वांछित मन्त्र चुनें

पु॒रां भि॒न्दुर्युवा॑ क॒विरमि॑तौजा अजायत। इन्द्रो॒ विश्व॑स्य॒ कर्म॑णो ध॒र्ता व॒ज्री पु॑रुष्टु॒तः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

purām bhindur yuvā kavir amitaujā ajāyata | indro viśvasya karmaṇo dhartā vajrī puruṣṭutaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पु॒राम्। भि॒न्दुः। युवा॑। क॒विः। अमि॑तऽओजाः। अ॒जा॒य॒त॒। इन्द्रः॑। विश्व॑स्य। कर्म॑णः। ध॒र्ता। व॒ज्री। पु॒रु॒ऽस्तु॒तः॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:11» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:21» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:3» मन्त्र:4


842 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से सूर्य्य और सेनापति के गुणों का उपदेश किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - जो यह (अमितौजाः) अनन्त बल वा जलवाला (वज्री) जिसके सब पदार्थों को प्राप्त करानेवाले शस्त्रसमूह वा किरण हैं, और (पुराम्) मिले हुए शत्रुओं के नगरों वा पदार्थों का (भिन्दुः) अपने प्रताप वा ताप से नाश वा अलग-अलग करने (युवा) अपने गुणों से पदार्थों का मेल करने वा कराने तथा (कविः) राजनीति विद्या वा दृश्य पदार्थों का अपने किरणों से प्रकाश करनेवाला (पुरुष्टुतः) बहुत विद्वान् वा गुणों से स्तुति करने योग्य (इन्द्रः) सेनापति और सूर्य्यलोक (विश्वस्य) सब जगत् के (कर्मणः) कार्यों को (धर्त्ता) अपने बल और आकर्षण गुण से धारण करनेवाला (अजायत) उत्पन्न होता और हुआ है, वह सदा जगत् के व्यवहारों की सिद्धि का हेतु है॥४॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे ईश्वर का रचा और धारण किया हुआ यह सूर्य्यलोक अपने वज्ररूपी किरणों से सब मूर्तिमान् पदार्थों को अलग-अलग करने तथा बहुत से गुणों का हेतु और अपने आकर्षणरूप गुण से पृथिवी आदि लोकों का धारण करनेवाला है, वैसे ही सेनापति को उचित है कि शत्रुओं के बल का छेदन साम, दाम और दण्ड से शत्रुओं को छिन्न-भिन्न करके बहुत उत्तम गुणों को ग्रहण करता हुआ भूमि में अपने राज्य का पालन करे॥४॥
842 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु - भक्त की गुण - चतुष्टयी पुरां

पदार्थान्वयभाषाः - १. प्रभु - भक्त सदा (अजायत) - होता है  , विकसित होता हुआ निम्न गुणोंवाला बनता है । यह (इन्द्रः) - जितेन्द्रिय होता है और इन्द्रियों के जीतने के कारण ही सिद्धि को प्राप्त करता है [सन्नियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं नियच्छति] सारे दोष इन्द्रियों की गुलामी के कारण ही तो थे । [इन्द्रियाणां प्रसंगेन दोषमृच्छत्यसंशयम्] अब निर्दोष जीवनवाला बनकर यह जन्म - मरण के चक्र से ऊपर उठता है । इसी बात को इस रूप में कहते हैं कि पुरा भिन्दुः यह शरीररूप पुरियों का विदारण करनेवाला होता है । स्थूल  , सूक्ष्म व कारणशरीर' ही असुरों के "त्रिपुर' हैं । इनका विदारण करनेवाला यह सचमुच "त्रिपुरारि' होता है ।  २. यह (विश्वस्य) - सब (कर्मणः) - कर्तव्य कर्मों का (धर्ता) - धारण करनेवाला होता है  , अर्थात् इसके जीवन में कभी अकर्मण्यता को स्थान नहीं मिलता  , इसी का यह परिणाम है कि यह (युवा) - [यु - मिश्रण - अमिश्रण] अच्छाइयों को अपने साथ मिलानेवाला व बुराइयों को अपने से पृथक् करनेवाला होता है । आलस्य व क्रिया का अभाव शतशः दोषों का जनक होता है ।  ३. यह (वज्री) - वज्रवाला होता है । इस वज्र से ही इन्द्र वृत्र का विनाश करता है । इन्द्र 'जीवात्मा' हैं  , वज्र - [वज गतौ] उसका सतत क्रियाशील जीवन है । इस क्रियाशील जीवनरूप वज्र से ही वह ज्ञान की आवरणभूत कामवासना को विनष्ट करता है । इस प्रकार यह (कविः) - क्रान्तदर्शी बनता है ।  ४. यह (पुरुष्टुतः) - खूब स्तुतिवाला होता है । वास्तविकता तो यह है कि यह श्वास - प्रश्वास लेते हुए भी प्रभु - स्तवन कर रहा होता है । इसका जीवन प्रभु - स्तवन द्वारा प्रभु से जुड़ जाता है और इसके जीवन में प्रभु की शक्ति का प्रवाह होने से यह (अमितौजाः) - अ - मित - बहुत अधिक ओज - [शक्ति] - वाला होता है । प्रभु जैसा ही हो जाता है  , अतः इसकी शक्ति अमित तो होनी ही है ।  
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम जितेंद्रिय बनकर जन्म मरण पर विजय पाएं । हम कर्मनिष्ठ बनकर गुणों का ग्रहण व दोषों का अपाकरण करें   , हम क्रियामय वज्र को लेकर ज्ञान के आवरण - भूत काम को नष्ट कर क्रांतदर्शी [कवि] बने तथा सदा प्रभु स्तवन से प्रभु मित्र बनकर अनंत शक्ति को प्राप्त करें ।
842 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरिन्द्रशब्देन सूर्य्यसेनापतिगुणा उपदिश्यन्ते।

