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उप॑ नो दे॒वा अव॒सा ग॑म॒न्त्वङ्गि॑रसां॒ साम॑भिः स्तू॒यमा॑नाः। इन्द्र॑ इन्द्रि॒यैर्म॒रुतो॑ म॒रुद्भि॑रादि॒त्यैर्नो॒ अदि॑ति॒: शर्म॑ यंसत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

upa no devā avasā gamantv aṅgirasāṁ sāmabhiḥ stūyamānāḥ | indra indriyair maruto marudbhir ādityair no aditiḥ śarma yaṁsat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उप॑। नः॒। दे॒वाः। अव॑सा। आ। ग॒म॒न्तु॒। अङ्गि॑रसाम्। साम॑ऽभिः। स्तू॒यमा॑नाः। इन्द्रः॑। इ॒न्द्रि॒यैः। म॒रुतः॑। म॒रुत्ऽभिः॑। आ॒दि॒त्यैः। नः॒। अदि॑तिः। शर्म॑। यं॒स॒त् ॥ १.१०७.२

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:107» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:7» वर्ग:25» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:16» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - (सामभिः) सामवेद के गानों से (स्तूयमानाः) स्तुति को प्राप्त होते हुए (आदित्यैः) पूर्ण विद्यायुक्त मनुष्य वा बारह महीनों (मरुद्भिः) विद्वानों वा पवनों और (इन्द्रियैः) धनों के सहित (इन्द्रः) सभाध्यक्ष (मरुतः) वा पवन (अदितिः) विद्वानों का पिता वा सूर्य्य प्रकाश और (देवाः) विद्वान् जन (अङ्गिरसाम्) प्राणविद्या के जाननेवालों (नः) हम लोगों के (अवसा) रक्षा आदि व्यवहार से (उप, आ, गमन्तु) समीप में सब प्रकार से आवें और (नः) हम लोगों के लिये (शर्म) सुख (यंसत्) देवें ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - ज्ञानप्रचार सीखनेहारे जन जिन विद्वानों के समीप वा विद्वान् जन जिन विद्यार्थियों के समीप जावें, वे विद्या, धर्म और अच्छी शिक्षा के व्यवहार को छोड़कर और कर्म कभी न करें, जिससे दुःख की हानि होके निरन्तर सुख की सिद्धि हो ॥ २ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्रियाँ , प्राण व देव

पदार्थान्वयभाषाः - १. (नः) = हम (अङ्गिरसाम्) = अङ्ग - अङ्ग में रसवालों के (सामभिः) = उपासना - मन्त्रों से (स्तूयमानाः) = स्तुति किये जाते हुए (देवाः) = देव (अवसा) = रक्षण के हेतु से (उपगमन्तु) = हमें समीपता से प्राप्त हों । मन्त्रों से देवों के स्तवन का अभिप्राय उन - उन देवों के गुणों के प्रतिपादन से है । जिन देवों के गुणों को हम समझेंगे , वे यथोपयुक्त होकर हमारा कल्याण करनेवाले होंगे । प्रकृति की तेतीस शक्तियाँ ही तेतीस देव हैं । ये सब - के - सब ज्ञानी पुरुष का कल्याण करते हैं । जब हम यह प्रार्थना करते हैं कि -“स्वस्ति द्यावापृथिवी”- सम्पूर्ण संसार हमारा कल्याण करे तो वहाँ यही उत्तर मिलता है कि (सुचेतुना)= उत्तम ज्ञान के द्वारा । यह संसार ज्ञात होकर ही कल्याण का कारण बनता है । अज्ञात अवस्था में ठीक उपयुक्त न होकर यह हमारे विनाश का कारण बनता है । (इन्द्रः) = सब इन्द्रियों का अधिष्ठाता वह प्रभु [चक्षुषश्चक्षुः , श्रोत्रस्य श्रोत्रम्] (इन्द्रियैः) = इन्द्रियों से (नः) = हमारे लिए (शर्म) = कल्याण (यंसत्) = प्रदान करे । हमें इन्द्रियाँ प्राप्त हों । प्रत्येक इन्द्रिय की शक्ति ठीक हो । इनकी शक्ति के ठीक होने पर ही सब सुख निर्भर है [सु+ख] । (मरुतः) = वायु (मरुद्भिः) = प्राणों से (नः) = हमारे लिए (शर्म) = कल्याण करे । वायु हमारे शरीरों में प्राणों के रूप में निवास करती है “वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत्” ।  प्राणशक्ति जीवन की सब उन्नतियों का मूल है । वास्तविकता तो यह है कि प्राणशक्ति ही सब इन्द्रियों में उस - उस रूप में कार्य करती है । “प्राणा वाव इन्द्रियाणि”- ये इन्द्रियों क्या हैं ? ये तो हैं ही प्राण । (अदितिः) = अदीना देवमाता (आदित्यैः)= अदिति पुत्रों , अर्थात् सब देवों से (नः) = हमारे लिए (शर्म)= सुख (यसत्)= दे । 'अदिति' स्वास्थ्य की देवता है । स्वास्थ्य ही सब दिव्यगुणों को उत्पन्न करता है । अस्वस्थ मनुष्य ईर्ष्या , द्वेष , क्रोधादि का शिकार हुआ रहता है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रकृति की बनी सब वस्तुएँ ज्ञात होकर ठीक से उपयुक्त होती हुई हमारा कल्याण करें । हमारी इन्द्रियाँ ठीक हों , प्राणशक्ति की कमी न हो और हम दिव्यगुणोंवाले बनें , जिससे हमारा जीवन सुखी रहे ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते ।

