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ओमा॑सश्चर्षणीधृतो॒ विश्वे॑ देवास॒ आग॑त। दा॒श्वांसो॑ दा॒शुषः॑ सु॒तम्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

omāsaś carṣaṇīdhṛto viśve devāsa ā gata | dāśvāṁso dāśuṣaḥ sutam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ओमा॑सः। च॒र्ष॒णि॒ऽधृतः॒। विश्वे॑। दे॒वा॒सः॒। आ। ग॒त॒। दा॒श्वांसः॑। दा॒शुषः॑। सु॒तम्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:3» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:6» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:1» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

ईश्वर ने अगले मन्त्र में विद्वानों के लक्षण और आचरणों का प्रकाश किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - (ओमासः) जो अपने गुणों से संसार के जीवों की रक्षा करने, ज्ञान से परिपूर्ण, विद्या और उपदेश में प्रीति रखने, विज्ञान से तृप्त, यथार्थ निश्चययुक्त, शुभगुणों को देने और सब विद्याओं को सुनाने, परमेश्वर के जानने के लिये पुरुषार्थी, श्रेष्ठ विद्या के गुणों की इच्छा से दुष्ट गुणों के नाश करने, अत्यन्त ज्ञानवान् (चर्षणीधृतः) सत्य उपदेश से मनुष्यों के सुख के धारण करने और कराने (दाश्वांसः) अपने शुभ गुणों से सबको निर्भय करनेहारे (विश्वे देवासः) सब विद्वान् लोग हैं, वे (दाशुषः) सज्जन मनुष्यों के सामने (सुतम्) सोम आदि पदार्थ और विज्ञान का प्रकाश (आ गत) नित्य करते रहें॥७॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर विद्वानों को आज्ञा देता है कि-तुम लोग एक जगह पाठशाला में अथवा इधर-उधर देशदेशान्तरों में भ्रमते हुए अज्ञानी पुरुषों को विद्यारूपी ज्ञान देके विद्वान् किया करो, कि जिससे सब मनुष्य लोग विद्या धर्म और श्रेष्ठ शिक्षायुक्त होके अच्छे-अच्छे कर्मों से युक्त होकर सदा सुखी रहें॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शरीर , मन व बुद्धि का स्वास्थ्य

पदार्थान्वयभाषाः - १. गत मन्त्र के अनुसार सात्त्विक भोजन से जीवन को सात्त्विक बनाकर यह प्रार्थना करता है कि (विश्वेदेवासः) - हे सब दिव्यगुणो ! तुम (आगत) - मुझे प्राप्त होओ । ये दिव्यगुण (ओमासः) - रक्षण करनेवाले हैं  , शरीर को रोगों से बचाते हैं  , मन की मलिनता दूर करते हैं और बुद्धि में मन्दता को नहीं आने देते । ये दिव्यगुण (चर्षणीधृतः) - मनुष्यों का धारण करनेवाले हैं । 'चर्षणयः कर्षणयः ' कृषि करनेवालों की  , अर्थात् श्रमशील जीवन बितानेवालों की रक्षा करनेवाले हैं । दिव्यगुणों का सम्बन्ध है ही श्रमशीलता के साथ । आलस्य के साथ दुर्गुण रहते हैं  , न कि दिव्यगुण ।  २. हे विश्वेदेवो ! आप (दाश्वांसः) [दातारः] - सब - कुछ देनेवाले हो । आप (दाशुषः) - दाश्वान् - देने के स्वभाववाले के (सुतम्) - सोमनिष्पादनरूप यज्ञ को प्राप्त होते हो  , अर्थात् जब एक व्यक्ति दान की वृत्तिवाला बनकर लोभ के नाश से व्यसनवृक्ष को समाप्त करता है तब वह अपने शरीर में सोम का रक्षण कर पाता है । यह उसका 'सुतम्' सोमनिष्पादनरूप यज्ञ होता है । इस यज्ञ में सब देव उपस्थित होते हैं  , अर्थात् सोमरक्षण होने पर मनुष्य में दिव्यगुणों का विकास होता है । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - दिव्यगुण हमारा रक्षण करते हैं [ओमासः] । ये श्रमशील व संयमी पुरुष को प्राप्त होते हैं [चर्षणीधृतः] । ये दिव्यगुण शरीर  , मन व बुद्धि के स्वास्थ्य को देनेवाले हैं [दाश्वांसः] । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथेश्वरः प्राणिनां मध्ये ये विद्वांसः सन्ति तेषां कर्त्तव्यलक्षणे उपदिशति।

