वांछित मन्त्र चुनें

म॒नु॒ष्वद॑ग्ने अङ्गिर॒स्वद॑ङ्गिरो ययाति॒वत्सद॑ने पूर्व॒वच्छु॑चे। अच्छ॑ या॒ह्या व॑हा॒ दैव्यं॒ जन॒मा सा॑दय ब॒र्हिषि॒ यक्षि॑ च प्रि॒यम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

manuṣvad agne aṅgirasvad aṅgiro yayātivat sadane pūrvavac chuce | accha yāhy ā vahā daivyaṁ janam ā sādaya barhiṣi yakṣi ca priyam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

म॒नु॒ष्वत्। अ॒ग्ने॒। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। अ॒ङ्गि॒रः॒। य॒या॒ति॒ऽवत्। सद॑ने। पू॒र्व॒ऽवत्। शु॒चे॒। अच्छ॑। या॒हि॒। आ। व॒ह॒। दैव्य॑म्। जन॑म्। आ। सा॒द॒य॒। ब॒र्हिषि॑। यक्षि॑। च॒। प्रि॒यम् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:31» मन्त्र:17 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:35» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:17


817 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (शुचे) पवित्र (अङ्गिरः) प्राण के समान धारण करनेवाले (अग्ने) विद्याओं से सर्वत्र व्याप्त सभाध्यक्ष ! आप (मनुष्वत्) मनुष्यों के जाने-आने के समान वा (अङ्गिरस्वत्) शरीरव्याप्त प्राणवायु के सदृश राज्यकर्म व्याप्त पुरुष के तुल्य वा (ययातिवत्) जैसे पुरुष यत्न के साथ कामों को सिद्ध करते कराते हैं वा (पूर्ववत्) जैसे उत्तम प्रतिष्ठावाले विद्वान् विद्या देनेवाले हैं, वैसे (प्रियम्) सबको प्रसन्न करनेहारे (दैव्यम्) विद्वानों में अति चतुर (जनम्) मनुष्य को (अच्छ) अच्छे प्रकार (आयाहि) प्राप्त हूजिये, उस मनुष्य को विद्या और धर्म की ओर (वह) प्राप्त कीजिये तथा (बर्हिषि) (सदने) उत्तम मोक्ष के साधन में (आसादय) स्थित और (यक्षि) वहाँ उसको प्रतिष्ठित कीजिये ॥ १७ ॥
भावार्थभाषाः - जिन मनुष्यों ने विद्या धर्मानुष्ठान और प्रेम से सभापति की सेवा की है, वह उनको उत्तम-उत्तम धर्म के कामों में लगाता है ॥ १७ ॥
817 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मनु - अंगिरा - ययाति व पूर्व बनना

