वांछित मन्त्र चुनें
720 बार पढ़ा गया

शुनः॒शेपो॒ ह्यह्व॑द्गृभी॒तस्त्रि॒ष्वा॑दि॒त्यं द्रु॑प॒देषु॑ ब॒द्धः। अवै॑नं॒ राजा॒ वरु॑णः ससृज्याद्वि॒द्वाँ अद॑ब्धो॒ वि मु॑मोक्तु॒ पाशा॑न्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śunaḥśepo hy ahvad gṛbhītas triṣv ādityaṁ drupadeṣu baddhaḥ | avainaṁ rājā varuṇaḥ sasṛjyād vidvām̐ adabdho vi mumoktu pāśān ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शुनः॒शेपः॑। हि। अह्व॑त्। गृ॒भी॒तः। त्रि॒षु। आ॒दि॒त्यम्। द्रु॒ऽप॒देषु॑। ब॒द्धः। अव॑। ए॒न॒म्। राजा॑। वरु॑णः। स॒सृ॒ज्या॒त्। वि॒द्वान्। अद॑ब्धः। वि। मु॒मो॒क्तु॒। पाशा॑न्॥

720 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:13 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:15» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:13


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह वरुण कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः - जैसे (शुनःशेपः) उक्त गुणवाला विद्वान् (त्रिषु) कर्म उपासना और ज्ञान में (आदित्यम्) अविनाशी परमेश्वर का (अह्वत्) आह्वान करता है, वह हम लोगों ने (गृभीतः) स्वीकार किया हुआ उक्त तीनों कर्म उपासना और ज्ञान को प्रकाशित कराता है और जो (द्रुपदेषु) क्रिया कुशलता की सिद्धि के लिये विमान आदि यानों के खम्भों में (बद्धः) नियम से युक्त किया हुआ वायु ग्रहण किया है, वैसे वह लोगों को भी ग्रहण करना चाहिये, जैसे-जैसे गुणवाले पदार्थ को (अदब्धः) अति प्रशंसनीय (वरुणः) अत्यन्त श्रेष्ठ (राजा) और प्रकाशमान परमेश्वर (अवससृज्यात्) पृथक्-पृथक् बनाकर सिद्ध करे, वह हम लोगों को भी वैसे ही गुणवाले कामों में संयुक्त करे। हे भगवन् ! परमेश्वर ! आप हमारे (पाशान्) बन्धनों को (विमुमोक्तु) बार-बार छुड़वाइये। इसी प्रकार हम लोगों की क्रियाकुशलता में संयुक्त किये हुए प्राण आदि पदार्थ (पाशान्) सकल दरिद्ररूपी बन्धनों को (विमुमोक्तु) बार-बार छुड़वा देवें वा देते हैं॥१३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में भी लुप्तोपमा और श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर ने जिस-जिस गुणवाले जो-जो पदार्थ बनाये हैं, उन-उन पदार्थों के गुणों को यथावत् जानकर इन-इन को कर्म, उपासना और ज्ञान में नियुक्त करे, जैसे परमेश्वर न्याय अर्थात् न्याययुक्त कर्म करता है, वैसे ही हम लोगों को भी कर्म नियम के साथ नियुक्त कर जो बन्धनों के करनेवाले पापात्मक कर्म हैं, उनको दूर ही से छोड़कर पुण्यरूप कर्मों का सदा सेवन करना चाहिये॥१३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तीन बन्धन

