पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र में प्रभु को 'तोद' = चाबुक का प्रहार करनेवाला कहा गया था। यह कष्टों के रूप में चाबुक का प्रहार प्रभु किन व्यक्तियों पर करते हैं - [क] (धनिनः) = धनी पुरुष के जो धनी (व्यनिनस्य) = उस धन का स्वामी नहीं है। जब हम धन के दास बन जाते हैं, धनार्जन ही हमारे जीवन का लक्ष्य हो जाता है, हम एक धन कमाने के साधन money-making-machine ही बन जाते हैं, तब हम धन के स्वामी नहीं रहते। उस समय धन हमारा स्वामी हो जाता है, और हम धन के वहन करनेवाले - बोझ ढोनेवाले ही हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में 'Death unloads thee'. मौत ही हमारे बोझ को उतारती है। प्रभु इन 'व्यनिन धनियों' को चाबुक लगानेवाले हैं। २. [ख] (प्रहोषे) = प्रकृष्ट आहुति देने के कार्यों में, अर्थात् यज्ञादि उत्तम कार्यों में (चित्) = भी (अररुषः) = दान न देनेवाले को चाबुक लगाते हैं । धनी होते हुए भी जो यज्ञादि श्रेष्ठ कार्यों में दान नहीं देता, वह प्रभु से दण्डनीय होता है। ३. [ग] (कदा च) = कभी भी (न प्रजिगतः) = प्रभु गुणगान न करनेवाले को आप दण्ड देनेवाले होते हैं। जो प्रभुविमुख होकर प्राकृतिक भोगों में फँसकर वैषयिक वृत्ति का बन जाता है, वह विविध रोगों के रूप में प्रभु से दण्डनीय होता है । ४ [घ] (अदेवयोः) = आप अदेवयु पुरुष के चाबुक लगानेवाले हो । जो दिव्य गुणों के विकसित करने की कामनावाला नहीं होता, जिनके हृदयक्षेत्र में आसुरभावरूपी घास-फूस ही प्रचुरता से उग आती है, उस व्यक्ति को भी आप दण्ड देते हो। इन कष्टरूप दण्डों से प्रेरित करके आप उन्हें सुमार्ग पर लौटने की प्रेरणा देते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम चार पापों से बचने का प्रयत्न करें - (१) धन होते हुए धन का स्वामी न बनकर दास बन जाना, (२) यज्ञादि उत्कृष्ट कार्यों में दान न देना, (३) प्रभुस्तवन से दूर रहना,और (४) दिव्यगुणों के विकास के लिए प्रयत्न न करना ।