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को द॑दर्श प्रथ॒मं जाय॑मानमस्थ॒न्वन्तं॒ यद॑न॒स्था बिभ॑र्ति। भूम्या॒ असु॒रसृ॑गा॒त्मा क्व॑ स्वि॒त्को वि॒द्वांस॒मुप॑ गा॒त्प्रष्टु॑मे॒तत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ko dadarśa prathamaṁ jāyamānam asthanvantaṁ yad anasthā bibharti | bhūmyā asur asṛg ātmā kva svit ko vidvāṁsam upa gāt praṣṭum etat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कः। द॒द॒र्श॒। प्र॒थ॒मम्। जाय॑मानम्। अ॒स्थ॒न्ऽवन्त॑म्। यत्। अ॒न॒स्था। बिभ॑र्ति। भूम्याः॑। असुः॑। असृ॑क्। आ॒त्मा। क्व॑। स्वि॒त्। कः। वि॒द्वांस॑म्। उप॑। गा॒त्। प्रष्टु॑म्। ए॒तत् ॥ १.१६४.४

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:164» मन्त्र:4 | अष्टक:2» अध्याय:3» वर्ग:14» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:22» मन्त्र:4


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जिस (प्रथमम्) प्रख्यात प्रथम अर्थात् सृष्टि के पहले (जायमानम्) उत्पन्न होते हुए (अस्थन्वन्तम्) हड्डियों से युक्त देह को (भूम्याः) भूमि के बीच (अनस्था) हड्डियों से रहित (असुः) प्राण (असृक्) रुधिर और (आत्मा) जीव (बिभर्त्ति) धारण करता उसको (क्व, स्वित्) कहीं भी (कः) कौन (ददर्श) देखता है (कः) और कौन (एतत्) इस उक्त विषय के (प्रष्टुम्) पूछने को (विद्वांसम्) विद्वान् के (उप, गात्) समीप जावे ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - जब सृष्टि के प्रारम्भ में ईश्वर ने सबके शरीर बनाये तब कोई जीव इनका देखने-वाला न हुआ। जब उनमें जीवात्मा प्रवेश किये तब प्राण आदि वायु, रुधिर आदि धातु और जीव भी मिलकर देह को धारण करते हुए और चेष्टा करते हुए, इत्यादि विषय की प्राप्ति के लिये विद्वान् को कोई ही पूछने को जाता है, किन्तु सब नहीं ॥ ४ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जिज्ञासु का विद्वानों के समीप जाना

पदार्थान्वयभाषाः - १. पिछले दो मन्त्रों में शरीर-रथ का वर्णन करके इस मन्त्र में रथी का वर्णन करते हैं। उस रथी को (कः ददर्श) = 'क' देखता है । (क) = कामनाशील और पुरुषार्थी उसे देखता है। (प्रथमं जायमानम्) = वह आत्मतत्त्व पहले से ही प्रादुर्भूत है—'अग्रे समवर्त्तत'- पहले ही है । २. यह एक आश्चर्य की बात है (यत्) = कि (अनस्था) = स्वयं अस्थिरहित होता हुआ भी (अस्थन्वन्तम्) = अस्थियों के पञ्जरवाले इस शरीर को (बिभर्ति) = धारण कर रहा है। प्रतीत तो यह होता है कि शरीर को अस्थियों ने धारण किया हुआ है, परन्तु वास्तविकता यह नहीं है। आत्मतत्त्व के शरीर को छोड़ने पर यह शरीर धराशायी हो जाता है। २. उस आत्मतत्त्व का चिन्तन करने पर यह जिज्ञासा होना स्वाभाविक है कि (भूम्या:) = इस पार्थिव शरीररूप रथ का (असुः) = यह प्राण, (असृक्) = रुधिर व (आत्मा) = रथी (क्वस्वित्) = भला कहाँ-कहाँ रहते हैं ? असु प्राण हैं। इनके विरेचन- पूरण का क्रम चलता ही रहता है। (असृज्) = रुधिर है । 'अस् दीप्तौ' यही शरीर की दीप्ति का कारण है। आत्मा रथी है। इसी के कारण रथ की गति होती है। ये प्राणादि शरीर में कहाँ हैं ' – यह प्रश्न उत्पन्न होते ही (कः) = प्रबल कामनावाला व्यक्ति (विद्वांसम्) - विद्वान् के पास (एतत् प्रष्टुम्) = यह प्रश्न पूछने के लिए (उपगात्) = जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - विरल पुरुष ही आत्मतत्त्व का दर्शन करते हैं। शरीर-रचना को समझने के लिए जिज्ञासु ज्ञानी के पास उपस्थित होता है ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