अन्वय:

हे ओमासश्चर्षणीधृतो दाश्वांसो विश्वेदेवासः सर्वे विद्वांसो दाशुषः सुतमागत समन्तादागच्छत॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ओमासः) रक्षका ज्ञानिनो विद्याकामा उपदेशप्रीतयो विज्ञानतृप्तयो याथातथ्यावगमाः शुभगुणप्रवेशाः सर्वविद्याश्राविणः परमेश्वरप्राप्तौ व्यवहारे च पुरुषार्थिनः शुभविद्यागुणयाचिनः क्रियावन्तः सर्वोपकारमिच्छुका विज्ञाने प्रशस्ता आप्ताः सर्वशुभगुणालिङ्गिनो दुष्टगुणहिंसकाः शुभगुणदातारः सौभाग्यवन्तो ज्ञानवृद्धाः। अव रक्षणगतिकान्तिप्रीतितृप्त्यवगमप्रवेशश्रवणस्वाम्यर्थयाचनक्रियेच्छादीत्यवाप्त्यालिङ्गनहिंसादानभागवृद्धिषु। अवि-सिविसिशुषिभ्यः कित् इत्यनेनौणादिकेन सूत्रेणावधातोरोम् शब्दः सिध्यति। ओमास इति पदनामसु पठितम्। (निघं०४.३) (चर्षणीधृतः) सत्योपदेशेन मनुष्येभ्यः सुखस्य धर्तारः। चर्षणय इति मनुष्यनामसु पठितम्। (निघं०२.३) (विश्वेदेवासः) देवा दीव्यन्ति विश्वे सर्वे च ते देवा विद्वांसश्च ते। विश्वेदेवा इति पदनामसु पठितम्। (निघं०५.६) (आ गत) समन्तात् गमयत। इत्यत्र गमधातोर्ज्ञानार्थः प्रयोगः (दाश्वांसः) सर्वस्याभयदातारः। दाश्वान् साह्वान् मीढ्वांश्च। (अष्टा०६.१.१२) अनेनायं दानार्थाद्दाशेः क्वसुप्रत्ययान्तो निपातितः। (दाशुषः) दातुः (सुतम्) यत्सोमादिकं ग्रहीतुं विज्ञानं प्रकाशयितुं चाभीष्टं वस्तु। निरुक्तकार एनं मन्त्रमेवं समाचष्टे-अवितारो वाऽवनीया वा मनुष्यधृतः सर्वे च देवा इहागच्छत, दत्तवन्तो दत्तवतः सुतमिति। तदेतदेकमेव वैश्वदेवं गायत्रं तृचं दशतयीषु विद्यते। यत्तु किंचिद्बहुदैवतं तद्वैश्वदेवानां स्थाने युज्यते, यदेव विश्वलिङ्गमिति शाकपूणिरनत्यन्तगतस्त्वेष उद्देशो भवति, बभ्रुरेक इति दश द्विपदा अलिङ्गा भूतांशः काश्यप आश्विनमेकलिङ्गमभितष्टीयं सूक्तमेकलिङ्गम्। (निरु०१२.४०) अत्र रक्षाकर्त्तारः सर्वै रक्षणीयाश्च सर्वे विद्वांसः सन्ति, ते च सर्वेभ्यो विद्याविज्ञानं दत्तवन्तो भवन्त्विति॥७॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरो विदुषः प्रत्याज्ञां ददाति-यूयमेकत्र विद्यालये चेतस्ततो वा भ्रमणं कुर्वन्तः सन्तोऽज्ञानिनो जनान् विदुषः सम्पादयत। यतः सर्वे मनुष्या विद्याधर्मसुशिक्षासत्क्रियावन्तो भूत्वा सदैव सुखिनः स्युरिति॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Come ye, lovers of Om, lord creator and protector of the universe, masters of light and lovers of humanity, noblest visionaries of the world, generous givers and benefactors of all, come and give us the essence and wisdom distilled from life and literature.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Now God teaches the duties and definition of the learned persons in this seventh Mantra.

