वांछित मन्त्र चुनें
788 बार पढ़ा गया

अ॒ग्निना॒ग्निः समि॑ध्यते क॒विर्गृ॒हप॑ति॒र्युवा॑। ह॒व्य॒वाड् जु॒ह्वा॑स्यः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agnināgniḥ sam idhyate kavir gṛhapatir yuvā | havyavāḍ juhvāsyaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ग्निना॑। अ॒ग्निः। सम्। इ॒ध्य॒ते॒। क॒विः। गृ॒हऽप॑तिः। युवा॑। ह॒व्य॒ऽवाट्। जु॒हुऽआ॑स्यः॥

788 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:12» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:22» मन्त्र:6 | मण्डल:1» अनुवाक:4» मन्त्र:6


स्वामी दयानन्द सरस्वती

वह अग्नि कैसे प्रकाशित होता और किस प्रकार का है, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - मनुष्यों को उचित है कि जो (जुह्वास्यः) जिसका मुख तेज ज्वाला और (कविः) क्रान्तदर्शन अर्थात् जिसमें स्थिरता के साथ दृष्टि नहीं पड़ती, तथा जो (युवा) पदार्थों के साथ मिलने और उनको पृथक्-पृथक् करने (हव्यवाट्) होम किये हुए पदार्थों को देशान्तरों में पहुँचाने और (गृहपतिः) स्थान तथा उनमें रहनेवालों का पालन करनेवाला है, उस से (अग्निः) यह प्रत्यक्ष रूपवान् पदार्थों को जलाने, पृथिवी और सूर्य्यलोक में ठहरनेवाला अग्नि (अग्निना) बिजुली से (समिध्यते) अच्छी प्रकार प्रकाशित होता है, वह बहुत कामों को सिद्ध करने के लिये प्रयुक्त करना चाहिये॥६॥
भावार्थभाषाः - जो यह सब पदार्थों में मिला हुआ विद्युद्रूप अग्नि कहाता है, उसी में प्रत्यक्ष यह सूर्य्यलोक और भौतिक अग्नि प्रकाशित होते हैं, और फिर जिसमें छिपे हुए विद्युद्रूप हो के रहते हैं, जो इन के गुण और विद्या को ग्रहण करके मनुष्य लोग उपकार करें, तो उन से अनेक व्यवहार सिद्ध होकर उनको अत्यन्त आनन्द की प्राप्ति होती है, यह जगदीश्वर का वचन है॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

क्रमिक आश्रम

पदार्थान्वयभाषाः - १. प्रस्तुत मन्त्रों में 'अग्नि' से मुख्यतया प्रभु का ग्रहण होता है । प्रभु के सम्पर्क में आने पर भक्त - जीव भी अग्नि - तुल्य बन जाता है । समाज में ये ब्रह्म के उपासक 'ब्राह्मण' अग्नि कहलाते हैं । इन्हीं ज्ञानाग्नि से दीप्त ब्राह्मणों को आचार्य पदवी पर अधिष्ठित होकर अपने अन्तेवासियों में भी ज्ञानाग्नि को दीप्त करना होता है । इसी बात को मन्त्र में इस रूप में कहते हैं कि (अग्निना अग्निः समिध्यते) - ज्ञानाग्नि से दीप्त अग्नि नामक आचार्य से विद्यार्थी में (अग्नि) - ज्ञानाग्नि (समिध्यते) - दीप्त की जाती है । विद्यार्थी भी ज्ञान को प्राप्त करके 'अग्नि' नाम से कहलाने योग्य हो जाता है । वस्तुतः जीवन के प्रथमाश्रम में यही सबसे महान् कार्य हैं कि ज्ञानाग्नि से दीप्त आचार्य से ज्ञान को प्राप्त करके हम भी 'अग्नि' बनने का प्रयत्न करें ।  २. अब द्वितीया श्रम में हम (कविः) - क्रान्तदर्शी बनें  , वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप को समझें  , आपातरमणीय विषयों के अन्दर हम फंस न जाएँ तथा व्यावहारिक सम्बन्धों को असली मानकर कहीं हम दुःखी न बन जाएँ  , अपितु इन सम्बन्धों की व्यावहारिकता को समझते हुए हम (गृहपतिः) - एक सुन्दर घर का निर्माण करें । (युवा) - हमारा प्रयत्न हो कि बुराइयों को दूर करके [यु - अमिश्रण] अच्छाइयों का वहाँ मिश्रण [यु - मिश्रण] करनेवाले बनें । ३. इस प्रकार इस उत्तम घर के निर्माण के बाद गृहस्थ के कर्तव्यों से मुक्त होकर वानप्रस्थ होते हुए हम (हव्यवाट्) - हवि के योग्य पदार्थों का ही वहन करनेवाले बनें । मनु ने लिखा है कि - घर के अन्य परिच्छदों को छोड़कर 'अग्निहोत्रं समादाय' यज्ञ - सम्बन्धी वस्तुओं को लेकर वनस्थ हो जाए । वानप्रस्थ में भी एतानेव महायज्ञान् निर्वपेद् विधिपूर्वकम् - इन महायज्ञों को तो उसे करना ही है । सो वानप्रस्थ में इसका मुख्य कर्तव्य इन हवि के उपयुक्त कर्मों को न नष्ट होने देना है ।  ४. अब संन्यस्त होते हुए यह (जुह्वास्यः) - चम्मच के तुल्य मुखवाला होता है । जैसे चम्मच यज्ञाग्नि में घृत आदि के प्रक्षेप का साधन होता है  , उसी प्रकार इसका मुख प्रजा - रूप अग्नि में ज्ञानरूप घृत की आहुति देनेवाला बनता है । एक संन्यासी यत्र - तत्र विचरता हुआ प्रजा में ज्ञान का प्रसार करता है । इसी में जीवन - यात्रा की पूर्ति है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रथमाश्रम में अपने में ज्ञान को समिद्ध करते हुए हम द्वितीया श्रम में उत्तम 'गृहपति' बनें । वानप्रस्थ बनकर यज्ञों का वहन करते हुए 'तुरीयाश्रम' में ज्ञान का प्रसार करनेवाले बनें । 

