वांछित मन्त्र चुनें
664 बार पढ़ा गया

अ॒यं दे॒वाना॑म॒पसा॑म॒पस्त॑मो॒ यो ज॒जान॒ रोद॑सी वि॒श्वश॑म्भुवा। वि यो म॒मे रज॑सी सुक्रतू॒यया॒जरे॑भि॒: स्कम्भ॑नेभि॒: समा॑नृचे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayaṁ devānām apasām apastamo yo jajāna rodasī viśvaśambhuvā | vi yo mame rajasī sukratūyayājarebhiḥ skambhanebhiḥ sam ānṛce ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒यम्। दे॒वाना॑म्। अ॒पसा॑म्। अ॒पःऽत॑मः। यः। ज॒जान॑। रोद॑सी॒ इति॑। वि॒श्वऽश॑म्भुवा। वि। यः। म॒मे। रज॑सी॒ इति॑। सु॒क्र॒तु॒ऽयया॑। अ॒जरे॑भिः। स्कम्भ॑नेभिः। सम्। आ॒नृचे ॥ १.१६०.४

664 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:160» मन्त्र:4 | अष्टक:2» अध्याय:3» वर्ग:3» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:22» मन्त्र:4


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - जो (अयम्) यह (देवानाम्) पृथिवी आदि लोकों के (अपसाम्) कर्मों के बीच (अपस्तमः) अतीव क्रियावान् है वा (यः) जो (विश्वशम्भुवा) सब में सुख की भावना करानेवाले कर्म से (रोदसी) सूर्यलोक और भूमिलोक को (जजान) प्रकट करता है वा (यः) जो (सुक्रतूयया) उत्तम बुद्धि, कर्म और (स्कम्भनेभिः) रुकावटों से और (अजरेभिः) हानिरहित प्रबन्धों के साथ (रजसी) भूमिलोक और सूर्यलोक का (वि, ममे) विविध प्रकार से मान करता उसकी मैं (समानृचे) अच्छे प्रकार स्तुति करता हूँ ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने आदि काम जिस जगदीश्वर के होते हैं, जो निश्चय के साथ कारण से समस्त नाना प्रकार के कार्य को रचकर अनन्त बल से धारण करता है, उसीको सब लोग सदैव प्रशंसित करें ॥ ४ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सृष्टि की उत्पत्ति क्यों [सुक्रतूयया]

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अयम्) = ये प्रभु (अपसाम्) = कर्मशील (देवानाम्) = देवों में (अपस्तमः) = सर्वाधिक कर्मशील हैं। सूर्यादि सब देव गतिमय हैं, परन्तु इनको गति देनेवाले तो वे प्रभु ही हैं। ज्ञानी पुरुष भी क्रियाशील होते हैं, उन्हें भी क्रियाशक्ति प्रभु से ही प्राप्त होती है। क्रिया प्रभु का स्वभाव ही है–'स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च' । २. प्रभु वे हैं (यः रोदसी) = जो इस द्युलोक व पृथिवी- लोक को (विश्वशम्भुवा) = सबके लिए शान्ति उत्पन्न करनेवाला जजान बनाते हैं। द्युलोक व पृथिवीलोक वस्तुतः हमारा कल्याण करनेवाले हैं। इनके अनुचित प्रयोग से हम कष्ट उठाते हैं । ३. प्रभु वे हैं (यः) = जिन्होंने (रजसी) = इन द्यावापृथिवी को- अध्यात्म में मस्तिष्क व शरीर को (सुक्रतूयया) = उत्तम कर्मों की इच्छा से (विममे) = विशेष मानपूर्वक बनाया है। सृष्टि का निर्माण इसलिए हुआ है कि इसमें जीव उत्तम कर्मों को करते हुए अन्ततः मोक्ष को सिद्ध कर सकें। ४. इन द्यावापृथिवी को वे प्रभु (अजरेभिः स्कम्भनेभिः) = जीर्ण न होनेवाले स्तम्भों से (समानृचे) = सम्यक् आदृत करते हैं। इन लोकों के स्कम्भन की उन्होंने सुन्दरतम व्यवस्था की है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ – क्रिया करना प्रभु का स्वभाव ही है। प्रभु ने द्युलोक व पृथिवीलोक को शान्ति देनेवाला बनाया है। सृष्टि रचना का उद्देश्य यह है कि इसमें जीव उत्तम कर्म करते हुए मोक्ष के लिए अग्रसर हो सकें।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

योऽयं देवानामपसामपस्तमो यो विश्वशम्भुवा रोदसी जजान यः सुक्रतूयया स्कम्भनेभिरजरेभी रजसी विममे तमहं समानृचे ॥ ४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) (देवानाम्) पृथिव्यादीनाम् (अपसाम्) कर्मणाम् (अपस्तमः) अतिशयेन क्रियावान् (यः) (जजान) प्रकटयति (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (विश्वशम्भुवा) विश्वस्मिन् शं सुखं भावुकेन (वि) (यः) (ममे) मापयति (रजसी) लोकौ (सुक्रतूयया) सुष्ठु प्रज्ञया कर्मणा वा (अजरेभिः) अजरैर्हानिरहितैः प्रबन्धैः (स्कम्भनेभिः) स्तम्भनैः (सम्) (आनृचे) स्तौमि ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - सृष्ट्युत्पत्तिस्थितिप्रलयकरणादीनि कर्माणि यस्य जगदीश्वरस्य भवन्ति यो हि कारणादखिलविविधं कार्यं रचयित्वाऽनन्तबलेन धरति तमेव सर्वे सदा प्रशंसन्तु ॥ ४ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Of all the lights of divinity and of all the acts of divinities, the Lord Supreme is the prime efficient cause of the acts of creation. Lord of bliss for the whole universe in existence, He creates the heaven and earth. With His divine omnipotence, He pervades and transcends the spaces and, with His imperishable powers of sustenance, stabilises the suns and the stars and the worlds that move. Homage in prayer and celebration to the Lord!

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Glorify only one God.

अन्वय:

I glorify that Supreme Being (God) who most actively performs the deeds of the other divine elements. In fact, He generates the earth and heaven with His all delighting power. With His wonderful wisdom or actions, He measures out the earth and the sky and props them up with constant support powers.

भावार्थभाषाः - All should always glorify or praise that one God only, who is the all powerful cause of the creation, sustenance and dissolution of the Universe. He upholds this world and all objects, having made them with His infinite power from the eternal cause Primordial Matter or Prakriti.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सृष्टीची उत्पत्ती, स्थिती व प्रलय इत्यादी काम ज्या जगदीश्वराचे असते व जो निश्चयपूर्वक कारणापासून विविध प्रकारची कार्य निर्मिती करून अनन्त बलाने धारण करतो, त्याचीच सर्व माणसांनी प्रशंसा करावी. ॥ ४ ॥