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आश्रु॑त्कर्ण श्रु॒धी हवं॒ नूचि॑द्दधिष्व मे॒ गिरः॑। इन्द्र॒ स्तोम॑मि॒मं मम॑ कृ॒ष्वा यु॒जश्चि॒दन्त॑रम्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

āśrutkarṇa śrudhī havaṁ nū cid dadhiṣva me giraḥ | indra stomam imam mama kṛṣvā yujaś cid antaram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आश्रु॑त्ऽकर्ण। श्रु॒धि। हव॑म्। नू। चि॒त्। द॒धि॒ष्व॒। मे॒। गिरः॑। इन्द्र॑। स्तोम॑म्। इ॒मम्। मम॑। कृ॒ष्व। यु॒जः। चि॒त्। अन्त॑रम्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:10» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:20» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:3» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी परमेश्वर का निरूपण अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - (आश्रुत्कर्ण) हे निरन्तर श्रवणशक्तिरूप कर्णवाले (इन्द्र) सर्वान्तर्यामि परमेश्वर ! (चित्) जैसे प्रीति बढ़ानेवाले मित्र अपनी (युजः) सत्यविद्या और उत्तम-उत्तम गुणों में युक्त होनेवाले मित्र की (गिरः) वाणियों को प्रीति के साथ सुनता है, वैसे ही आप (नु) शीघ्र ही (मे) मेरी (गिरः) स्तुति तथा (हवम्) ग्रहण करने योग्य सत्य वचनों को (श्रुधि) सुनिये। तथा (मम) अर्थात् मेरी (स्तोमम्) स्तुतियों के समूह को (अन्तरम्) अपने ज्ञान के बीच (दधिष्व) धारण करके (युजः) अर्थात् पूर्वोक्त कामों में उक्त प्रकार से युक्त हुए हम लोगों को (अन्तरम्) भीतर की शुद्धि को (कृष्व) कीजिये॥९॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जो सर्वज्ञ जीवों के किये हुए वाणी के व्यवहारों का यथावत् श्रवण करनेहारा सर्वाधार अन्तर्यामी जीव और अन्तःकरण का यथावत् शुद्धि हेतु तथा सब का मित्र ईश्वर है, वही एक जानने वा प्रार्थना करने योग्य है॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

श्रुत्कर्ण बनना

पदार्थान्वयभाषाः - १. पिछले मन्त्र की 'सं गा अस्मभ्यं धूनुहि' इस प्रार्थना को सुनकर प्रभु जीव से कहते हैं कि (आश्रुत्कर्ण) - सब प्रकार से सुननेवाले हैं कान जिसके  , ऐसे (इन्द्र) - जितेन्द्रिय पुरुष ! तू (हवम्) - मेरे आह्वान को (श्रुधि) - सुन । जैसे पिता पुत्र को किसी बात के लिए कहे और पुत्र अनसुना कर दे तो कहते हैं कि इसे तो कुछ कहना व्यर्थ है  , यह तो सब सुझावों को बहिरे कानों से अनसुना कर देता है  , इसी प्रकार प्रभु की प्रेरणा को हम सामान्यतः सुनते नहीं । प्रभु कहते हैं कि "मैं प्रेरणा करता रहूँ तू सुने ही ना' ऐसा नहीं तू मेरी प्रेरणा को सुन ।  २. और (नु) - शीघ्र ही (मे गिरः) - इन वेदवाणियों को (दधिष्व) - धारण कर  , इनको चित्त में स्थान दे ।  ३. (युजः) - सदा तेरे साथ रहनेवाला जो मैं तेरा साथी हूँ उस (मम) - मेरे (इमं स्तोमम्) - इन साम - मन्त्रों द्वारा किये जानेवाले स्तवन् को (चित्) - निश्चय (अन्तरम्) - अपने अधिक समीप (कृष्वा) - कर अर्थात् तुझे प्रभु - स्तवन प्रियतम वस्तु हो  , अन्य सब वस्तुओं से इसका स्थान तेरे जीवन में सर्वाधिक हो  , तभी तो तू उन कर्मों को कर सकेगा  , जो तुझे स्वर्ग देनेवाले हों  , तभी तू कामादि  शत्रुओं का संहार कर पाएगा । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम प्रभु की प्रेरणा को सुनें  , प्रभु की वाणियों को चित्त में धारण करें  , प्रभु - स्तवन हमें सर्वाधिक प्रिय हो । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स एवोपदिश्यते।