पदार्थान्वयभाषाः - १. 'संसार' शब्द "सृ गतौ" धातु से बना है । 'जगत्' 'गम गतौ' से तथा 'द्रु' 'द्रु गतौ' से । एवं 'द्रु' का अभिप्राय यहाँ संसार है । संसार के तीन 'पद' - स्थान 'सत्त्व , रज व तम' हैं । ये तीनों मनुष्य को बाँधते हैं । इनके बन्धन से पीड़ित होकर वह (शुनःशेपः) - सुख के निर्माण को चाहनेवाला पुरुष (हि) - निश्चय से (त्रिषु द्रुपदेषु) - इन तीनों संसार के स्थानों में (बद्धः) - बँधा हुआ (गृभीतः) - उनसे जकड़ा हुआ (आदित्यम्) - उस आदित्य को [अविद्यमाना - दितिर्यस्मात्] जिससे खण्डन का सम्भव ही नहीं उस वरुण को (अह्वत्) - पुकारता है । मनुष्य विवश होने पर तो प्रभु का स्मरण अवश्य करता है ।  २. जब वह 'शुनः शेप' पुकारता है तब (राजा वरुणः) - वह व्यवस्थापक प्रभु (एनम्) - इस बद्ध पुरुष को (अवससृज्यात्) - इन बन्धनों से छुड़ाए ।  ३. यह बन्धनों से छूटा हुआ (विद्वान्) - ज्ञानी पुरुष (अदब्धः) - स्वयं विषयों से हिंसित न होता हुआ (पाशान्) - सब जालों को (विमुमोक्तु) - छुड़ा दे । प्रभु ने इसे मुक्त किया । यह ज्ञान देकर औरों को मुक्त करनेवाला बने । इस प्रकार यह थोड़ा - सा प्रभु - ऋण से अनृण हो जाएगा अथवा प्रभु के निर्देशों का पालन करता हुआ प्रभु का प्रिय बन पाएगा । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमें बन्धन - मुक्त करें तथा हम औरों को बन्धन - मुक्त करने का प्रयास करें । 

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥

अन्वय:

हे मनुष्या यूयं शुनःशेपो विद्वान् त्रिषु यमादित्यमह्वत् सोऽस्माभिर्हि गृभीतः संस्त्रीणि कर्मोपासनाज्ञानानि प्रकाशयति, यश्च विद्वद्भिर्द्रुपदेषु बद्धो वायुलोको गृह्यते तथा सोऽस्माभिरपि ग्राह्यो यादृशगुणपदार्थादब्धो विद्वान् वरुणो राजा परमेश्वरोऽवससृज्यात् सोऽस्माभिस्तादृशगुण एवोपयोक्तव्यः। हे भगवन् ! भवानस्माकं पाशान् विमुमोक्तु। एवमस्माभिस्संसारस्थः सूर्यादिपदार्थसमूहः सम्यगुपयोजितः सन् पाशान् सर्वान् दारिद्र्यबन्धान् पुनः पुनर्विमोचयति तथैतत्सर्वं कुरुत॥१३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (शुनःशेपः) उक्तार्थो विद्वान् (हि) निश्चयार्थे (अह्वत्) आह्वयति। अत्र लडर्थे लङ्। (गृभीतः) स्वीकृतः हृग्रहोः० इति हस्य भः (त्रिषु) कर्मोपासनाज्ञानेषु (आदित्यम्) विनाशरहितं परमेश्वरं प्रकाशमयं व्यवहारहेतुं प्राणं वा (द्रुपदेषु) द्रूणां वृक्षादीनां पदानि फलादिप्राप्तिनिमित्तानि येषु तेषु (बद्धः) नियमेन नियोजितः (अव) पृथक्करणे (एनम्) पूर्वप्रतिपादितं विद्वांसम् (राजा) प्रकाशमानः (वरुणः) श्रेष्ठतमः। उत्तमव्यवहारहेतुर्वा (ससृज्यात्) पुनः पुनर्निष्पद्येत निष्पादयेद्वा। अत्र वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्ति इति नियमात्। रुग्रिकौ च लुकि। (अष्टा०७.४.९१) इत्यभ्यासस्य रुग्रिगागमौ न भवतः। दीर्घोऽकितः। (अष्टा०७.४.८३) इति दीर्घादेशश्च न भवति। (विद्वान्) ज्ञानवान् (अदब्धः) हिंसितुमनर्हः (वि) विशिष्टार्थे (मुमोक्तु) मुञ्चतु मोचयतु वा। अत्र बहुलं छन्दसि इति शपः श्लुरन्तर्गतो ण्यर्थो वा (पाशान्) अधर्माचरणजन्यबन्धान्॥१३॥
भावार्थभाषाः - अत्रापि श्लेषोऽलङ्कारः लुप्तोपमा च। मनुष्यैर्यथेश्वरो यं पदार्थं यादृशगुणं निर्मितवांस्तथैव तद्गुणान् बुद्ध्वा कर्मोपासनाज्ञानानि तेषु नियोजितव्यानि यथा परमेश्वरो न्याय्यं कर्म करोति, तथैवास्माभिरप्यनुष्ठातव्यम्। यानि पापात्मकानि बन्धकराणि कर्माणि सन्ति, तानि दूरतस्त्यक्त्वा पुण्यात्मकानि सदा सेवनीयानि चेति॥१३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Shunah-shepa, man of knowledge dedicated to light and happiness, inspired and possessed by ambition, bound within the yajnic pillars of knowledge, action and meditation, should invoke and develop Aditya, power of sun and wind. May Varuna, lord omniscient ruler of the world, shape him (as a maker and saviour of humanity). May He, inviolable lord omnipotent, deliver us from bonds of sin, ignorance and poverty.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What is the nature of that Varuna is further taught in the 13th Mantra.

