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स नः॒ स्तवा॑न॒ आ भ॑र गाय॒त्रेण॒ नवी॑यसा। र॒यिं वी॒रव॑ती॒मिष॑म्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa naḥ stavāna ā bhara gāyatreṇa navīyasā | rayiṁ vīravatīm iṣam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। नः॒। स्तवा॑नः। आ। भ॒र॒। गाय॒त्रेण॑। नवी॑यसा। र॒यिम्। वी॒रऽव॑तीम्। इष॑म्॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:12» मन्त्र:11 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:23» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:4» मन्त्र:11


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी अगले मन्त्र में उन्हीं देवों का उपदेश किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - हे भगवन् ! (सः) जगदीश्वर आप ! (नवीयसा) अच्छी प्रकार मन्त्रों के नवीन पाठ गानयुक्त (गायत्रेण) छन्दवाले प्रगाथों से (स्तवानः) स्तुति को प्राप्त किये हुए (नः) हमारे लिये (रयिम्) विद्या और चक्रवर्त्ति राज्य से उत्पन्न होनेवाले धन तथा जिसमें (वीरवतीम्) अच्छे-अच्छे वीर तथा विद्वान् हों, उस (इषम्) सज्जनों के इच्छा करने योग्य उत्तम क्रिया का (आभर) अच्छी प्रकार धारण कीजिये॥१॥११॥(सः) उक्त भौतिक अग्नि (नवीयसा) अच्छी प्रकार मन्त्रों के नवीन-नवीन पाठ तथा गानयुक्त स्तुति और (गायत्रेण) गायत्री छन्दवाले प्रगाथों से (स्तवानः) गुणों के साथ ग्रहण किया हुआ (रयिम्) उक्त प्रकार का धन (च) और (वीरवतीम् इषम्) उक्त गुणवाली उत्तम क्रिया को (आभर) अच्छी प्रकार धारण करता है॥२॥११॥(सः) उक्त भौतिक अग्नि (नवीयसा) अच्छी प्रकार मन्त्रों के नवीन-नवीन पाठ तथा गानयुक्त स्तुति और (गायत्रेण) गायत्री छन्दवाले प्रगाथों से (स्तवानः) गुणों के साथ ग्रहण किया हुआ (रयिम्) उक्त प्रकार का धन (च) और (वीरवतीम् इषम्) उक्त गुणवाली उत्तम क्रिया को (आभर) अच्छी प्रकार धारण करता है॥२॥११॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। तथा पहिले मन्त्र से चकार की अनुवत्ति की है। हर एक मनुष्य को वेद आदि के नवीन-नवीन अध्ययन से वेद की उच्चारणक्रिया प्राप्त होती है, इस कारण नवीयसा इस पद का उच्चारण किया है। जिन धर्मात्मा मनुष्यों ने यथावत् शब्दार्थपूर्वक वेद के पढ़ने और वेदोक्त कर्मों के अनुष्ठान से जगदीश्वर को प्रसन्न किया है, उन मनुष्यों को वह उत्तम-उत्तम विद्या आदि धन तथा शूरता आदि गुणों को उत्पन्न करनेवाली श्रेष्ठ कामना को देता है, क्योंकि जो वेद के पढ़ने और परमेश्वर के सेवन से युक्त मनुष्य हैं, वे अनेक सुखों का प्रकाश करते हैं॥११॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रयि - वीर्य - इष

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार जब हमारे जीवन में "दिव्यता  , यज्ञ व हवि" को स्थान मिलता है तब हम सचमुच अपने जीवन [गयाः - प्राणों] का उत्तम त्राण [त्र - रक्षा] व रक्षण करते हैं । इस प्राणशक्ति का रक्षण जीवन में प्रभु का उत्कृष्ट स्तवन होता है । हम प्रभु से दिये गये इस शरीर का रक्षण करते हुए प्रभु का ही आदर कर रहे होते हैं । प्रभु की वस्तु का रक्षण प्रभु का सच्चा स्तवन है  , अतः कहते हैं कि (नवीयसा) - [नु स्तुतौ] स्तुत्यतर इस (गायत्रेण) - प्राणों के रक्षण से (स्तवानः) - स्तुति किये जाते हुए (सः) - वे आप (नः) - हमारे लिए (रयिम्) - धनों को (आभर) - सब प्रकार से भरनेवाले होइए तथा (वीरवतीम्) - वीरतावाले (इषम्) - अन्न को भी (आभर) - सब प्रकार से दीजिए । अथवा (वीरवती) - वीर्य व शक्ति से युक्त (रयिम्) - धन को दीजिए और साथ ही (इषम्) - प्रेरणा प्राप्त कराइए  , ताकि हम उस शक्ति व धन का सदा ठीक से प्रयोग करें  , मद में आकर शक्ति व धन का दुरुपयोग न कर बैठें ।  २. यहाँ मन्त्रार्थ से यह बात स्पष्ट है कि प्रभु का उत्कृष्ट स्तवन यही है कि हम प्रभु के दिये हुए शरीर को प्राणशक्ति के रक्षण के द्वारा सुरक्षित रखें । इसके सुरक्षण के लिए ही मन्त्र में "धन  , वीर्य व उत्तम अन्न अथवा उत्तम प्रेरणा" के लिए प्रार्थना की गई है ।     
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर की प्राणशक्ति का रक्षण करते हुए हम प्रभु का सुन्दर स्तवन करें  , प्रभु हमें धन  , वीर्य व इष - अन्न व प्रेरणा प्राप्त कराएँ । 

