घृता॑हवन दीदिवः॒ प्रति॑ ष्म॒ रिष॑तो दह। अग्ने॒ त्वं र॑क्ष॒स्विनः॑॥
ghṛtāhavana dīdivaḥ prati ṣma riṣato daha | agne tvaṁ rakṣasvinaḥ ||
घृत॑ऽआहवन। दी॒दि॒ऽवः॒। प्रति॑। स्म॒। रिष॑तः। द॒ह॒। अग्ने॑। त्वम्। र॒क्ष॒स्विनः॑॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
उक्त अग्नि फिर भी क्या करता है, सो अगले मन्त्र में प्रकाशित किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
रक्षो - दहन
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः स किं करोतीत्युपदिश्यते।
घृताहवनो दीदिवानग्ने योऽग्नी रक्षस्विनो रिषतो दोषान् शत्रूंश्च प्रति पुनःपुनर्दहति स्म, सोऽस्माभिः स्वकार्य्येषु नित्यं सम्प्रयोज्योऽस्ति॥५॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
THE SAME SUBJECT IS CONTINUED.
Resplendent Agni (fire) in which clarified butter is poured and which illuminates objects, burns up harmful evils like impurity and bad smell. That fire should be utilized by us in our works.
