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त्वम॑ग्ने॒ प्रम॑ति॒स्त्वं पि॒तासि॑ न॒स्त्वं व॑य॒स्कृत्तव॑ जा॒मयो॑ व॒यम्। सं त्वा॒ रायः॑ श॒तिनः॒ सं स॑ह॒स्रिणः॑ सु॒वीरं॑ यन्ति व्रत॒पाम॑दाभ्य ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvam agne pramatis tvam pitāsi nas tvaṁ vayaskṛt tava jāmayo vayam | saṁ tvā rāyaḥ śatinaḥ saṁ sahasriṇaḥ suvīraṁ yanti vratapām adābhya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम्। अ॒ग्ने॒। प्रऽम॑तिः। त्वम्। पि॒ता। अ॒सि॒। नः॒। त्वम्। व॒यः॒ऽकृत्। तव॑ जा॒मयः॑। व॒यम्। सम्। त्वा॒। रायः॑। श॒तिनः॒। सम्। स॒ह॒स्रिणः॑। सु॒वीर॑म्। य॒न्ति॒। व्र॒त॒ऽपाम्। अ॒दा॒भ्य॒ ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:31» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:33» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:10


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अदाभ्य) उत्तम कर्मयुक्त (अग्ने) यथायोग्य रचना कर्म जाननेवाले सभाध्यक्ष ! (प्रमतिः) अत्यन्त मान को प्राप्त हुए (त्वम्) समस्त सुख से प्रकट करनेवाले आप (नः) हम लोगों के (पिता) पालनेवाले तथा (त्वम्) आयुर्दा के बढ़वाने हारे तथा आप हम लोगों को (वयःकृत्) बुढ़ापे तक विद्या सुख में आयुर्दा व्यतीत कराने हारे हैं (तव) सुख उत्पन्न करनेवाले आपकी कृपा से हम लोग (जामयः) ज्ञानवान् सन्तानयुक्त हों, दयायुक्त (त्वम्) आप वैसा प्रबन्ध कीजिये और जैसे (शतिनः) सैकड़ों वा (सहस्रिणः) हजारों प्रशंसित पदार्थविद्या वा कर्म युक्त विद्वान् लोग (व्रतपाम्) सत्य पालनेवाले (सुवीरम्) अच्छे-अच्छे वीर युक्त आपको प्राप्त होकर (रायः) धन को (सम्) (यन्ति) अच्छी प्रकार प्राप्त होते हैं, वैसे आपका आश्रय किये हुए हम लोग भी उन धनों को प्राप्त होवें ॥ १० ॥
भावार्थभाषाः - जैसे पिता सन्तानों को मान और सत्कार करने के योग्य है, वैसे प्रजाजनों को सभापति राजा है ॥ १० ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुवीर - व्रतपा