अन्वय:

o protectors, wise men desirous of acquiring knowledge, lovers of delivering sermons, taking great delight in wisdom, possessing right knowledge, entering into noble virtues, listening to all sciences, active, eager to do good to all, of admirable wisdom, truthful in thought, word and deed, embracing all noble qualities, destroying all vices, givers of good virtues, lucky, advanced in knowledge, come and impart knowledge to all, you who are upholders of happiness by giving true instructions, O ye all enlightened persons, giving fearlessness to all.

पदार्थान्वयभाषाः - ओमासः इत्यस्य रक्षका ज्ञानिनः विद्याकामाः उपदेशप्रीतयः विज्ञानतृप्तय: याथातथ्यावगमाः इत्यादयः १९ अर्थाः अवधातोर्निष्पन्नत्वात् || अवरक्षणगतिकान्तिप्रीतितृप्त्यवगमप्रवेशस्वाम्यर्थयाचनक्रियेच्छादीत्यवाप्त्यालिंगनहिंसादानभागवृद्धिषु || अवतेष्टिलोपश्च || उणा० १. १४२ अविसिविसिशुषिभ्यः कित् ॥ एताभ्यामौणादिकसूत्राभ्याम् ओम् शब्दः सिद्धयति । ओमास इति पदनामसु निघ० ४.३ चर्षणय इति मनुष्यनामसु ( निघ० २.३ ) (दाश्वांसः) सर्वस्याभयदातारः दाश्वान् साह्वान्मीढ्वांश्च अष्टा०६.२.१२ अनेन दानार्थाद् दाशेः क्वसुप्रत्यः ॥ = Givers of fearlessness.
भावार्थभाषाः - God commands all learned people whether they are in one place like a school or going from place to place to make ignorant people learned, so that all may always enjoy happiness, possessing knowledge, righteousness, good education and good deeds.
टिप्पणी: Among all commentators of the Rigveda, it is] Rishi Dayananda alone who has given these 19 meanings for the word ओमास: (Omasah) used in the Mantra.. That is the distinguishing feature of Rishi Dayananda's commentary, showing his broad outlook and his mastery of the Vedic language and its grammar. For instance, Sayanachar ya explains the word as रक्षका: or Protectors. Skanda Swami-an older commentator than Sayanacharya explained the word Omasah ओमास: saying अवतेरयं पालनार्थस्य तर्पणार्थंस्यवाकर्तरिमाङ्प्रत्ययः अवितार:-रक्षितार: तर्पयितारो वा Protectors or gratifiers. The same is the case with Venkata Madhava and others, but Rishi Dayananda agreeing with all the rest that the word ओमासः (Omasah) is derived from the root अव् gives all the meanings of that verb and applies them to विश्वे देवास: (Vishva devas) taking that to mean not Gods sitting some where in heaven, but enlightened persons. How significant is all this सत्य संहिता वै देवाः (ऐतरेय ब्रा० १.६ ) विद्वांसो हि देवा; (शत० ३ ७३ १० सत्यमया उ देवाः (कौषीतकी ब्रा० २.८ ), such passeges are quite clear to substantiate Rishi Dayanandas contention that by devas are meant truthful enlightened persons whose duties are mentioned so clearly in this Mantra. How wrong is therefore Wilson's translation of the word विश्वेदेवास: as 'Universal Gods'. He also translates ओमास: ( Omasah ) as merely protectors. Griffith also translates the word विश्वेदेवा in the foot note as “all the Gods collectively. That is a serious blunder of these translators.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ईश्वर विद्वानांना आज्ञा देतो - तुम्ही विद्यालयात व देशदेशांतरी भ्रमण करून अज्ञानी पुरुषांना विद्यारूपी ज्ञान देऊन विद्वान करा. ज्यामुळे सर्व माणसे विद्या, धर्म, श्रेष्ठ शिक्षण घेऊन व चांगले कर्म करून सदैव सुखी व्हावीत. ॥ ७ ॥