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इ॒माम॑ग्ने श॒रणिं॑ मीमृषो न इ॒ममध्वा॑नं॒ यमगा॑म दू॒रात्। आ॒पिः पि॒ता प्रम॑तिः सो॒म्यानां॒ भृमि॑रस्यृषि॒कृन्मर्त्या॑नाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

imām agne śaraṇim mīmṛṣo na imam adhvānaṁ yam agāma dūrāt | āpiḥ pitā pramatiḥ somyānām bhṛmir asy ṛṣikṛn martyānām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒माम्। अ॒ग्ने॒। श॒रणि॑म्। मी॒मृ॒षः॒। नः॒। इ॒मम्। अध्वा॑नम्। यम्। अगा॑म। दू॒रात्। आ॒पिः। पि॒ता। प्रऽम॑तिः। सो॒म्याना॑म्। भृमिः॑। अ॒सि॒। ऋ॒षि॒ऽकृत्। मर्त्या॑नाम् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:31» मन्त्र:16 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:35» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:16


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अगले मन्त्र में भी उसी अर्थ का प्रकाश किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) सबको सहनेवाले सर्वोत्तम विद्वान् ! जो आप (सोम्यानाम्) शान्त्यादि गुणयुक्त (मर्त्यानाम्) मनुष्यों को (आपिः) प्रीति से प्राप्त (पिता) और सर्वपालक (प्रमतिः) उत्तम विद्यायुक्त (भृमिः) नित्य भ्रमण करने और (ऋषिकृत्) वेदार्थ को बोध करानेवाले हैं तथा (नः) हमारी (इमाम्) इस (शरणिम्) विद्यानाशक अविद्या को (मीमृषः) अत्यन्त दूर करने हारे हैं, वे आप और हम (यम्) जिसको हम लोग (दूरात्) दूर से उल्लङ्घन करके (इमम्) वक्ष्यमाण (अध्वानम्) धर्ममार्ग के (अगाम) सन्मुख आवें, उसकी सेवा करें ॥ १६ ॥
भावार्थभाषाः - जब मनुष्य सत्यभाव से अच्छे मार्ग को प्राप्त होना चाहते हैं, तब जगदीश्वर उनको उत्तम ज्ञान का प्रकाश करनेवाले विद्वानों का संग होने के लिये प्रीति और जिज्ञासा अर्थात् उनके उपदेश के जानने की इच्छा उत्पन्न करता है। इससे वे श्रद्धालु हुए अत्यन्त दूर भी बसनेवाले सत्यवादी योगी विद्वानों के समीप जाय, उनका संग कर अभीष्ट बोध को प्राप्त होकर धर्मात्मा होते हैं ॥ १६ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मर्त्य से ऋषि बनना

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अग्ने) - प्रभो ! (नः) - हमारी (इमाम्) - इस (शरणिम्) - [शृ हिंसायाम्] व्रत - लोप त्रुटि को (मीमृषः) - क्षमा कीजिए अथवा मसल डालिए , समाप्त कर दीजिए । (यम्) - जिस (इमम्) - इस (अध्वानम्) - मार्ग से हम दूर चले गये हैं उस हमारी भूल को क्षमा कीजिए । (आपिः) - आप ही हमारे बन्धु हैं , (पिता) - रक्षक हैं , (प्रमतिः) - प्रकृष्ट मति के देनेवाले आचार्य हैं । आपने ही हम भटके हुओं को मार्ग पर लाना है । एक बन्धु की भाँति , पिता की भाँति , आचार्य की भाँति आपने ही तो हमें सन्मार्ग का दर्शन कराना है । हम भटक भी गये हैं तो आपके क्रोध के पात्र न होकर आपकी दया [Merey मृष] के ही तो पात्र हैं  २. हे प्रभो ! (सोम्यानाम्) - सौम्य स्वभाववाले हम लोगों के आप ही (भृमिः असि) - मुख मोड़नेवाले हैं , अर्थात् ठीक दिशा के दिखलानेवाले हैं , हृदयस्थ रूपेण आप ही सतत प्रेरणा देते हुए हमें मार्ग का दर्शन कराते हैं , हमारे कर्तव्याकर्तव्य का बोध देते हैं । इस प्रकार पवित्र बनाकर आप (मर्त्यानां ऋषिकृत्) - सामान्य मनुष्यों को ऋषिकोटि में पहुँचा देते हैं । हमें भी आप अवश्य ही इस श्रेणी में लाने की कृपा करेंगे । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही हमारे बन्ध , पिता व आचार्य हैं । वे हमारी त्रुटियों को मसल व नष्ट करके , हम विनीत बननेवालों को सन्मार्ग दिखलाते हैं और हमें सामान्य मनुष्य से ऋषि बना देते हैं । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स एवार्थः प्रकाश्यते ॥