अन्वय:

O men, as a learned person who has a touch of the wisdom of the wise, invokes Immortal God or the Prana for the acquistion of knowledge, action and contemplation, so let us also invoke and accept Him (God). When so invoked, He reveals to us the real nature of these three i. e. knowledge, action and Contemplation or communion. As air is utilized by scientists for the manufacture of aero planes etc. with the wooden planks of the tree and other things, let us also do so. As God who is the Best knower and irresistible leader commands us to utilize things of the world, we should utilize them in the same manner. O God, deliver us from all bonds cause! by sinful acts Thus utilized by us properly and methodically, all things of the world like the sun, air etc. loosen all our bonds of poverty. You should also therefore utilize them properly.

पदार्थान्वयभाषाः - (त्रिषु ) कर्मोपासनाज्ञानेषु = In or about the action, meditation and knowledge. (आदित्यम्) विनाशरहितं परमेश्वरं प्रकाशमयं व्यवहारहेतुं प्राणं वा ।। = Immortal God or bright Prana. (द्रपदेषु ) द्रुणां वृक्षादीनां पदानि फलादि प्राप्तिनिमित्तानि येषु तेषु । (अदब्ध:) हिंसितुमनईः = Inviolable or Arrestable. (पाशान्) अधर्माचरणजन्यान् बन्धान् = Bonds caused by sinful acts. (गृभीतः) स्वीकृतः । हृग्रहोर्भः इति भः = Accepted.
भावार्थभाषाः - Men should know thoroughly the properties of all the objects made by God and should associate with them action, and knowledge. We must be just as God is. Those sinful acts which cause bondage must be cast aside and meritorious acts should always be performed by every one.
टिप्पणी: The word आदित्य is derived from दो-अवखण्डने नञ therefore means Imperishable or Immortal अदितिरेव आदित्य: (स्वार्थेऽण ) So the word Aditya stands primarily for God, though it also means the sun, the Prana etc. For the primary meaning of the word Aditya as God, there is the Vedic authority itself. तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद् वायुस्तदु चन्द्रमाः ॥ ( यजु० ३२.१ ) i. e. God is called by the name of Agni, Aditya, Vayu, Chandrama and Brahma etc. That Aditya means the sun is too well known to require an authority. In the Jaimineeyopanishad Brahmana 1.44.5 it is stated सहस्रं हैते आदित्यस्य रश्मयः ॥ (जैमिनीयोप० १४४.५) i. e. the sun has a thousand and one rays. Rishi Dayananda has interpreted aditya as Prana also besides God, for which the following passage from the Tandya Maha Brahmana can be aptly quoted. प्राण आदित्यः || (ताण्ड्य महाब्राह्मणे १६.१३.२)

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात लुप्तोपमा व श्लेषालंकार आहेत. परमेश्वराने ज्या ज्या गुणांचे जे जे पदार्थ निर्माण केलेले आहेत त्या त्या पदार्थांच्या गुणांना जाणून त्यांना कर्म, उपासना व ज्ञानात युक्त करावे. जसा परमेश्वर न्याय अर्थात न्याययुक्त कर्म करतो तसेच आम्हीही कर्म करावे. जे बंधनयुक्त पापात्मक कर्म आहेत, त्यांचा त्याग करून पुण्यकर्मांचे सदैव सेवन करावे. ॥ १३ ॥