वांछित मन्त्र चुनें
448 बार पढ़ा गया

अध॒ ग्मन्ता॒ नहु॑षो॒ हवं॑ सू॒रेः श्रोता॑ राजानो अ॒मृत॑स्य मन्द्राः। न॒भो॒जुवो॒ यन्नि॑र॒वस्य॒ राध॒: प्रश॑स्तये महि॒ना रथ॑वते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

adha gmantā nahuṣo havaṁ sūreḥ śrotā rājāno amṛtasya mandrāḥ | nabhojuvo yan niravasya rādhaḥ praśastaye mahinā rathavate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अध॑। ग्मन्त॑। नहु॑षः॑। हव॑म्। सू॒रेः। श्रोत॑। रा॒जा॒नः॒। अ॒मृत॑स्य। म॒न्द्राः॒। न॒भः॒ऽजुवः॑। यत्। नि॒र॒वस्य॑। राधः॑। प्रऽश॑स्तये। म॒हि॒ना। रथ॑ऽवते ॥ १.१२२.११

448 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:122» मन्त्र:11 | अष्टक:2» अध्याय:1» वर्ग:3» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:18» मन्त्र:11


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उपदेश करनेवाले का कर्त्तव्य अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मन्द्राः) आनन्द करानेवाले (राजानः) प्रकाशमान सज्जनो ! तुम (अमृतस्य) आत्मरूप से मरण धर्म रहित (सूरेः) समस्त विद्याओं को जाननेवाले (नहुषः) विद्वान् जन के (हवम्) उपदेश को (श्रोत) सुनो (नभोजुवः) विमान आदि से आकाश में गमन करते हुए तुम (यत्) जो (निरवस्य) रक्षा हीन का (राधः) धन है उसको (ग्मन्त) प्राप्त होओ (अध) उसके अनन्तर (महिना) बड़प्पन से (प्रशस्तये) प्रशंसित (रथवते) बहुत रथवाले को धन देओ ॥ ११ ॥
भावार्थभाषाः - जो परमेश्वर, परम विद्वान् और अपने आत्मा के सकाश से विरोधी नहीं होते और उनके उपदेशों का ग्रहण करें, वे विद्याओं को प्राप्त हुए महाशय होते हैं ॥ ११ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

धन को प्रभु का समझना

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार जीवन बनाकर (अध) = अब (नहुषः) = यह मनुष्यों के प्रति (ग्मन्ता) = जानेवाला होता है, अर्थात् उनके हित के कर्मों में प्रवृत्त होकर सबके दुः खों को दूर करनेवाला होता है । २. साथ ही (सूरेः) = प्रेरक प्रभु की (हवं श्रोता) = पुकार को सुननेवाला होता है और उसी के अनुसार जीवन के कार्यक्रम को चलाता है । ३. इस प्रकार लोकहित के कार्यों में लगनेवाले और प्रभु की पुकार को सुननेवाले लोग - [क] (राजानः) = दीप्त जीवनवाले होते हैं [राज़ दीसौ] तथा व्यवस्थित जीवनवाले होते हैं [राज् - to regulate], [ख] (अमृतस्य) = नीरोगता के (मन्द्राः) = आनन्द को अनुभव करनेवाले होते हैं, [ग] (नभोजुवः) = ये अपने को नभस् - आकाश की ओर प्रेरित करनेवाले होते हैं । पृथिवीरूप शरीर और हृदयरूप अन्तरिक्ष से भी ऊपर उठकर ये झुलोकरूप मस्तिष्क की ओर चलनेवाले होते हैं । शरीर के स्वास्थ्य तथा मन के नैर्मल्य को सिद्ध करके मस्तिष्क के ज्ञान को ये अपना लक्ष्य बनाते हैं । ४. इस ज्ञान का ही यह परिणाम होता है (यत्) = कि (निरवस्य) = [निर् अव] 'जिसका कोई रक्षक नहीं, जो सबका रक्षक है, उस प्रभु का ही (राधः) = यह सब धन है' - ऐसा ये समझते हैं । सबसे ऊँचा ज्ञान यही है कि 'सम्पूर्ण सम्पत्ति प्रभु की है' - ऐसा समझना । ऐसा समझकर अपने को उस धन का न्यासी [trustee] मात्र समझना । ऐसा समझने पर यह धन विलास में खर्च नहीं होता, अपितु (प्रशस्तये) = जीवन की प्रशस्ति के लिए होता है तथा (महिना) = [मह पूजायाम्] पूजा की वृत्ति के द्वारा (रथवते) = हमें उत्तम शरीर रथवाला बनाने के लिए होता है । धन को प्रभु का समझने से धन का कभी दुरुपयोग नहीं होता और यह धन हमारे जीवन को धन्य बनानेवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - लोकहित के कार्यों में लगने व प्रभु - प्रेरणा को सुनने से जीवन दीस व नीरोगता के आनन्दवाला होता है । धन को प्रभु का समझने से हम धन का दुरुपयोग नहीं करते और प्रशस्त जीवनवाले बनते हैं ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरुपदेशककृत्यमाह ।

अन्वय:

हे मन्द्रा राजानो यूयममृतस्य सूरेर्नहुषो हवं श्रोत नभोजुवो यूयं यन्निरवस्य राधस्तद्ग्मन्ताध महिना प्रशस्तये रथवते राधो दत्त ॥ ११ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अध) आनन्तर्ये (ग्मन्त) प्राप्नुत। अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (नहुषः) विदुषो नरस्य (हवम्) उपदेशाख्यं शब्दम् (सूरेः) सर्वविद्याविदः (श्रोत) शृणुत। अत्र विकरणलुक् द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घश्च। (राजानः) राजमानाः (अमृतस्य) अविनाशिनः (मन्द्राः) आह्लादयितारः (नभोजुवः) विमानादिना नभसि गच्छन्त (यत्) (निरवस्य) निर्गतोऽवो रक्षणं यस्य (राधः) धनम् (प्रशस्तये) प्रशस्ताय (महिना) महत्त्वेन (रथवते) बहवो रथा विद्यन्ते यस्य तस्मै ॥ ११ ॥
भावार्थभाषाः - ये परमेश्वरस्य परमविदुषः स्वात्मनश्च सकाशादविरोधिनस्तदुपदेशांश्च गृह्णीयुस्ते प्राप्तविद्या महाशया जायन्ते ॥ ११ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Divinities of nature, generous powers of humanity, brilliant and joyous, flying across the skies with your own power and grandeur, listen to the prayer and invitation of the charitable man, brave and immortal of fame and honour, leave the wealth of the uncharitable and unprotective unprotected and let it pass on to the man of love and charity for noble causes.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The duties of a preacher are told in the eleventh Mantra.

अन्वय:

O Kings shining on account of your virtues, causing delight to all, listen to the words of advice of a scholar who regards himself immortal (spiritually), you who travel in the sky (by a aero planes) protect the wealth of a poor man who has no guardian, grant wealth to that admirable who has person many chariots or who is the master of his chariot in the from of body.

पदार्थान्वयभाषाः - (हवम्) उपदेशाख्यं शब्दम् = Worlds uttered in the form of sermons. (नभोजुव:) विमानादिना नभांसि गच्छन्तः = Travelling in the sky by air crafts etc.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे, परमेश्वर, अत्यंत विद्वान व आपल्या आत्म्याच्या विरोधी नसतात व त्यांचा उपदेश ग्रहण करतात ते विद्या प्राप्त करून श्रेष्ठ बनतात. ॥ ११ ॥