वांछित मन्त्र चुनें
473 बार पढ़ा गया

जोष॒द्यदी॑मसु॒र्या॑ स॒चध्यै॒ विषि॑तस्तुका रोद॒सी नृ॒मणा॑:। आ सू॒र्येव॑ विध॒तो रथं॑ गात्त्वे॒षप्र॑तीका॒ नभ॑सो॒ नेत्या ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

joṣad yad īm asuryā sacadhyai viṣitastukā rodasī nṛmaṇāḥ | ā sūryeva vidhato rathaṁ gāt tveṣapratīkā nabhaso netyā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

जोष॑त्। यत्। ई॒म्। अ॒सु॒र्या॑। स॒चध्यै॑। विसि॑तऽस्तुका। रो॒द॒सी। नृ॒ऽमनाः॑। आ। सू॒र्याऽइ॑व। वि॒ध॒तः। रथ॑म्। गा॒त्। त्वे॒षऽप्र॑तीका। नभ॑सः। न। इ॒त्या ॥ १.१६७.५

473 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:167» मन्त्र:5 | अष्टक:2» अध्याय:4» वर्ग:4» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:23» मन्त्र:5


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जो (असुर्या) मेघों में प्रसिद्ध (विषितस्तुका) विविध प्रकार की जिसकी स्तुति सम्बन्धी और (नृमणाः) जो अग्रगामी जनों में चित्त रखती हुई (ईम्) जल के (सचध्यै) संयोग के लिये (सूर्येव) सूर्य की दीप्ति के समान (रोदसी) आकाश और पृथिवी को (जोषत्) सेवे अर्थात् उनके गुणों में रमे वा (त्वेषप्रतीका) प्रकाश की प्रतीति करानेवाली और (इत्या) प्राप्त होने के योग्य होती हुई (नभसः) जल सम्बन्धी (रथम्) रमण करने योग्य रथ के (न) समान व्यवहार की और (विधतः) ताड़ना करनेवालों को (आ, गात्) प्राप्त होती वह स्त्री प्रवर है ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अग्नि बिजुलीरूप से सबको सब प्रकार से व्याप्त होकर प्रकाशित करती है, वैसे सब विद्या उत्तम शिक्षाओं को पाकर स्त्री समग्र कुल को प्रशंसित करती है ॥ ५ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उपासक के जीवन में 'असुर्या' का प्रवेश

पदार्थान्वयभाषाः - १. (यत्) = जब (ईम्) = निश्चय से (असुर्या) = [असुरस्य इयम्] प्राणशक्ति का सञ्चार करनेवाले प्रभु की पुत्री के समान यह वेदवाणी (जोषत्) = हमारा सेवन करती है, हमें प्राप्त होती है। यह (विषितस्तुका) = विशेषरूप से बद्ध-केशसंघवाली - विशिष्ट ज्ञान की रश्मियोंवाली [केश = प्रकाशरश्मि] उस महान् असुर [प्रभु] की पुत्री (सचध्यै) = हमारे साथ संगमनवाली होती है, उस समय यह (रोदसी) = सम्पूर्ण द्यावापृथिवी के पदार्थों का प्रतिपादन करनेवाली वाणी (नृमणा:) = [नृषु मनो यस्याः] मनुष्यों का हित करने के मनवाली होती है। सब पदार्थों का ज्ञान देती हुई यह उनका कल्याण करती है। २. यह (सूर्या इव) = सूर्य की भाँति चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाती हुई (विधतः) = उपासक के नियमपूर्वक स्वाध्याय के द्वारा 'सरस्वती' की आराधना करनेवाले के (रथं गात्) = रथ को प्राप्त होती है। (त्वेषप्रतीका) = यह दीप्त अंगोंवाली - प्रकाशमय वेदवाणी (नभसः इत्या न) = सूर्य के आगम के समान है। वेदवाणी के प्राप्त होते ही सारा अन्तःकरण इस प्रकार दीप्त हो उठता है, जैसे कि सूर्य के आगमन से सारा आकाश ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ – यह वेदवाणी प्रभु की पुत्री के समान है। दीप्त अंगोंवाली है। द्युलोक से पृथिवीलोक तक के सारे पदार्थों का ज्ञान देती है। सरस्वती के आराधक के जीवन में इसका प्रवेश इस प्रकार होता है जैसे आकाश में सूर्य का । यही वेदवाणी से हमारा परिणय (विवाह) है ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

यद्योऽसुर्या विषितस्तुका नृमणा ईं सचध्यै सूर्येव रोदसी जोषत् त्वेषप्रतीकेत्या सती नभसो रथं न विधतश्चागात् प्रवरा स्त्री वर्त्तते ॥ ५ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (जोषत्) सेवेत (यत्) यः (ईम्) जलम् (असुर्या) असुरेषु मेघेषु भवा (सचध्यै) सचितुं संयोक्तुम् (विषितस्तुका) विविधतया सिता बद्धा स्तुका स्तुतिर्यया सा (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (नृमणाः) नृषु नायकेषु मनो यस्याः सा (आ) (सूर्येव) यथा सूर्यस्य दीप्तिः (विधतः) ताडयितॄन् (रथम्) रमणीयं यानं व्यवहारञ्च (गात्) गच्छति (त्वेषप्रतीका) त्वेषस्य प्रकाशस्य प्रतीतिकारिका (नभसः) जलस्य (न) इव (इत्या) प्राप्तुं योग्या ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथाऽग्निर्विद्युद्रूपेण सर्वमभिव्याप्य प्रकाशयति तथा सर्वा विद्यासुशिक्षाः प्राप्य स्त्री समग्रं कुलं प्रशंसयति ॥ ५ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - If the earth, source of pranic vitality and loving mother of mankind, were to serve the Maruts for the sake of waters, then she, with flowing hair like the lights of evening dawn, shining brilliant as child of the sun, would ride the chariot of the Lord Ordainer and sustainer, i.e., the sun, and rise as if going to sky heights of progress and abundance.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The theme of praise to learned women.

अन्वय:

The best woman is she, who admires good virtues, whose mind is devoted to good leaders (in order to grasp their virtues ). Such a woman is like the luster of the sun, is radiant and is faithful to her husband. She is calm and quiet like the waves of water always with good behavior and conduct.

भावार्थभाषाः - The Agni pervading all in the form of electricity illuminates them, same way a woman makes a family praise-worthy having acquired all wisdom and good education.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जशी अग्निरूपी विद्युत सर्वप्रकारे व्याप्त होऊन सर्वांना प्रकाशित करते तसे सर्व विद्या उत्तम शिक्षण प्राप्त करून स्त्री संपूर्ण कुलाला प्रशंसित करते. ॥ ५ ॥