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द्र॒वि॒णो॒दा द॑दातु नो॒ वसू॑नि॒ यानि॑ शृण्वि॒रे। दे॒वेषु॒ ता व॑नामहे॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

draviṇodā dadātu no vasūni yāni śṛṇvire | deveṣu tā vanāmahe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

द्र॒वि॒णः॒ऽदाः। द॒दा॒तु॒। नः॒। वसू॑नि। यानि॑। शृ॒ण्वि॒रे। दे॒वेषु॑। ता। व॒ना॒म॒हे॒॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:15» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:29» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:4» मन्त्र:8


स्वामी दयानन्द सरस्वती

उक्त अग्नि ही सब पदार्थों का देने वा उनका दिलानेवाला है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - हम लोगों के (यानि) जिन (देवेषु) विद्वान् वा दिव्य सूर्य्य आदि अर्थात् शिल्पविद्या से सिद्ध विमान आदि पदार्थों में (वसूनि) जो विद्या, चक्रवर्त्ति राज्य और प्राप्त होने योग्य उत्तम धन (शृण्विरे) सुनने में आते तथा हम लोग (वनामहे) जिनका सेवन करते हैं, (ता) उनको (द्रविणोदाः) जगदीश्वर (नः) हम लोगों के लिये (ददातु) देवे तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ भौतिक अग्नि भी देता है॥८॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने इस संसार में जीवों के लिये जो पदार्थ उत्पन्न किये हैं, उपकार में संयुक्त किये हैं, उन पदार्थों से जितने प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष वस्तु से सुख उत्पन्न होते हैं, वे विद्वानों ही के सङ्ग से सुख देनेवाले होते हैं॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवनिमित्त धन

पदार्थान्वयभाषाः - १. (द्रविणोदाः) - सब धनों को देनेवाले प्रभु (नः) - हमें (वसूनि ददातु) - उन धनों को दें (यानि श्रृण्विरे) - जो खूब सुने जाते हैं , अर्थात् जिस धन को हम खूब दान के रूप में देते हैं और इस प्रकार यश को प्राप्त करते हैं ।  २. (ता) - उन धनों को हम (देवेषु) - देवों के निमित्त (वनामहे) - सेवित करते हैं , अर्थात् इन धनों को भोगविलास में व्यय न करके विद्वानों को लोकहित के कार्यों के लिए देते हैं तथा यज्ञादि द्वारा वायु आदि देवों की शुद्धि के लिए उनका विनियोग करते हैं । इन धनों को दान में देकर , लोभ को जीतने से , हम व्यसनों के मूलभूत इस लोभ को नष्ट करके दिव्यगुणों को प्राप्त करते हैं । इस प्रकार ये धन हमारे यश - ही - यश का कारण बनते हैं । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमें वे धन दें जो कि दानरूप में दिये जाकर हमारे यश का कारण बनें और हमारे दिव्य गुणों का वर्धन करनेवाले हों । 

स्वामी दयानन्द सरस्वती

स एव सर्वेषां पदार्थानां प्रदातेत्युपदिश्यते।

अन्वय:

अस्माभिर्यानि देवेषु दिव्येषु कर्म्मसु राज्येषु वा शिल्पविद्यासिद्धेषु विमानादिषु सत्सु वसूनि शृण्विरे श्रूयन्ते ता तानि वयं वनामह एतानि च द्रविणोदा जगदीश्वरो नोऽस्मभ्यं ददातु भौतिकश्च ददाति॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (द्रविणोदाः) सुष्ठूपासितो जगदीश्वरः सम्यग्योजितो भौतिको वा (ददातु) ददाति वा। अत्र पक्षे लडर्थे लोट्। (नः) अस्मभ्यम् (वसूनि) विद्याचक्रवर्त्तिराज्यप्राप्याण्युत्तमानि धनानि (यानि) परोक्षाणि (शृण्विरे) श्रूयन्ते। अत्र ‘श्रु’ धातोः छन्दसि लुङ्लङ्लिट इति लडर्थे लिट्, छन्दस्युभयथा इति सार्वधातुकत्वेन श्नुविकरण आर्द्धधातुकत्वाद्यगभावः, विकरणव्यवहितत्वाद् द्वित्वं च न भवति। (देवेषु) विद्वत्सु दिव्येषु सूर्य्यादिपदार्थेषु वा (ता) तानि। अत्र शेश्छन्दसि बहुलम् इति लोपः। (वनामहे) सम्भजामहे। अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदम्॥८॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वरणास्मिन् जगति प्राणिभ्यो ये पदार्था दत्तास्तेभ्य उपकारे संयोजितेभ्यो यावन्ति प्रत्यक्षाप्रत्यक्षाणि वस्तुजातानि वर्त्तन्ते, तानि देवेषु विद्वत्सु स्थित्वैव सुखप्रदानि भवन्तीति॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the lord creator and giver of wealth bless us with treasures of wealth which we have heard of, which we love, and which abound in the generous stores of nature, in yajna, and in the products of science and technology.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

He (God) is the Giver of all things is taught in the 8th Mantra.

अन्वय:

(1) May God the Giver of all wealth and strength give us good riches to be got from knowledge and good and vast Government that are renowned everywhere in divine works, Governments and aero planes etc. accomplished with the science of art. (2) May fire give us wealth of various kinds when properly utilized.

पदार्थान्वयभाषाः - (वसूनि) विद्याचक्रवर्तिराज्यप्राप्याण्युत्तमानि धनानि । = Wealth acquired from knowledge and vast but good Government. वनामहे (संभजामहे ) = We properly distribute.
भावार्थभाषाः - All things created by God in this world give happiness only when they are properly utilized by the wise and learned persons.
टिप्पणी: वन-संभक्तौ यज्ञकर्तॄणामृतुषु कर्तव्यान्युपदिश्यन्ते ॥

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - परमेश्वराने या जगात जीवांसाठी जे पदार्थ उत्पन्न केलेले आहेत व उपकारासाठी व्यवहारात आणलेले आहेत, त्या पदार्थांनी जितके प्रत्यक्ष किंवा अप्रत्यक्ष वस्तूंपासून सुख उत्पन्न होते ते विद्वानांच्या संगतीनेच होते. ॥ ८ ॥