अन्वय:

हे अग्ने विद्वंस्त्वं सोम्यानां मर्त्यानामापिः पिता प्रमतिर्भृमिर्ऋषिकृदसि न इमां शरणिम् मीमृषो वयं दूरादध्वानमतीत्यागाम नित्यमभिगच्छेम तं त्वं वयं च सेवेमहि ॥ १६ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इमाम्) वक्ष्यमाणाम् (अग्ने) सर्वंसहानुत्तमविद्वन्! (शरणिम्) अविद्यादिदोषहिंसिकां विद्याम्। अत्र शृधातोर्बाहुलकादौणादिकोऽनिः प्रत्ययः। (मीमृषः) अत्यन्तं निवारयसि। अत्र लडर्थे लुङडभावश्च। (नः) अस्माकम् (इमम्) वक्ष्यमाणम् (अध्वानम्) धर्ममार्गम् (यम्) मार्गम् (अगाम) जानीयाम प्राप्नुयाम वा । अत्र इण्धातोर्लिङर्थे लुङ्। (दूरात्) विकृष्टात् (आपिः) यः प्रीत्या प्राप्नोति सः (पिता) पालकः (प्रमतिः) प्रकृष्टा मतिर्यस्य (सोम्यानाम्) ये सोमे साधवः सोमानर्हन्ति तेषां पदार्थानाम् (भृमिः) यो नित्यं भ्रमति। भ्रमेः सम्प्रसारणं च । (उणा०४.१२६) अनेन भ्रमुधातोरिन् प्रत्ययः सम्प्रसारणं च स च कित्। (असि) (ऋषिकृत्) ऋषीन् ज्ञानवतो मन्त्रार्थद्रष्टॄन् कृपया ध्यानोपदेशाभ्यां करोति। अत्र कृतो बहुलम् इति करणे क्विप्। (मर्त्यानाम्) मनुष्याणाम् ॥ १६ ॥
भावार्थभाषाः - यदा मनुष्याः सत्यभावेन सन्मार्गं प्राप्तुमिच्छन्ति तदा जगदीश्वरस्तेषां सत्पुरुषसङ्गाय प्रीतिजिज्ञासे जनयति, ततस्ते श्रद्धालवः सन्तोऽतिदूरेऽपि वसत आप्तान् योगिनो विदुष उपसंगम्याभीष्टं बोधं प्राप्य धार्मिका जायन्ते ॥ १६ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light and knowledge, remove this destructive ignorance of ours so that we come back to the right path from afar. Lord of vision and wisdom, giver of the light divine, omnipresent, ever on the move, immanent and accessible to the people of peace and piety, father, save us, redeem us, bless us.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

O learned man, you are kith & kin, father and protector of persons of quiet nature, most wise, going from place to place to preach Dharma, making mortal people seers, please dispel the darkness of our ignorance. May we who have left the path of un- righteousness and come to the path of righteousness always follow it.

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) सर्वसह अनुत्तम विद्वन् = Learned best person, bearing all with equanimity. (शरणिम्) विद्याद्यदोषहिंसिकां विद्याम् = True knowledge which dispels the darkness of evil. (मीमृष:) अत्यन्तं निवारयसि = Dispel. ( आपिः ) यः प्रीत्या प्राप्नोति सः Kith & Kin who approach lovingly. (ऋषिकृत् ) ऋतवतो मन्त्रार्यद्रष्टृन कृपया ध्यानोपदेशाभ्यां करोति अत्र कृत्यो बहुलमिति करणे क्विप् = He who makes people the seers of the Vedic Mantra-S the knowers of their secret.
भावार्थभाषाः - When men sincerely desire to get the true path, then God creates in them love and desire to know the Truth from the association with noble persons. Then they being full of faith, having approached truly learned and truthful Yogis, acquire true knowledge and become righteous.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जेव्हा माणसे सत्यभावाने सन्मार्ग प्राप्त करण्याची इच्छा करतात तेव्हा जगदीश्वर त्यांना सत्पुरुष विद्वानांचा संग उपलब्ध करून देतो, तसेच प्रेम व जिज्ञासा अर्थात त्यांचा उपदेश जाणण्याची इच्छा उत्पन्न करतो. त्यामुळे ते श्रद्धाळू अत्यंत दूर असलेल्या सत्यवादी योगी विद्वानाजवळ जाऊन त्यांचा संग करून अभीष्ट बोध प्राप्त करून धर्मात्मा बनतात. ॥ १६ ॥