अन्वय:

अयममितौजा वज्री पुरां भिन्दुर्युवा कविः पुरुष्टुत इन्द्रः सेनापतिः सूर्य्यलोको वा विश्वस्य कर्मणो धर्त्ताऽजायतोत्पन्नोऽस्ति॥४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (पुराम्) सङ्घातानां शत्रुनगराणां द्रव्याणां वा (भिन्दुः) भेदकः (युवा) मिश्रणामिश्रणकर्त्ता (कविः) न्यायविद्याया दर्शनविषयस्य वा क्रमकः (अमितौजाः) अमितं प्रमाणरहितं बलमुदकं वा यस्य यस्माद्वा सः (अजायत) उत्पन्नोऽस्ति (इन्द्रः) विद्वान्सूर्य्यो वा (विश्वस्य) सर्वस्य जगतः (कर्मणः) चेष्टितस्य (धर्त्ता) पराक्रमेणाकर्षणेन वा धारकः (वज्री) वज्राः प्राप्तिच्छेदनहेतवो बहवः शस्त्रसमूहाः किरणा वा विद्यन्ते यस्य सः। अत्र भूम्न्यर्थे इनिः (पुरुष्टुतः) बहुभिर्विद्वद्भिर्गुणैर्वा स्तोतुमर्हः॥४॥
भावार्थभाषाः - अत्र श्लेषालङ्कारः। यथेश्वरेण सृष्ट्वा धारितोऽयं सूर्य्यलोकः स्वकीयैर्वज्रभूतैश्छेदकैः किरणैः सर्वेषां मूर्त्तद्रव्याणां भेत्ता बहुगुणहेतुराकर्षणेन पृथिव्यादिलोकस्य धाताऽस्ति, तथैव सेनापतिना स्वबलेन शत्रुबलं छित्त्वा सामदानादिभिर्दुष्टान् मनुष्यान् भित्त्वाऽनेकशुभगुणाकर्षको भूत्वा भूमौ स्वराज्यपालनं सततं कार्य्यमिति वेद्यम्॥४॥
842 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Breaker of the enemy forts, youthful, creative and imaginative, hero of boundless strength, sustainer of the acts of the world and disposer, wielder of the thunderbolt, universally acclaimed and celebrated is risen into prominence.
842 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

(1) In the case of a commander of an army the meaning is. The commander of an army is born as crusher of enemies' cities, the young, the wise, of unbounded strength, the sustainer of all pious acts, the wielder of thunderbolt and other destructive weapons and much extolled. (2) In the ease of the sun- The sun is the destroyer of the germs of various diseases, giver of light to see all objects, containing un-measured force and water to rain down, sustainer of all by his gravitating power, possessing rays which remove impurity and therefore praised by wise.

भावार्थभाषाः - Just as the sun created by God is the destroyer of diseases with his rays and the upholder of the earth by his gravitating force, so should a commander by his power weaken or destroy the force of his enemies, should create disunion among unrighteous persons by the use of peaceful persuation and charity and other means and by imbibing many virtues, should always preserve Swarajya. (वज्री) दुष्टेभ्यो न्यायरूप वज्रधारी ।।
842 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. जसा ईश्वराने निर्माण केलेला व धारण केलेला हा सूर्यलोक आपल्या वज्ररूपी किरणांनी सर्व मूर्तिमान पदार्थांना वेगवेगळे करतो व पुष्कळशा गुणांचा हेतू असून आपल्या आकर्षणरूपी गुणाने पृथ्वी इत्यादी लोकांना धारण करणारा असतो, तसेच सेनापतीने शत्रूंच्या बलाचा, साम, दाम, दंड, भेद याद्वारे नाश करावा. शत्रूंना वेगवेगळे करावे. चांगल्या गुणांचे ग्रहण करून पृथ्वीवर स्वराज्याचे पालन करावे. ॥ ४ ॥