अन्वय:

सामभिः स्तूयमाना आदित्यैर्मरुद्भिरिन्द्रियैः सहेन्द्रो मरुतोऽदितिर्देवाश्चाङ्गिरसां नोऽस्माकमवसोपागमन्तु ते नोऽस्मभ्यं शर्म्म यंसत् प्रददतु ॥ २ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उप) सामीप्ये (नः) अस्माकम् (देवाः) विद्वांसः (अवसा) रक्षणादिना (आ) सर्वतः (गमन्तु) गच्छन्तु (अङ्गिरसाम्) प्राणविद्याविदाम् (सामभिः) सामवेदस्थैर्गानैः (स्तूयमानाः) (इन्द्रः) सभाद्यध्यक्षः (इन्द्रियैः) धनैः (मरुतः) पवनाः (मरुद्भिः) विद्वद्भिः पवनैर्वा (आदित्यैः) पूर्णविद्यैर्मनुष्यैर्द्वादशभिर्मासैर्वा सह (नः) अस्मभ्यम् (अदितिः) विद्वत्पिता सूर्यदीप्तिर्वा (शर्म्म) सुखम् (यंसत्) यच्छन्तु प्रददतु। अत्र वचनव्यत्ययेन बहुवचनस्थान एकवचनम् ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - जिज्ञासवो येषां विदुषां विद्वांसो वा जिज्ञासूनां सामीप्यं गच्छेयुस्ते नैव विद्याधर्मसुशिक्षाव्यवहारं विहायान्यत्कर्म कदाचित्कुर्य्युः। यतो दुःखहान्या सुखं सततं सिध्येत् ॥ २ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Invoked, honoured and aroused with the soma songs of the Angirasa scholars of pranic energies, let the divinities come with protection to bless: may Indra come with wealth and powers, Maruts with energy of winds, and Aditi with the seasonal gifts of sunlight and solar energy. May they, we pray, come close to us and bless us with peace, comfort and joy.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How are all devas is taught further in the second Mantra.

अन्वय:

May all enlightened persons, praised with the Sama Vedic hymn sung by the Knowers of the Science of breath (प्राणविद्या) come hither for our protection. May Indra (President of the Assembly etc.) with his treasures, the winds with learned persons and the father of enlightened persons or the glamour of the sun with twelve months or great scholars give us felicity.

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) सभाद्यध्यक्ष The President of the Assembly etc. (इन्द्रियै:) धनैः = With wealth or treasures. (अदितिः) विद्वत्पिता सूर्यदीप्तिर्वा = The father of enlightened persons or the splendor of the sun.
भावार्थभाषाः - When seekers after Truth approach enlightened wise persons or enlightened persons go to the seekers after truth. they should not do anything except the dealing consistent with Dharma (righteousness) Vidya (Wisdom) and good education, so that happiness may be brought about and suffering may have an end soon and for ever.
टिप्पणी: इन्द्रियमिति धननाम (निघ० २.१०)अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः । विश्वेदेवा अदितिः पंचजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् || (ऋ० १.६.१६/१० ) इति श्रुतिप्रामाण्यात् पितृपरकोऽर्थोऽत्र कृतो महर्षिणा दयानन्देन । द्यौरित्यर्थमादाय च सूर्यदीप्तिः।
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जिज्ञासू लोक ज्या विद्वानांच्या जवळ किंवा विद्वान लोक ज्या विद्यार्थ्याजवळ जातील त्यांनी विद्या, धर्म व चांगल्या शिक्षणाचा व्यवहार सोडून इतर कर्म कधी करू नये. ज्यामुळे दुःख नाहीसे होऊन निरंतर सुखाची सिद्धी व्हावी. ॥ २ ॥