अन्वय:

हे आश्रुत्कर्ण इन्द्र जगदीश्वर ! चिद्यथा प्रियः सखा युजः प्रियस्य सख्युर्गिरः प्रेम्णा शृणोति, तथैव त्वं नु मे गिरो हवं श्रुधि ममेमं स्तोममन्तरं दधिष्व युजो मामन्तःकरणं शुद्धं कृष्व कुरु॥९॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आश्रुत्कर्ण) श्रुतौ विज्ञानमयौ श्रवणहेतू कर्णौ यस्य तत्सम्बुद्धौ। अत्र सम्पदादित्वात् करणे क्विप्। (श्रुधि) शृणु। अत्र बहुलं छन्दसीति श्नोर्लुक्। श्रुशृणुपॄकृवृभ्य० (अष्टा०६.४.१०२) इति हेर्ध्यादेशः। (हवम्) आदातव्यं सत्यं वचनम्। (नु) क्षिप्रार्थे। नु इति क्षिप्रनामसु पठितम्। (निघं०२.१५) ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (चित्) पूजार्थे। चिदिदं ब्रूयादिति पूजायाम्। (निरु०१.४) (दधिष्व) धारय। ‘दध धारणे’ इत्यस्माल्लोट्, छन्दस्युभयथेत्यार्द्धधातुकाश्रयेणेडागमः। (मे) मम स्तोतुः (गिरः) वाणीः (इन्द्र) सर्वान्तर्यामिन्सर्वतः श्रोतः ! (स्तोमम्) स्तूयते येनासौ स्तोमस्तं स्तुतिसमूहम् (इमम्) प्रत्यक्षम् (मम) स्तोतुः (कृष्व) कुरु। ‘कृञ्’ इत्यस्माल्लोटि विकरणाभावः। (युजः) यो युनक्ति स युक् सखा तस्य सख्युः। ‘युजिर् योगे’ इत्यस्मादृत्विग्दधृगिति क्विन्। (चित्) इव। चिदित्युपमार्थे। (निरु०१.४) (अन्तरम्) अन्तःशोधनमाभ्यन्तरं वा॥९॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। मनुष्यैरीश्वरस्य सर्वज्ञत्वेन जीवेन प्रयुक्तस्य वाग्व्यवहारस्य यथावत् श्रोतृत्वेन सर्वाधारत्वेनान्तर्यामितया जीवान्तःकरणयोर्यथावच्छोधकत्वेन सर्वस्य मित्रत्वाच्चायमेवैकः सदैव ज्ञातव्यः प्रार्थनीयश्चेति॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Lord of instant and universal ear, listen to my voice. Hold my prayer in your heart. Indra, it is the song of a dear friend. Take me in along with it, cleanse and sanctify my heart and soul.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Then again He (God) is taught.

अन्वय:

O Lord ! Thou Whose ears hear all things, listen quickly to my invocation, hold in Thy heart my praise, keep near to thee, as it were (the words of a friend.)

भावार्थभाषाः - Men should know this One God and pray to Him, because He being Omnipotent, listens to what we pray. He the Innermost Spirit and Purifier of the soul is Friendly to all.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जो सर्वज्ञ, जीवांच्या व्यवहारांना यथायोग्य श्रवण करणारा, सर्वाधार, अंतर्यामी जीव व अंतःकरणाची यथायोग्य शुद्धी करणारा व सर्व माणसांचा मित्र आहे. त्या ईश्वराला माणसांनी जाणावे किंवा त्याचीच प्रार्थना करावी. ॥ ९ ॥