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अचि॑कित्वाञ्चिकि॒तुष॑श्चि॒दत्र॑ क॒वीन्पृ॑च्छामि वि॒द्मने॒ न वि॒द्वान्। वि यस्त॒स्तम्भ॒ षळि॒मा रजां॑स्य॒जस्य॑ रू॒पे किमपि॑ स्वि॒देक॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

acikitvāñ cikituṣaś cid atra kavīn pṛcchāmi vidmane na vidvān | vi yas tastambha ṣaḻ imā rajāṁsy ajasya rūpe kim api svid ekam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अचि॑कित्वान्। चि॒कि॒तुषः॑। चि॒त्। अत्र॑। क॒वीन्। पृ॒च्छा॒मि॒। वि॒द्मने॑। न। वि॒द्वान्। वि। यः। त॒स्तम्भ॑। षट्। इ॒मा। रजां॑सि। अ॒जस्य॑। रू॒पे। किम्। अपि॑। स्वि॒त्। एक॑म् ॥ १.१६४.६

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:164» मन्त्र:6 | अष्टक:2» अध्याय:3» वर्ग:15» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:22» मन्त्र:6


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - (अचिकित्वान्) अविद्वान् मैं (चित्) भी (अत्र) इस विद्याव्यवहार में (चिकितुषः) अज्ञानरूपी रोग के दूर करनेवाले (कवीन्) पूरी विद्यायुक्त आप्तविद्वानों को (विद्वान्) विद्यावान् (विद्मने) विशेष जानने के लिये (न) जैसे पूछे वैसे (पृच्छामि) पूछता हूँ, (यः) जो (षट्) छः (इमा) इन (रजांसि) पृथिवी आदि स्थूल तत्त्वों को (वि, तस्तम्भ) इकट्ठा करता है (अजस्य) प्रकृति अर्थात् जगत् के कारण वा जीव के (रूपे) रूप में (किम्) क्या (स्वित् अपि) ही (एकम्) एक हुआ है इसको तुम कहो ॥ ६ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अविद्वान् विद्वानों को पूछ के विद्वान् होते हैं, वैसे विद्वान् भी परम विद्वानों को पूछ कर विद्या की वृद्धि करें ॥ ६ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रश्नकर्ता

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अचिकित्वान्) = अविद्वान् होता हुआ, इस शरीर और शरीरी के रूप को ठीक-ठीक क्रान्तदर्शी न समझता हुआ (चित्) = ही (अत्र) = इस मानव जीवन में (चिकितुषः कवीन्) = ज्ञानी, आपसे (पृच्छामि) = पूछता हूँ । मानव देह की सफलता के लिए मैं आप विद्वानों से इस अध्यात्म के प्रश्न को जानने का प्रयत्न करता हूँ । २. आप ज्ञानी हैं, क्रान्तदर्शी हैं। इसके विपरीत मैं न (विद्वान्) = नासमझ हूँ। मेरे लिए तो सारा संसार पहेली-सा बना हुआ है। मैं वादविवाद के लिए नहीं अपितु जिज्ञासु के रूप में (विद्मने) = ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही आपके चरणों में उपस्थित हुआ हूँ। आप कवि हैं। मैं आपके प्रकाश से अपने हृदयान्धकार को दूर करने के लिए उस प्रभु के विषय में कुछ पूछता हूँ (यः) = जो (इमा) = इन (षट्) = छह रजांसि लोकों को (वि) = अलग अलग- अपने-अपने स्थान में (तस्तम्भ) = थामे हुए है। सभी लोक उस प्रभु के आश्रय में अत्यधिक तीव्र गति से चलते हुए भी टकराते नहीं, क्या अद्भुत व्यवस्था है ! ४. मैं छह लोकों के धारक प्रभु के विषय में जानना चाहता हूँ। मैंने ऐसा सुना है कि सातवाँ लोक जो (अजस्य) = अजन्मा प्रभु के (रूपे) = स्वरूप में ही विद्यमान है, (एकं किमपि स्वित्) = वह एक जो इन लोकों की भाँति लोक है भी या नहीं। वह तो प्रभु का अपना रूप ही है। 'सत्यम्' यह उस लोक का नाम है। इस प्रभु के विषय में ही मैं पूछता हूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - नासमझ होने के कारण मनुष्य ज्ञानियों की शरण में जाए और इस संसार तथा परमात्मा के सम्बन्ध में उनसे पूछे।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

अचिकित्वानहं चिदत्र चिकितुषः कवीन् विद्वान् विद्मने न पृच्छामि। यः षडिमा रजांसि वितस्तम्भ। अजस्य रूपे किं स्विदप्येकमासीत्तद्यूयं ब्रूत ॥ ६ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अचिकित्वान्) अविद्वान् (चिकितुषः) (चित्) अपि (अत्र) अस्मिन् विद्याव्यवहारे (कवीन्) पूर्णविद्यानाप्तान् (पृच्छामि) (विद्मने) विज्ञानाय (न) इव (विद्वान्) विद्यावान् (वि) (यः) (तस्तम्भ) स्तभ्नाति (षट्) (इमा) इमानि (रजांसि) पृथिव्यादीनि स्थूलानि तत्त्वानि (अजस्य) प्रकृतेर्जीवस्य वा (रूपे) (किम्) (अपि) (स्वित्) (एकम्) ॥ ६ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथा अविद्वांसो विदुषः पृष्ट्वा विद्वांसो भवन्ति तथा विद्वांसोऽपि परमविदुषः पृष्ट्वा विद्या वर्द्धयेयुः ॥ ६ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Not knowing what I would know here as a man of knowledge should know, I ask of the men of knowledge and poets of divine vision what that single principle of power could be in the form and nature of the one unborn and eternal Supreme which holds these six higher and lower spheres and atmospheres of the universe.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

A scholar should seek knowledge from the high-ups.

अन्वय:

Being myself ignorant, I search for the sages who know the Truth, not claiming as one who knows it. I do it for the sake of gaining knowledge. Who is that one pervading in the form of the matter or the soul (that are eternal and therefore unborn)? Who has upheld these six spheres and planets? Tell me about that one Supreme Being.

भावार्थभाषाः - The uneducated persons become learned by seeking and putting questions from the learned persons about difficult subjects. That is how the learned persons become more learned and wiser by putting questions to more capable persons and getting satisfactory answers from them.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे अविद्वान विद्वानांना विचारून विद्वान होतात तसे आपल्यापेक्षा श्रेष्ठ विद्वानांना विचारून विद्येची वृद्धी करावी. ॥ ६ ॥