स्वामी दयानन्द सरस्वती

स कथं प्रदीप्तो भवति कीदृशश्चेत्युपदिश्यते।

अन्वय:

मनुष्यैर्यो जुह्वास्यो युवा हव्यवाट् कविर्गृहपतिरग्निरग्निना समिध्यते स कार्य्यसिद्धये सदा सम्प्रयोज्यः॥६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निना) व्यापकेन विद्युदाख्येन (अग्निः) प्रसिद्धो रूपवान् दहनशीलः पृथिवीस्थः सूर्य्यलोकस्थश्च (सम्) सम्यगर्थम् (इध्यते) प्रदीप्यते (कविः) क्रान्तदर्शनः (गृहपतिः) गृहस्य स्थानस्य तत्स्थस्य वा पतिः पालनहेतुः (युवा) यौति मिश्रयति पदार्थैः सह पदार्थान् वियोजयति वा (हव्यवाट्) यो हुतं द्रव्यं देशान्तरं वहति प्रापयति सः (जुह्वास्यः) जुहोत्यस्यां सा जुहूर्ज्वाला साऽस्यं मुखं यस्य सः॥६॥
भावार्थभाषाः - योऽयं सर्वपदार्थमिश्रो विद्युदाख्योऽग्निरस्ति तेनैव प्रसिद्धौ सूर्य्याग्नी प्रकाश्येते पुनरदृष्टौ सन्तौ तद्रूपावेव भवतः। मनुष्यैर्यद्यनयोर्गुणविद्याः सम्यग्गृहीत्वोपकारः क्रियेत तर्ह्यनेके व्यवहाराः सिद्ध्येयुस्तैरसंख्यातानन्दप्राप्तिः सर्वेभ्यो नित्यं भवतीत्याह जगदीश्वरः॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni is lighted, generated and raised by agni, universal energy. It is the creator of new things, protector and promoter of the home, and ever young—powerful catalytic agent carrying holy materials to the sky and to the heavens across space, and a voracious consumer (and creator) with its mouth ever open to devour (and convert) holy offerings (to divine gifts of joy and prosperity).

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is that fire illumined and what are its properties is taught in the 6th Mantra.

अन्वय:

By fire in the form of electricity, this material fire on earth and in the sun is illuminated. It is the bearer of oblations to distant places, the lord or protector of the house and its objects, mixer and disintegrator of articles, illuminer, whose mouth is the vehicle of oblations; this should be utilized by wise men for the accomplishment of various works.

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निना ) व्यापकेन विद्युदाख्येन Electricity (जुह्वास्यः) जुहोत्यस्यां जुहूर्ज्वाला साऽस्यमुखं यस्य सः । (युवा) यौति मिश्रयति पदार्थैः सहपदार्थान् वियोजयति वा यु-मिश्रणामिश्रणयोः ॥
भावार्थभाषाः - The fire in the form of electricity which is present in all articles, illumines the sun and this material fire and they disappear in it, at the end in subtle form. If men know the properties of these two fires (the material and the sun) and utilize them properly, many works, may be accomplished and much happiness may be derived from them.
टिप्पणी: There is also a spiritual meaning of the mantra taking first Agni to mean as God and the second the soul. The fire in the form of the soul which goes from body to body through transmigration, which is the lord of the house (of body) wise, young and worshipper, which accepts desirable ideas and throws out ignoble thoughts, is illumined by God the Holy Fire, that burns all evils.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जो सर्व पदार्थांत व्याप्त असतो त्याला विद्युतरूपी अग्नी म्हणतात. त्याच्याद्वारेच प्रत्यक्ष हा सूर्यलोक व भौतिक अग्नी प्रकट होतात. ज्यात विद्युत लपलेली असते. त्यांचे गुण व विद्या जाणून माणसांनी उपकार केल्यास अनेक व्यवहार सिद्ध होऊन त्यांना अत्यंत आनंदाची प्राप्ती होते, हे जगदीश्वराचे वचन आहे. ॥ ६ ॥