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र में मार्ग से भटक जाने का उल्लेख था । प्रभु से प्रार्थना की थी कि हे प्रभो ! आप हम विनीत भक्तों का मार्गदर्शन कीजिए । प्रभु प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि हे (अग्ने) - प्रगतिशील जीव और अतएव (अंगिरः) - अंगों में रसवाले तथा (शुचे) - पवित्र जीवनवाले जीव ! तू (मनुष्यवत्) - मननशील ज्ञानी पुरुष की भाँति (अंगिरस्वत्) - अंग - अंग में रसवाले , अर्थात् जीवन से परिपूर्ण पुरुष की भाँति (ययातिवत्) - [वायो इव यातिः यस्य] वायु की भाँति सतत क्रियाशील पुरुष की भाँति तथा (पूर्ववत्) - [पूर्वति] अपना पूर्ण करनेवाले की भाँति (सदने) - अपने घर में (अच्छ) - उस प्रभु की ओर (याहि) - जानेवाला बन । एवं , प्रभु की प्रथम प्रेरणा यह है कि तू विचारशील , रसमय अंगोंवाला , वायु की भाँति क्रियाशील व जीवन में अच्छाइयों का पूरण करनेवाला बन ।  २. अपने इस घर में तू सदा (दैव्यं जनम्) - प्रभु के बन्दों को , अर्थात् प्रभु की ओर चलनेवाले पवित्र दिव्य पुरुषों को (आवह) - सब ओर से अपने घर में प्राप्त करानेवाला हो । इन विद्वान् , व्रती अतिथियों का सम्पर्क तुझे सदा उत्तम प्रेरणा प्राप्त करानेवाला होगा । यह अतिथि - यज्ञ तुझे अन्ततः प्रभु का अतिथि बनाएगा - तू प्रभु को प्राप्त करनेवाला होगा ।  ३. प्रतिदिन प्रातः - सायं तू उस प्रभु को (बर्हिषि) - अपने इस वासनाशून्य हृदय में (आसादय) - बिठाने का सर्वथा प्रयत्न कर । तू हृदय - देश में प्रभु का ध्यान कर । सदा हृदयस्थ प्रभु के समीप तू भी बैठ । दो क्षण के लिए यह प्रभु के समीप बैठना तुझे पवित्र जीवनवाला बनाएगा ।  ४. इस प्रकार प्रतिदिन प्रभु के समीप बैठने से तू प्रियं च यक्षि - प्रिय बातों की अपने साथ संगत करनेवाला बन । तेरे जीवन में वे ही कर्म स्थान पाएँ , जो माधुर्य को लिये हुए हों । 'मधुमन्मे निक्रमणं मधुमन्मे पराणम्' इन शब्दों के अनुसार तेरा आना - जाना भी मधुर हो 'वाचा  वदामि मधुवत्' वाणी से तू मीठा ही बोले ॥ 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ‘हम मनु - गिरा - ययाति व पूर्व’ बनें । हमारे घर में सज्जनों का आना हो । हृदय में प्रभु का ध्यान हो और हम अपने जीवन में प्रिय बातों को करें । 
817 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स एवोपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे शुचेऽङ्गिरोऽग्ने सभापते ! त्वं विनयायाभ्यां मनुष्वदङ्गिरस्वद्ययातिवत्पूर्ववत् प्रियं दैव्यं जनमच्छायाहि तं च विद्याधर्मं प्रति वह प्रापय बर्हिष्यासादय सदने यक्षि याजय च ॥ १७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (मनुष्वत्) यथा मनुष्या गच्छन्ति तद्वत् (अग्ने) सर्वाभिगन्तः सभेश ! (अङ्गिरस्वत्) यथा शरीरे प्राणा गच्छन्त्यागच्छन्ति तद्वत् (अङ्गिरः) पृथिव्यादीनामङ्गानां प्राणवद्धारक ! (ययातिवत्) यथा प्रयत्नवन्तः पुरुषाः कर्माणि प्राप्नुवन्ति प्रापयन्ति च तद्वत्। अत्र यती प्रयत्न इत्यस्मादौणादिक इन् प्रत्ययः स च बाहुलकाण्णित् सन्वच्च। इदं सायणाचार्य्येण भूतपूर्वस्य कस्यचिद् ययाते राज्ञः कथासम्बन्धे व्याख्यातं तदनजर्यम् (सदने) सीदन्ति जना यस्मिंस्तस्मिन् (पूर्ववत्) यथा पूर्वे विद्वांसो विद्यादानार्थं गच्छन्त्यागच्छन्ति तद्वत् (शुचे) पवित्रकारक (अच्छ) श्रेष्ठार्थे (याहि) प्राप्नुहि (आ) समन्तात् (वह) प्रापय । अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (दैव्यम्) देवेषु विद्वत्सु कुशलस्तम् (जनम्) मनुष्यम् (आ) आभिमुख्ये (सादय) अवस्थापय (बर्हिषि) उत्तमे मोक्षपदेऽन्तरिक्षे वा (यक्षि) याजय वा। अत्र सामान्यकाले लुङडभावश्च। (च) (प्रियम्) सर्वाञ्जनान् प्रीणन्तम् ॥ १७ ॥
भावार्थभाषाः - यैर्मनुष्यैर्विद्यया धर्मानुष्ठानेन प्रेम्णा सेवितः सभापतिः स तानुत्तमेषु धर्म्येषु व्यवहारेषु प्रेरयति ॥ १७ ॥
817 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of the world, Angira, life-breath of existence, the very light of purity, come well beautifully, come like a human presence, come like the breath of freshness, come like the effort and achievement of life, come as ever before. Come to the dear holy man of divinity, bear him on to knowledge and Dharma, seat him on the sacred grass of the vedi in the house of yajna, and conduct the yajna for us unto the light of heaven.
817 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject of Agni is continued.