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरेतावुपदिश्येते।

अन्वय:

हे भगवन् ! स त्वं नवीयसा गायत्रेण स्तवानः सन् नो रयिं वीरवतीमिषं चाभरेत्येकः। स भौतिकोऽग्निर्नवीयसा गायत्रेणास्माभिः स्तवानो गृहीतगुणो रयिं वीरवतीमिषं चाभरतीति द्वितीयः॥११॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) पूर्वोक्तः (नः) अस्मभ्यम् (स्तवानः) स्तूयमानः गृहीतगुणो वा। अत्र सम्यानच् स्तुवः। (उणा०२.८६) इति बाहुलकात्समुपपदाभावेऽपि कर्मण्यौणादिक आनच् प्रत्ययः। अत्र सायणाचार्येण लटः स्थाने शानचमाश्रित्य स्तूयमानमिति व्याख्यानं कृतमत इदमशुद्धम्। (आ) समन्तात् (भर) धारय धारयति वा (गायत्रेण) गायत्री छन्द आदिर्यस्य प्रगाथस्य तेन। सोऽस्यादिरिति च्छन्दसः प्रगाथेषु। (अष्टा०४.२.५५) इति गायत्रीशब्दादण्। (नवीयसा) अतिशयितेन नवीनेन मन्त्रपाठगानयुक्तेन स्तवनेन (रयिम्) विद्याचक्रवर्त्तिराज्यजन्यं धनम् (वीरवतीम्) प्रशस्ता वीरा विद्यन्ते यस्याः ताम्। अत्र प्रशंसायां मतुप्। (इषम्) इष्यते या सत्क्रिया ताम्। अत्र कृतो बहुलमिति कर्मणि क्विप्॥११॥
भावार्थभाषाः - अत्र श्लेषालङ्कारः। पूर्वस्मान्मन्त्राच्चकारोऽनुकृष्यते। तथा प्रतिजनं नवीनं नवीनं वेदाध्ययनं तज्जन्योच्चारणक्रिया च प्रवर्त्तते तस्मान्नवीयसेत्युक्तम्। यैर्धर्मात्मभिर्मनुष्यैर्यथावच्छब्दार्थसम्बन्धपुरःसरेण वेदस्याध्ययेन तदुक्तकर्मणा च प्रीतः सम्पादितो जगदीश्वर उत्तमानि विद्यादिधनानि शूरत्वादिगुणान् सतीमिच्छां च ददाति॥११॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May Agni, omnipresent and self-refulgent Lord, adored again and ever again with Gayatri hymns and new versions of prayer, bless us with wealth, food and energy and heroic progeny.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

(1) Praised by our most admirable hymn O God, bestow upon us wealth got as a result of knowledge and good vast administration and good actions along with heroic progeny. (2)In the case of fire- The fire praised by us (by relating its properties and being utilized properly) produces wealth accompanied with heroic progeny and noble actions.

पदार्थान्वयभाषाः - (इषम् ) इष्यते या सक्रिया ताम् अत्र कृतो बहुलम् इति कर्मणि क्विप् ।
भावार्थभाषाः - In this Mantra also, there is Shleshalankar or double meaning. The word नवियता has been used here to show that the study of the Vedas is new to every individual and as consequence its pronunciation becomes some what new. When God is pleased by righteous persons through the proper and methodical study of the Vedas and the performance of the actions sanctioned by them, He grants them wealth in the form of knowledge, heroism and other virtues and noble desires.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. पहिल्या मंत्रातील ‘चकार’ची अनुवृत्ती झालेली आहे. प्रत्येक माणसाला वेद इत्यादीच्या नवनवीन अध्ययनाने वेदाची उच्चारणक्रिया कळते. याच कारणाने ‘नवीयसा’ या पदाचे उच्चारण केलेले आहे.
टिप्पणी: ज्या धर्मात्मा माणसांनी यथायोग्य शब्दार्थासह वेदाध्ययन व वेदोक्त कर्माच्या अनुष्ठानाने जगदीश्वराला प्रसन्न केलेले आहे, त्या माणसांना तो उत्तम विद्या इत्यादी धन व शौर्य इत्यादी गुण उत्पन्न करणारी श्रेष्ठ कामना देतो. कारण जे वेदाध्ययन करून परमेश्वराचे भाजन बनतात त्यांना अनेक प्रकारचे सुख मिळते. ॥ ११ ॥