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इ॒मे ये ते॒ सु वा॑यो बा॒ह्वो॑जसो॒ऽन्तर्न॒दी ते॑ प॒तय॑न्त्यु॒क्षणो॒ महि॒ व्राध॑न्त उ॒क्षण॑:। धन्व॑ञ्चि॒द्ये अ॑ना॒शवो॑ जी॒राश्चि॒दगि॑रौकसः। सूर्य॑स्येव र॒श्मयो॑ दुर्नि॒यन्त॑वो॒ हस्त॑योर्दुर्नि॒यन्त॑वः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ime ye te su vāyo bāhvojaso ntar nadī te patayanty ukṣaṇo mahi vrādhanta ukṣaṇaḥ | dhanvañ cid ye anāśavo jīrāś cid agiraukasaḥ | sūryasyeva raśmayo durniyantavo hastayor durniyantavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒मे। ये। ते॒। सु। वा॒यो॒ इति॑। बा॒हुऽओ॑जसः। अ॒न्तः। न॒दी इति॑। ते॒। प॒तय॑न्ति। उ॒क्षणः॑। महि॑। व्राध॑न्तः। उ॒क्षणः॑। धन्व॑न्। चि॒त्। ये। अ॒ना॒शवः॑। जी॒राः। चि॒त्। अगि॑राऽओकसः। सूर्य॑स्यऽइव। र॒श्मयः॑। दुः॒ऽनि॒यन्त॑वः। हस्त॑योः। दुः॒ऽनि॒यन्त॑वः ॥ १.१३५.९

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:135» मन्त्र:9 | अष्टक:2» अध्याय:1» वर्ग:25» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:20» मन्त्र:9


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर राजा को युद्ध के लिये कौन पठाने योग्य हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (वायो) विद्वन् ! (ये) जो (इमे) ये योद्धा लोग (ते) आपके सहाय से (बाह्वोजसः) भुजाओं के बल के (अन्तः) बीच (सु, पतयन्ति) पालनेवाले के समान आचरण करते, उनको (उक्षणः) सींचने में समर्थ कीजिये, (ये) जो (ते) आपके उपदेश से (मही) बहुत (व्राधन्तः) बढ़ते हुए अच्छे प्रकार पालनेवाले समान आचरण करते हैं उनको (उक्षणः) बल देनेवाले कीजिये, जो (धन्वन्) अन्तरिक्ष में (नदी) नदी के (चित्) समान वर्त्तमान (अनाशवः) किसी में व्याप्त नहीं (जीराः) वेगवान् (अगिरौकसः) जिनका अविद्यमान वाणी के साथ ठहरने का स्थान (दुर्नियन्तवः) जो दुःख से ग्रहण करने के योग्य वे (रश्मयः) किरण जैसे (सूर्यस्येव) सूर्य को वैसे (चित्) और (हस्तयोः) अपनी भुजाओं के प्रताप से शत्रुओं ने (दुर्नियन्तवः) दुःख से ग्रहण करने योग्य अच्छी पालना करनेवाले के समान आचरण करें, उन वीरों का निरन्तर सत्कार करो ॥ ९ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। राजपुरुषों को चाहिये कि बाहुबलयुक्त शत्रुओं से न डरनेवाले वीर पुरुषों को सेना में सदैव रक्खें, जिससे राज्य का प्रताप सदा बढ़े ॥ ९ ॥इस सूक्त में मनुष्यों का परस्पर वर्त्ताव कहने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ एकता है, यह जानना चाहिये ॥यह १३५ एकसौ पैंतीसवाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमकणों का दुर्नियन्तृत्व