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अग्ने) - अग्रणी प्रभो ! (त्वं प्रमतिः) - आप प्रकृष्ट मतिवाले हो - आपका दिया हुआ वेदज्ञान सर्वोत्कृष्ट ज्ञान है , (त्वं नः पिता असि) - आप ही इस ज्ञान को देकर हमारे रक्षण करनेवाले पिता हैं । इस रक्षण के द्वारा (वयः कृत्) - आप हमारे उत्कृष्ट जीवन के कारणभूत हो । (वयम्) - हम (तव जामयः) - आपके ही तो बन्धुभूत हैं , अर्थात् आप ही हमारे 'आचार्य , पिता , जीवनदाता व बन्धु' सब - कुछ हो । आपने ही तो हमारा पालन - पोषण व शिक्षण करना है ।  २. इस प्रार्थना को सुनकर प्रभु कहते हैं कि हे (अदाभ्य) - वासनाओं से हिंसित न होनेवाले जीव ! (सुवीरम्) - उत्कृष्ट वीरतावाले तथा (व्रतपाम्) - व्रत का पालन करनेवाले अथवा (शतिनः) - शतसंख्यायुक्त व (सहस्त्रिणः) - सहस्त्रसंख्यायुक्त (रायः) - धन - सम्पत्ति सम्यक् प्राप्त होते हैं अथवा (शतिनः) - सौ वर्ष तक चलनेवाले जीवन के कारणभूत तथा (सहस्त्रिणः) - सदा आनन्द को प्राप्त करानेवाले धन इस 'सुवीर , व्रतपा' को प्राप्त होते हैं ।  ३. जीव ने प्रार्थना की है कि हे प्रभो ! आप ही मेरे सब - कुछ हो । प्रभु ने उत्तर दिया कि तू [क] वासनाओं से अहिंसित बन , [ख] उत्तम वीर बन - वासनाओं के विनष्ट होने पर वीर्यरक्षण से तू वीर बनेगा ही । वीर बनकर व्रतों का पालन करनेवाला हो । ऐसा होने पर तुझे आजीवन आनन्दप्रद धन - सम्पत्तियाँ प्राप्त होंगी । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - 'सुवीर व व्रतपा' सदा शक्तिशाली बनता है । यह प्रभु को ही पिता , आचार्य व बन्धु मानता है । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुन सः कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे अदाभ्याग्ने सभाध्यक्ष प्रमतिस्त्वं नोऽस्माकं पिता पालकोऽसि त्वं नोऽस्माकं वयःकृदसि तव कृपया वयं जामयो यथा भवेम तथा कुरु यथा च शतिनः सहस्रिणो विद्वांसो मनुष्या व्रतपां सुवीरं त्वामासाद्य रायो धनानि संयन्ति, तथा त्वामाश्रित्य वयमपि तानि धनानि समिमः ॥ १० ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वम्) सर्वस्य सुखस्य प्रादुर्भाविता (अग्ने) यथायोग्यरचनस्य वेदितः (प्रमतिः) प्रकृष्टा मतिर्मानं यस्य सः (त्वम्) दयालुः (पिता) पालकः (असि) (नः) अस्माकम् (त्वम्) आयुऽप्रद (वयस्कृत्) यो वयो वृद्धावस्थापर्यन्तं विद्यासुखयुक्तमायुः करोति सः (तव) सुखजनकस्य (जामयः) ज्ञानवन्त्यपत्यानि। जमतीति गतिकर्मसु पठितम् । (निघं०२.१४) अत्र जमुधातोः। इणजादिभ्यः। (अष्टा०३.३.१०८) अनेनेण् प्रत्ययः । जमतेर्वा स्याद् गतिकर्म्मणः। (निरु०३.६) (वयम्) मनुष्याः (सम्) एकीभावे (त्वा) त्वाम् सर्वपालकम् (रायः) धनानि। राय इति धननामसु पठितम् । (निघं०२.१०) (शतिनः) शतमसंख्याताः प्रशंसिता विद्याकर्माणि वा विद्यन्ते येषां ते। (सहस्रिणः) अत्र उभयत्र प्रशंसार्थ इनिः। (सुवीरम्) शोभना वीरा यस्मिन् येन वा तत् (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (व्रतपाम्) यो व्रतं सत्य पाति तम् (अदाभ्य) दभितुं हिंसितुं योग्यानि दाभ्यानि तान्यविद्यमानानि यस्य तत्सम्बुद्धौ। अत्र दभेश्चेति वक्तव्यम्। (अष्टा०३.१.१२४) अनेन वार्त्तिकेन दभ इति सौत्राद्धातोर्ण्यत् ॥ १० ॥
भावार्थभाषाः - यथा पिता सन्तानैर्माननीयः पूजनीयश्चास्ति, तथा प्रजाजनैस्सभापती राजास्ति ॥ १० ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, light of the world, you are the power of exalted knowledge. You are our father and protector. You are the giver of life for us, life ever new. We are your children of enlightenment. The wealths of the world in hundred forms in a thousand streams flow unto you, lord inviolable, bravest of the brave, observer and protector of the laws of life and nature.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is He (God) is told in the tenth Mantra.

अन्वय:

O inviolable enlightened president of the council of ministers thou art of exalted wisdom. Thou being kindhearted art our father. Thou art giver of new life to us endowed with knowledge and happiness. By thy grace, may we be like thy good children endowed with knowledge. As hundreds and thousands of highly learned persons obtain good wealth having approached thee who art very brave and observer of truth and other vows, so let us also acquire much wealth of all kinds.

भावार्थभाषाः - As a father is to be honored and revered by his
टिप्पणी: Rishi Dayananda explains मधु as मधुरगुणविशिष्टं विज्ञानम् for it is derived from मन्- ज्ञाने मनेर्धश्छन्दसि ( उणादि० २.११६ ) मन्यते बुध्य ते यत् येन या तद् मधु Sweet knowledge क्षदसे has been interpreted by the Rishi as अविधारोगान्धकारविनाशकबलाय as the word is derived from क्षदति :- शकजीकरणार्थ: In Apte's well-known Sanskrit-English Dictionary, we find the following note on Ved. To cut, to kill, to consume. So Rishi Dayananda's interpretation is substantiated by the root-meaning.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जसा पिता संतानांना माननीय व पूजनीय असतो तसे प्रजेला राजा असतो. ॥ १० ॥