उ॒भा दे॒वा दि॑वि॒स्पृशे॑न्द्रवा॒यू ह॑वामहे। अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑॥
ubhā devā divispṛśendravāyū havāmahe | asya somasya pītaye ||
उ॒भा। दे॒वा। दि॒वि॒ऽस्पृशा॑। इ॒न्द्र॒वा॒यू इति॑। ह॒वा॒म॒हे॒। अ॒स्य। सोम॑स्य। पी॒तये॑॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अगले मन्त्र में परस्पर संयोग करनेवाले पदार्थों का प्रकाश किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
इन्द्र और वायु का सोमपान [जितेन्द्रियता व क्रियाशीलता]
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ परस्परानुषङ्गिणावुपदिश्येते।
वयमस्य सोमस्य पीतये दिविस्पृशा देवोभेन्द्रवायू हवामहे॥२॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
Now the co-operation and combination of the fire and wind is taught in the second Mantra-
We invoke both Indra and Vayu (fire and wind) which help the aero planes in touching the firmament for the joy of the objects of the world created by God.