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (सु वायो) = शोभन गतिशील जीव ! (इमे ये) = ये जो (ते) = तेरे सोमकण हैं (ते) = वे ही (बाह्वोजसः) = तेरी भुजाओं की शक्ति हैं, इनके कारण ही तेरी भुजाएँ सबल बनती हैं। (ते अन्तर्नदी) = ये नाड़ियों के अन्दर (पतयन्ति) = गति करते हैं। रुधिर के साथ व्याप्त हुए हुए नाड़ियों में प्रवाहित होते हैं। (उक्षण:) = अङ्ग प्रत्यङ्ग में शक्ति का सेचन करनेवाले हैं, (महि व्राधन्तः) = अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होते हुए (उक्षण:) = ये सोमकण शक्ति से सिक्त करनेवाले हैं। २. (धन्वन् चित्) = आकाशमार्ग में भी (ये) = जो सोमकण हैं वे (अनाशवः) = न क्षीण होनेवाले हैं। शरीर में मस्तिष्क ही आकाश है। सोमकण इस मस्तिष्क को भी अपनी व्याप्ति से उज्वल बनाते हैं। (जीराः चित्) = ये शीघ्र गतिवाले हैं, शरीर में स्फूर्ति लानेवाले हैं, (अ-गिरौकसः) = वस्तुतः वाणी इनका (ओकस्) = निवास स्थान नहीं बनती। वाणी से इनकी महिमा का वर्णन सम्भव नहीं। ये (सूर्यस्य) = सूर्य की (रश्मयः इव) = रश्मियों के समान (दुर्नियन्तवः) = बड़ी कठिनता से वश में करने योग्य हैं। सूर्य की रश्मियों का नियमन कौन कर सकता है? इसी प्रकार इन सोमकणों के नियमन की बात है। (हस्तयोः दुर्नियन्तवः) = हाथों से ये वश में नहीं किये जा सकते। ये कोई ऐसी वस्तु नहीं हैं कि इन्हें हाथों से पकड़ लेंगे। इनका नियमन तो चित्तवृत्ति के निरोध से ही सम्भव है । चित्तवृत्ति के निरोध के लिए की गई प्राणसाधना ही इनकी ऊर्ध्वगति का कारण बनती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमकण शरीर में व्याप्त होकर भुजाओं को शक्ति देते हैं और मस्तिष्क को उज्ज्वल बनाते हैं। बस, इनका काबू करना ही कठिन है।
अन्य संदर्भ: विशेष-सूक्त का आरम्भ इन शब्दों से है कि सोमकण तुझमें स्थिर हों। ये ही तेरे जीवन को मधुर बनाते हैं (१) समाप्ति पर भी यही कहा है कि ये मस्तिष्क को अक्षीणशक्तिवाला व उज्ज्वल बनाते हैं, शरीर में स्फूर्ति लाते हैं, परन्तु इनका नियमन सुगम नहीं (९) । अगले सूक्त में 'परुच्छेप' ही 'मित्रावरुणौ' की उपासना इन शब्दों में करता है कि-

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुना राज्ञा युद्धाय के प्रेषणीया इत्याह ।

अन्वय:

हे वायो य इमे ते तव सहायेन बाह्वोजसोऽन्तः सुपतयन्ति तानुक्षणः संपादय य इमे ते तवोपदेशेन महि व्राधन्तः सुपतयन्ति तानुक्षणः कुरु। ये धन्वन्नदी चिदिवानाशवो जीरा अगिरौकसो दुर्नियन्तवो रश्मयः सूर्यस्येव चिद्धस्तयोः प्रतापेन शत्रुभिर्दुर्नियन्तवः सुपतयन्ति तान् सततं सत्कुरु ॥ ९ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इमे) (ये) (ते) तव (सु) (वायो) विद्वन् (बाह्वोजसः) भुजबलस्य (अन्तः) मध्ये (नदी) नदी इव वर्त्तमानौ (ते) तव (पतयन्ति) पतिरिवाचरन्ति (उक्षणः) सेचनसमर्थान् (महि) महतः (व्राधन्तः) वर्धमानाः। अत्र पृषोदरादिना पूर्वस्याऽऽकारादेशो व्यत्ययेन परस्मैपदं च। (उक्षणः) बलप्रदान् (धन्वन्) धन्वन्यन्तरिक्षे (चित्) (ये) (अनाशवः) अव्याप्ताः (जीराः) वेगवन्तः (चित्) (अगिरौकसः) अविद्यमानया गिरा सहौको गृहं येषां ते। अत्र तृतीयाया अलुक्। (सूर्यस्येव) यथा सवितुः (रश्मयः) किरणाः (दुर्नियन्तवः) दुःखेन नियन्तुं निग्रहीतुं योग्याः (हस्तयोः) भुजयोः (दुर्नियन्तवः) ॥ ९ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। राजपुरुषैर्बाहुबलयुक्ताः शत्रुभिरधृष्यमाणा वीराः पुरुषाः सेनायां सदैव रक्षणीया येन राजप्रतापः सदा वर्द्धेतेति ॥ ९ ॥अत्र मनुष्याणां परस्परवर्त्तमानोक्तत्वादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह संगतिरस्तीति वेद्यम् ॥इति पञ्चत्रिंशदुत्तरं शततमं सूक्तं पञ्चविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - These warriors of yours, strong of arm and virile they are. Generous and creative, they sanctify the earth. They fly in space between earth and heaven, and, themselves rising in glory, they add to the glory of earth and heaven. Rising to the stars like the winds they are steady and self-restrained. Impetuous as they are like the winds, their rest and home is beyond words. Untamable they are like the sunbeams, and awful to handle by the hands.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. राजपुरुषांनी बलवान शत्रूंना न घाबरणाऱ्या वीर पुरुषांना सदैव सेनेत बाळगावे. ज्यामुळे राज्याचा पराक्रम वाढेल. ॥ ९ ॥