अन्वय:

O Agni (President of the Assembly going to all places for supervision etc.) O pure upholder of the earth like the Prana, (Vital breath) like good men, like the Pranas, like industrious persons doing good deeds, like experienced old people, approach a dear learned person with humility and justice. Lead him towards knowledge and Dharma (righteousness) and with their help towards emancipation. Ask him to sit in a proper place like the Yajna Shala or altar and make him perform the Yajna (non-violent sacrifice).

पदार्थान्वयभाषाः - ( मनुष्वत्) यथा मनुष्या गच्छन्ति तद्वत् । = Like the conduct of good men. (अङ्गिरस्वत As the Pranas (vital airs in the body). (अंगिर:) पृथिव्यादीनाम् अंगानां प्राणवद्धारक । = Upholder of the earth etc. as the vital breath.( ययातिवत् ) यथा प्रयत्नवन्तः पुरुषाः कर्माणि प्राप्नुवन्ति प्रापयन्ति च । As industrious persons perform actions and cause others to do. (बर्हिषि) उत्तमे मोक्षपदेऽन्तरिक्षे वा । = In the best state of emancipation or in the firmament.
भावार्थभाषाः - The President of the Assembly, when served by men with the acquisition of knowledge, the observance of the Dharma (rules of righteousness) and with love, urges upon them to discharge their duties properly.
टिप्पणी: In this Mantra, the words like मनुष्वत् अंगिरस्वत् and ययातिवत् are found, which Sayanacharya, Wilson, Griffith and many other commentators of the East and the West have misinterpreted taking the words मनु, अंगिरा and Yayati as proper nouns denoting the names of some individuals. According to all the shastras (including the Brahmanas, Six Systems of Philosophy the Smritis, the Upanishads, the Ramayana, the Maha Bharat and others) the Vedas being eternal, cannot have any historical references, therefore this historical interpretation can not hold good and is directly opposed to the principles of Meemansa of the sage Jaimini who is an authority on the system of interpretation of the Vedas. Jaimini has clearly stated.आख्या प्रवचनात् । परन्तु श्रुति सामान्यमात्रम् । (Meemansa by Acharya Jaimini Chap. 1) As to the derivative meanings given by Rishi Dayananda for the words like Manush, Angiras and Yayati that occur in the Mantra, they are authentic being based upon the Brahmanas and the root-meaning. Manush is from मनु-अवबोधे or ज्ञाने So it means a thoughtful man. In the Shatapath Brahmana 8.6.3.18 it is stated विद्वान्सस्ते मनवः i. e. learned persons are called Manus. (शत० ८.६.३.१८) In the Aitareya Brahmana 2.34 it is stated while explaining the Mantra portion अग्निहोता मनुवृत:- अयम् ग्निर्हि सर्वतो मनुष्यैः वृत: Rishi Dayananda has interpreted अग्निरस्वत् in the Mantra as यथा शरीरे प्राणा गच्छन्त्यागच्छन्ति तद्वत् So Angiras has been taken to mean or vital breath. This is well-authenticated as based upon the Shatapath Brahmana 6.1.2.28 and 6.5.2.3-4 where it is clearly stated- प्राणो वा अंगिरा: (शत० ६.१.२८.६५.२.३.४) Angira means Prana, or Vital breath. The word Yayati is derived from यति-प्रयत्ने so it means an industrious person as explained by Rishi Dayananda. He has rightly remarked about Sayanacharya's interpretation that it is wrong as he (Sayana) considers Yayati to be a historical personge. इदं सायणाचार्येण भूतपूर्वस्य कस्यचिद् ययातेः राज्ञः कथासम्बन्धे व्याख्यातं तदशुद्धम् || The reason has been pointed out above. Such an interpretation is also against Sayanacharya's own Introduction to his commentary of the Rigveda where he has proved that the Vedas are eternal.
817 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे विद्या, धर्मानुष्ठान व प्रेम यांनी सभापतीची सेवा करतात त्यांना तो उत्तम धर्म व व्यवहार कार्यात लावतो. ॥ १७ ॥