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ए॒तेना॑ग्ने॒ ब्रह्म॑णा वावृधस्व॒ शक्ती॑ वा॒ यत्ते॑ चकृ॒मा वि॒दा वा॑। उ॒त प्र णे॑ष्य॒भि वस्यो॑ अ॒स्मान्त्सं नः॑ सृज सुम॒त्या वाज॑वत्या ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

etenāgne brahmaṇā vāvṛdhasva śaktī vā yat te cakṛmā vidā vā | uta pra ṇeṣy abhi vasyo asmān saṁ naḥ sṛja sumatyā vājavatyā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒तेन॑। अ॒ग्ने॒। ब्रह्म॑णा। वा॒वृ॒ध॒स्व॒। शक्ती॑। वा॒। यत्। ते॒। च॒कृ॒म। वि॒दा। वा॒। उ॒त। प्र। ने॒षि॒। अ॒भि। वस्यः॑। अ॒स्मान्। सम्। नः॒। सृ॒ज॒। सु॒ऽम॒त्या। वाज॑ऽवत्या ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:31» मन्त्र:18 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:35» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:18


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा हो, इसका प्रकाश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) सर्वोत्कृष्ट विद्वन् ! आप (ब्रह्मणा) वेदविद्या (वाजवत्या) उत्तम अन्न युद्ध और विज्ञान वा (सुमत्या) श्रेष्ठ विचारयुक्त से (नः) हमारे लिये (वस्यः) अत्यन्त धन (अभिसृज) सब प्रकार से प्रगट कीजिये (उत) और आप (विदा) अपने उत्तम ज्ञान से (वावृधस्व) नित्य-नित्य उन्नति को प्राप्त हूजिये (ते) आपका (यत्) जो प्रेम है, वह हम लोग (चकृम) करें और आप (अस्मान्) हम लोगों को (प्रणेषि) श्रेष्ठ बोध को प्राप्त कीजिये ॥ १८ ॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य वेद की रीति से धर्मयुक्त व्यवहार को करते हैं, वे ज्ञानवान् और श्रेष्ठमतिवाले होकर उत्तम विद्वान् की सेवा करते हैं, वह उनको श्रेष्ठ सामर्थ्य और उत्तम विद्या से संयुक्त करता है ॥ १८ ॥ इस सूक्त में सभा, सेनापति आदि के अनुयोगी अर्थों के प्रकाश से पिछले सूक्त के साथ इस सूक्त की सङ्गति जाननी चाहिये।
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शक्ति व सुमति

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अग्ने) परमात्मन् ! आप हमारे (एतेन) - इस (बह्मणा) - स्तोत्र से (वावृधस्व) - खूब ही बढ़िए (यत्ते) - जिस आपके स्तोत्र को (शक्ती वा विदा वा चकृम) - शक्ति या ज्ञान द्वारा करते हैं । वस्तुतः जब हम अपने शरीरों को शक्ति - सम्पन्न तथा मस्तिष्कों को ज्ञान - सम्पन्न बनाते हैं तब हमारे पिता - प्रभु प्रसन्न होते हैं । यह प्रभु का प्रसन्न होना ही उनका बढ़ना है । [नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः] निर्बल से प्रभु प्राप्य नहीं यह उपनिषद् - वाक्य 'शक्ति' के महत्त्व का प्रतिपादन कर रहा है और दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः "वह प्रभु सूक्ष्म बुद्धि से सूक्ष्मदर्शियों द्वारा देखा जाता है" , ये शब्द "बुद्धि" के महत्त्व के प्रतिपादक हैं । 'शक्ति व ज्ञान' की साधना ही प्रभु का आराधन है ।  २. जब हम प्रभु का अराधन करते हैं (उत) - तब हे प्रभो ! आप (अस्मान्) - हमें (वस्यः अभि) - उत्तम वसुओं की ओर (प्रणेषि) - ले - चलते हो , अर्थात् आपकी कृपा से हम उत्तम वसुओंवाले बनते हैं ।  ३. हे प्रभो ! आप कृपा करके (नः) - हमें (वाजवत्या) - शक्तिवाली (सुमत्या) - सुमति से (संसृज) - युक्त कीजिए । आपकी कृपा से ही तो हमें वह शक्ति व सुमति मिलती है , जिससे हमें आपका आराधन करना है । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु का आराधन शक्ति व सुमति से होता है और वे प्रभु हमें अतिशयेन वसुमान् बनाते हैं । 
टिप्पणी: विशेष—इस सूक्त का प्रारम्भ 'अग्नि , अंगिरा , ऋषि व देव' बनकर प्रभु के आराधन से होता है [१] । वे प्रभु 'मेधिर' हैं और हमारे शरीरों व मस्तिष्कों का निर्माण करनेवाले हैं [२] । प्रभु - दर्शन के लिए प्राणायाम आवश्यक है [३] । प्रभु - दर्शनवाला व्यक्ति प्राणिमात्र के हित करनेवाला होता है , इसे प्रभु नीरोगता , कीर्ति व ज्ञान प्राप्त कराते हैं [७] । प्रभु इसके लिए सम्पूर्ण धनों के देनेवाले होते हैं [९] । प्रभु का आदेश है कि 'सुवीर' बनो , 'व्रतपा' बनो और धन लाभ करो [१०] । प्रभु यज्ञशील के रक्षक हैं [११] । पवित्र दानवाले के लिए कवचरूप हैं [१४] । सौम्य पुरुषों के लिए मार्गदर्शक हैं [१६] । इस प्रभु का सच्चा उपासक 'शक्ति व ज्ञान' की प्राप्ति से ही होता है [१८] । शक्ति व ज्ञान की प्राप्ति के लिए वृत्र [वासना] का विनाश आवश्यक है । आधिदैविक जगत् में 'इन्द्र' सूर्य है , 'वृत्र' मेष है । यही अध्यात्म में आत्मा 'इन्द्र' और वासना 'वृत्र' हैं । आत्मा ने वासना का विनाश करके ही प्रभु को पाना है , इस प्रकार अब अगले सूक्त में इन्द्र द्वारा वृत्र के वध का वर्णन है । इस वृत्र का वध होने पर ही जैसे बाहर सूर्य चमक उठता है , उसी प्रकार वासना के विनष्ट होते ही ज्ञान का सूर्य दीप्त हो उठता है -
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृशो भवेदित्याह ॥

