक्ति] व ज्ञान आवश्यक हैं [विवसु] , प्रभु - दर्शन के लिए उत्तम कर्मों व संकल्पों का होना अनिवार्य है [सुक्रतु] तथा इस प्रभु से मेल के लिए प्राणसाधना आवश्यक है  २. प्रभु से मेल होने पर (रोदसी) - द्युलोक व पृथिवीलोक (अरेजेताम्) - [रेज् to shine] चमक उठते हैं । शरीर [पृथिवी] यदि स्वास्थ्य की दीप्ति से चमक उठता है तो मस्तिष्क ज्ञान की दीप्ति से चमक उठता है । [यहाँ रेज् धातु का 'चमकना' अर्थ लेना है , कॉपना नहीं] । हे प्रभो ! आप (होतृवूर्ये) - होता से वरण किये जाने पर (भारम्) - कार्यभार को (असघ्नोः) - [सघ् to accept , to bear] स्वीकार करते हो और बर्दाश्त करते हो और (अयजः) - उस - उस यज्ञ को पूर्ण करते हो । (महो) - आप महनीय हो , पूज्य हो तथा तेज के पुञ्ज हो । (वसो) - आप निवास के लिए आवश्यक सब तत्त्वों के देनेवाले हो । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम परिचर्या , उत्तम कर्म तथा प्राणसाधना के द्वारा प्रभु - दर्शन करें । प्रभु - दर्शन से हमारा शरीर स्वस्थ होगा तो मस्तिष्क ज्योति से चमक उठेगा । वस्तुतः भक्त के सब कार्य प्रभु ही पूर्ण किया करते हैं - सब यज्ञ आप से ही होते हैं - सर्वमहान् होता आप ही हैं । आप ही पूज्य हैं , सर्वप्रद हैं । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे अग्ने जगदीश्वर विद्वन् वा ! प्रथमस्त्वं येन सुक्रतूया मातरिश्वना होतृवूर्ये रोदसी द्यावापृथिव्यावरेजेतां तस्मै मातरिश्वने विवस्वते चाविर्भवैतौ प्रकटीभावय। हे वसो ! याभ्यां महो भारमयजो यजसि तौ नो बोधय ॥ ३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वम्) ईश्वरः सभाध्यक्षो वा (अग्ने) विज्ञापक (प्रथमः) कारणरूपेणाऽनादिर्वा कार्य्येष्वादिमः (मातरिश्वने) यो मातर्याकाशे श्वसिति सोऽयं मातरिश्वा वायुस्तत्प्रकाशाय (आविः) प्रसिद्धार्थे (भव) भावय (सुक्रतूया) शोभनः क्रतुः प्रज्ञाकर्म वा यस्मात् तेन। अत्र सुपां सुलुग्० इति याडादेशः। (विवस्वते) सूर्यलोकाय (अरेजेताम्) चलतः। भ्यसते रेजत इति भयवेपनयोः। (निरु०३.२१) (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ। रोदसी इति द्यावापृथिवीनामसु पठितम् । (निघं०३.३०) (होतृवूर्ये) होतॄणां स्वीकर्त्तव्ये। अत्र वॄ वरणे इत्यस्माद्बाहुलकादौणादिकः क्यप् प्रत्ययः। उदोष्ठ्यपूर्वस्य। (अष्टा०७.१.१०२) इत्यॄकारस्योकारः। हलि च इति दीर्घश्च। (असघ्नोः) हिंस्याः (भारम्) (अयजः) सङ्गमयसि (महः) महान्तम् (वसो) वासयति सर्वान् यस्तत्सम्बुद्धौ ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - कारणरूपोऽग्निः स्वकारणाद् वायुनिमित्तेन सूर्याकृतिर्भूत्वा तमो हत्त्वा पृथिवीप्रकाशौ धरति, स यज्ञशिल्पहेतुर्भूत्वा कलायन्त्रेषु प्रयोजितः सन् महाभारयुक्तान्यपि यानानि सद्यो गमयतीति ॥ ३ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light and knowledge, you are the first of existence and eternal wakeful presence. By your yajnic vibration of divine intention you manifest for the creation of Matarishva, universal energy of nature, and Vivasvan, the refulgent sun. By the same cause, the all- containing heaven and the generous earth, all productive, come into existence, move and shine. Haven and home of all, immanent power, bear the burden and create the mighty and subtle knowledge of the super power for us.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How are they is taught further in the 3rd Mantra.

अन्वय:

(1) O Omniscient God, Thou art eternal and it is under Thy direction, that the air which enables us to do many noble deeds causes the movement of the earth and the heaven which are accepted as good by all performers of the Yajnas (nonviolent sacrifices). Reveal to us the knowledge of the air and the sun. O Support of the Universe, enlighten us about the real nature of these two (the air and the sun) by which Thou upholdest the great burden of the heaven and the earth and dost not allow us to suffer.

पदार्थान्वयभाषाः - (मातरिश्वने) यो मातरि आकाशे श्वसिति सोऽयं मातरिश्वा वायुस्तस्मै = For the air. ( सुक्रतुया ) शोभन: ऋतुः प्रज्ञा कर्म वा यस्मात् तेन । अत्र सुपां सुलुक् इति याडादेशः = Which enables us to do noble deeds. (विवस्वते सूर्यलोकाय = For the solar world.(अयजः) संगमयसि = Thou Unifiest. (वसो) वासयति सर्वान् यस्तत्सम्बुद्धौ । = The Support of all.
भावार्थभाषाः - It is the Agni (fire) in the subtlest causal form that takes the form of the sun and dispels darkness and thus upholds the earth and the shining worlds. Being the cause of the Yajna and industries, when used methodically in the machines, it moves the heavy vehicles rapidly.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - कारणरूपी अग्नी आपले कारण व वायूच्या निमित्ताने सूर्यरूप बनतो व अंधःकार नष्ट करतो. तसेच पृथ्वी व प्रकाशाला धारण करतो. तो शिल्पविद्येच्या निमित्ताने कलायंत्रात संयुक्त केलेला असून, मोठमोठ्या भारयुक्त विमान इत्यादी यानांना तात्काळ देशदेशान्तरी पोहोचवितो. ॥ ३ ॥