यद्यं प्रथमं सृष्टेः प्रागादिमं जायमानमस्थन्वन्तं देहम्भूम्या मध्येऽनस्थासुरसृगात्मा च बिभर्त्ति तं क्व स्वित् को ददर्श क एतत् प्रष्टुं विद्वांसमुपगात् ॥ ४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (कः) (ददर्श) पश्यति (प्रथमम्) आदिमं प्रख्यातम् (जायमानम्) (अस्थन्वन्तम्) अस्थियुक्तं देहम् (यत्) यम् (अनस्था) अस्थिरहितः (बिभर्त्ति) धरति (भूम्याः) पृथिव्या मध्ये (असुः) प्राणः (असृक्) रुधिरम् (आत्मा) जीवः (क्व) कस्मिन् (स्वित्) अपि (कः) (विद्वांसम्) (उप) (गात्) गच्छेत्। अत्राडभावः। (प्रष्टुम्) (एतत्) ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - यदा सृष्टेः प्रागीश्वरेण सर्वेषां शराराणि निर्मितानि तदा कोऽपि जीव एतेषां द्रष्टा नासीत्। यदा तेषु जीवात्मानः प्रवेशितास्तदा प्राणादयो वायवः रुधिरादयो धातवो जीवाश्च मिलित्वा देहं धरन्ति स्म जीवयन्ति स्म च इत्यादि प्राप्तये विद्वांसं कश्चिदेव प्रष्टुं याति न सर्वे ॥ ४ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Who saw the first material form of the universe of flesh and bone being bom, which the immaterial of no flesh and bone bears? What and where was the breath and blood and soul of the earth and cosmos? Who would reach the visionary of knowledge to ask all this of the first and last question about the mystery?

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

Who has seen with his naked eyes ? How did the physical body come into existence on this earth out of the primordial matter, which upholds it ? Besides this, the Primordial matter, which is the material cause of the universe, the Prana (vital energy) blood (and other Dhatus or constituents), and soul support this material body under the direction of formless God. Where are they and what is the real nature? Who is it, that approached learned wise men to enquire about these things ?

भावार्थभाषाः - When God made the bodies of various creatures out of the Primordial matter, there was none to see them thoroughly except God Himself (as the power and knowledge of the souls was limited). When souls were made to enter different bodies (according to their previous actions, the Pranas (vital breaths) blood and other Dhatus (constituents of the body) supported or upheld the essential ingredients of the bodies. It is only a few enquiries sought for truth, that make the learned wise men to ask about these subtle and abstruse matters and not all.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जेव्हा सृष्टीच्या आरंभी ईश्वराने सर्वांची शरीरे निर्माण केली तेव्हा कुणीही जीव त्यांना पाहणारा नव्हता. जेव्हा जीवात्म्यांनी त्यांच्यात प्रवेश केला तेव्हा प्राण इत्यादी वायू, रक्त इत्यादी धातू व जीव मिळून देह धारण करून हालचाली (गती) करतात. या विषयासंबंधी एखादाच विद्वानांना विचारतो सर्वजण विचारत नाहीत. ॥ ४ ॥