अन्वय:

हे अग्ने विद्वद्वर्य ! त्वं ब्रह्मणा वाजवत्या सुमत्या शक्ती शक्त्या नो वस्योऽभिसृज त्वमुत विदा वावृधस्व ते तव यत् प्रियाचरण तद्वयं चकृम, त्वं चास्मान् प्रणेषि सद्बोधं प्रापयसि ॥ १८ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (एतेन) वक्ष्यमाणेन (अग्ने) पाठशालाध्यापक ! (ब्रह्मणा) वेदेन (वावृधस्व) भृशमेधस्वैधय वा। अत्र वृधुधातोर्लोटि मध्यमैकवचने विकरणव्यत्ययेन श्लुरोरत्त्वम्, अन्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः। (शक्ती) आत्मसामर्थ्येन। अत्र सुपां सुलुग्० इति तृतीयैकवचनस्य पूर्वसवर्णादेशः। (वा) शरीरबलेन (यत्) आज्ञापालनाख्यं कर्म (ते) तव (चकृम) कुर्महे। अत्र लडर्थे लिट्। अन्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः। (विदा) विदन्ति येन ज्ञानेन। अत्र कृतो बहुलम् इति करणे क्विप्। (वा) योगक्रियया (उत) अपि (प्र) प्रकृष्टार्थे (नेषि) नयसि। अत्र बहुलं छन्दसि इति शपो लुक्। (अभि) आभिमुख्ये (वस्यः) अतिशयेन धनम्। अत्र वसुशब्दादीयसुन् प्रत्ययः। छान्दसो वर्णलोपो वा इत्यकारलोपः। (अस्मान्) विद्याधर्माचरणयुक्तान् विदुषो धार्मिकान् मनुष्यान् (सम्) एकीभावे (नः) अस्मभ्यम् (सृज) निष्पादय (सुमत्या) शोभना चासौ मतिर्विचारो यस्यां तया (वाजवत्या) वाजः प्रशस्तमन्नं युद्धं विज्ञानं वा विद्यते यस्यां तया ॥ १८ ॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्या वेदरीत्या धर्म्यं व्यवहारं कुर्वन्ति, ते ज्ञानवन्तः सुमतयो धार्मिका भूत्वा यं धार्मिकमुत्तमं विपश्चितं सेवन्ते स तान् श्रेष्ठसामर्थ्यसद्विद्यायुक्तान् सम्पादयतीति ॥ १८ ॥ अत्र सूक्त इन्द्रानुयोगिनः खलु प्राधान्येनेश्वरस्य गौण्या वृत्त्या भौतिकस्यार्थस्य प्रकाशनात् पूर्वसूक्तार्थेन सहैतस्य सङ्गतिरस्तीति बोध्यम् ।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light and fire of yajna, grow and let us grow by this divine voice of Veda, and by whatever we may do and achieve with our spiritual and physical strength or with our knowledge and action for the Divine. And bring us all-round wealth, and in-vest and exalt us with holy, creative and dynamic intelligence of a positive and victorious order.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should that Agni be is taught in the 18th Mantra.

अन्वय:

O best among the learned and the teachers, grow with the Vedic knowledge, with good intellect combined with good food and wisdom, with physical and spiritual power and knowledge of various kinds accompanied by Yoga and urge upon others to do so. We always try to obey and please you with the best of our power and ability. Please lead us onward to wealth ( spiritual as well material) by imparting us true education and proper instruction. Endow us with right understanding.

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) पाठशालाध्यापक = A teacher. (वस्यः ) अतिशयेन धनम् (अत्र वसुशब्दात् ईयसुन् प्रत्ययः। छान्दसो वर्णलोपो वेतीकारलोपः ।। = Abundant wealth. ( वाजवत्या) वाज:प्रशस्तमन्नं विज्ञानं वा विद्यते यस्यां तथा = Full of good food and wisdom.
भावार्थभाषाः - Those persons who act righteously according to the Vedic teachings, become wise, intelligent and righteous. The righteous, good learned person whom they serve, makes them full of good knowledge and power.
टिप्पणी: वाज इत्यन्न अन्न नाम ( निघ० २.७ ) = Food. The word बाज is derived from वज-गतौ गतेस्त्रयोऽर्था: ज्ञानंगमनं प्राप्तिश्च Here the first meaning of ज्ञान or knowledge has been taken by Rishi Dayananda. This hymn is connected with the previous hymn as the Devata or subject matter is Agni or Indra with various meanings. Here ends the 31st hymn of the first Mandala of Rigveda Sanhita.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे वेदाच्या रीतीने धर्मयुक्त व्यवहार करतात, ती ज्ञानी व श्रेष्ठमती बनून उत्तम विद्वानाची सेवा करतात. तो त्यांना श्रेष्ठ सामर्थ्यवान व उत्तम विद्यायुक्त करतो. ॥ १८ ॥