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शची॑भिर्नः शचीवसू॒ दिवा॒ नक्तं॑ दशस्यतम्। मा वां॑ रा॒तिरुप॑ दस॒त्कदा॑ च॒नास्मद्रा॒तिः कदा॑ च॒न ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śacībhir naḥ śacīvasū divā naktaṁ daśasyatam | mā vāṁ rātir upa dasat kadā canāsmad rātiḥ kadā cana ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शची॑भिः। नः॒। श॒ची॒व॒सू॒ इति॑ शचीऽवसू। दिवा॑। नक्त॑म्। द॒श॒स्य॒त॒म्। मा। वा॒म्। रा॒तिः। उप॑। द॒स॒त्। कदा॑। च॒न। अ॒स्मत्। रा॒तिः। कदा॑। च॒न ॥ १.१३९.५

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:139» मन्त्र:5 | अष्टक:2» अध्याय:2» वर्ग:3» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:20» मन्त्र:5


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (शचीवसू) उत्तम बुद्धि का वास करानेहारे विद्वानो ! तुम (दिवा) दिन वा (नक्तम्) रात्रि में (शचीभिः) कर्मों से (नः) हम लोगों को विद्या (दशस्यतम्) देओ, (वाम्) तुम्हारा (रातिः) देना (कदा, चन) कभी (मा) मत (उप, दसत्) नष्ट हो, (अस्मत्) हम लोगों से (रातिः) देना (कदा, चन) कभी मत नष्ट हो ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - इस संसार में अध्यापक और उपदेशक अच्छी शिक्षायुक्त वाणी से दिन रात विद्या का उपदेश करें, जिससे किसी की उदारता न नष्ट हो ॥ ५ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कर्म व प्रज्ञा देनेवाले प्राणापान

पदार्थान्वयभाषाः - १.'शची' शब्द नि० २।१ में कर्म का नाम है और नि० ३।९ में प्रज्ञा का वाचक है। प्राणापान शक्तिवर्धन के द्वारा हमें कर्म करने का सामर्थ्य देते हैं और ज्ञान को दीस करके उन कर्मों को पवित्र रखते हैं। (शचीवसू) = हे कर्मशक्ति व ज्ञानरूप धनोंवाले प्राणापानो! आप (शचीभिः) = कर्मों व ज्ञानों के द्वारा (नः) = हमें (दिवा नक्तम्) = दिन-रात [सदा] (दशस्यतम्) = धनों को देनेवाले होओ। हम प्राण-साधना करें, उससे हमारी शक्ति व ज्ञान में वृद्धि हो। २. (वाम्) = हे प्राणापानो! आपकी यह (रातिः) = देन (मा कदाचन उपदसत्) = कभी क्षीण न हो। आप हमें सदा धन देनेवाले होओ। (अस्मत् रातिः) = हमारे विषय में आपका दान कदाचन कभी भी (मा उपदसत्) = क्षीण न हो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्राणसाधना करते हुए सदा कर्म सामर्थ्य व ज्ञान को प्राप्त करनेवाले हों।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

हे शचीवसू युवां दिवा नक्तं शचीभिर्नो विद्यां दशस्यतं वां रातिः कदा चन मोपदसत्। अस्मद्रातिः कदा चन मोपदसत् ॥ ५ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (शचीभिः) (नः) अस्मभ्यम् (शचीवसू) शचीं प्रज्ञां वासयितारौ (दिवा) दिवसे (नक्तम्) रात्रौ (दशस्यतम्) दद्यातम्। अयं दशस् शब्दः कण्ड्वादिषु द्रष्टव्यः। (मा) निषेधे (वाम्) युवयोः (रातिः) दानम् (उप) (दसत्) नश्येत् (कदा) (चन) (अस्मत्) (रातिः) दानम् (कदा) (चन) ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - इहाध्यापकोपदेशकौ सुशिक्षितया वाचाऽहर्निश विद्या उपदिशेताम्। यतः कस्याऽप्यौदार्यं न नश्येत् ॥ ५ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, lords of noble action and givers of wealth by noble action, for the noble actions of ours, bless us with the gifts of wealth day and night. We pray, may your generosity never wear away from us. May our charity too never forsake us.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Glories to Shachi-Vasus.

अन्वय:

O teachers and preachers ! you enable us to develop intellect and impart knowledge day and night. Your gift of knowledge be unending and likewise our donations should never dry up.

भावार्थभाषाः - The teachers and preachers imparting knowledge day and night in chosen words, make the human beings liberal.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या जगात अध्यापक व उपदेशक यांनी सुशिक्षित वाणीने अहर्निश विद्येचा उपदेश करावा ज्यामुळे कुणाचेही औदार्य नष्ट होता कामा नये. ॥ ५ ॥