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इ॒दमा॑पः॒ प्र व॑हत॒ यत्किं च॑ दुरि॒तं मयि॑। यद्वा॒हम॑भिदु॒द्रोह॒ यद्वा॑ शे॒प उ॒तानृ॑तम्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

idam āpaḥ pra vahata yat kiṁ ca duritam mayi | yad vāham abhidudroha yad vā śepa utānṛtam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒दम्। आ॒पः॒। प्र। व॒ह॒त॒। यत्। किम्। च॒। दु॒रि॒तम्। मयि॑। यत्। वा॒। अ॒हम्। अ॒भि॒ऽदु॒द्रोह॑। यत्। वा॒। शे॒पे। उ॒त। अनृ॑तम्॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:22 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:12» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:22


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे जल किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - मैं (यत्) जैसा (किम्) कुछ (मयि) कर्म का अनुष्ठान करनेवाले मुझमें (दुरितम्) दुष्ट स्वभाव के अनुष्ठान से उत्पन्न हुआ पाप (च) वा श्रेष्ठता से उत्पन्न हुआ पुण्य (वा) अथवा (यत्) अत्यन्त क्रोध से (अभिदुद्रोह) प्रत्यक्ष किसी से द्रोह करता वा मित्रता करता (वा) अथवा (यत्) जो कुछ अत्यन्त ईर्ष्या से किसी सज्जन को (शेपे) शाप देता वा किसी को कृपादृष्टि से चाहता हुआ जो (अनृतम्) झूँठ (उत) वा सत्य काम करता हूँ (इदम्) सो यह सब आचरण किये हुए को (आपः) मेरे प्राण मेरे साथ होके (प्रवहत) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं॥२२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य लोग जैसा कुछ पाप वा पुण्य करते हैं, सो सो ईश्वर अपनी न्याय व्यवस्था से उनको प्राप्त कराता ही है॥२२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मानस रोगनिवारण

पदार्थान्वयभाषाः - १. (आपः) हे जलो ! (यत् किञ्च) - जो कुछ भी (दुरितम्) - अशुभ आचरण (मयि) - मेरे जीवन में है (इदम्) - इसको (प्रवहत( - बहाकर दूर ले - जाओ । जल शरीर के रोगों को ही दूर करते हों , सो नहीं , इनका मानस रोगों पर भी प्रभाव पड़ता है । क्रोध में आये हुए मनुष्य को अब तक ठण्डा पानी पीने के लिए देने की प्रथा है । पानी रोगों को ही नहीं , क्रोध को भी दूर कर देता है । वस्तुतः स्वास्थ्य को प्राप्त कराके जल मन को भी स्वस्थ बनाते हैं । मन के स्वस्थ होने पर सब दुरित दूर ही रहते हैं ।  २. हे जलो । (यद् वा) - और जो (अहम्) - मैं (अभिदुद्रोह)) - किसी के प्रति द्रोह करता हूँ , ये जल उस द्रोह भाव को भी दूर करें । हमारे मनों में किसी की जिघांसा की भावना न हो ।  ३. (यद् वा) - और जो मैं (शेपे) - क्रोध में आक्रोश कर बैठता हूँ , किसी को शाप देने लगता है , उस वृत्ति को भी दूर करो (उत) - और (अनृतम्)@ - मेरे जीवन में न चाहते हुए भी आ जानेवाले असत्य को भी मुझसे दूर करो । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - जल शारीरिक रोगों की औषध तो है ही , ये मानस रोगों को भी दूर करनेवाले हैं । 

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ताः कीदृश्य इत्युपदिश्यते।

अन्वय:

अहं यत्किंच मयि दुरितमस्ति यद्वा पुण्यमस्ति यच्चाहमभिदुद्रोह या मित्रत्वमाचरितवान् यद्वा कञ्चिच्छेपे वाऽनुगृहीतवान् यदनृतं वोत सत्यं चाचरितवानस्मि तत्सर्वमिदमापो मम प्राणा मया सह प्रवहत प्राप्नुवन्ति॥२२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इदम्) आचरितम् (आपः) प्राणाः (प्र) प्रकृष्टार्थे (वहत) वहन्ति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च। (यत्) यादृशम् (किञ्च) किंचिदपि (दुरितम्) दुष्टस्वभावानुष्ठानजनितं पापम् (मयि) कर्तरि जीवे (यत्) ईर्ष्याप्रचुरम् (वा) पक्षान्तरे (अहम्) कर्मकर्ता जीवः (अभिदुद्रोह) आभिमुख्येन द्रोहं कृतवान् (यत्) क्रोधप्रचुरम् (वा) पक्षान्तरे (शेपे) कंचित्साधुजनमाक्रुष्टवान् (उत) अपि (अनृतम्) असत्यमाचरणमानभाषणं कृतवान्॥२२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्यादृशं पापं पुण्यं चाचर्य्यते तत्तदेवेश्वरव्यवस्थया प्राप्यत इति निश्चयः॥२२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May these holy waters wash off and carry away whatever evil there be in me, whatever I hate, or whatever I curse, or whatever false there be in me.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

Whatever sin caused by evil nature is there in me or the merit, whether I have pronounced imprecations (curses) against holy men or have shown mercy to others, whether I have wrought evil out of jealousy or have shown friendship, whether I have lied or spoken the truth, all this my Pranas (life breaths) take with me.

भावार्थभाषाः - Whatever good or evil, merit or sin is done by people, they get the fruit of the same under the dispensation of God's Justice. (प्रवहत ) प्रापयन्ति प्रकृष्टार्थे वहन्ति = Carry on or cause to get further. अत्र व्यत्ययो लडथें लोट् च (आपः) प्राणा:- = Life breaths or principles as explained before. Rishi Dayananda in his commentary on Yaj. 8.27 has interpreted as आप्ताः प्रजा: य० ६. २७) People who always think, speak and act truthfully. In his commentary on Yaj. 20.20 he has explained as प्राणा जलानीव विद्वांसः (यजु० २०. २२ ) Learned persons who are like the Pranas and waters. In his commentary on Yaj.10.7 he has interpreted आप: as जलानीव शान्ता: Men of calm nature like waters. That meaning can be taken here also and then the prayers for removing all our physical, vocal and mental defect is addressed to them and not to inanimate waters as wrongly supposed by Sayanacharya, Wilson, Griffith and others.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसे जसे पाप व पुण्य करतात तसे ईश्वर आपल्या न्यायव्यवस्थेने त्यांना त्याचे फळ देतो. ॥ २२ ॥