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अवी॑वृधद्वो अमृता॒ अम॑न्दीदेक॒द्यूर्दे॑वा उ॒त याश्च॑ देवीः । तस्मा॑ उ॒ राध॑: कृणुत प्रश॒स्तं प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥

English Transliteration

avīvṛdhad vo amṛtā amandīd ekadyūr devā uta yāś ca devīḥ | tasmā u rādhaḥ kṛṇuta praśastam prātar makṣū dhiyāvasur jagamyāt ||

Pad Path

अवी॑वृधत् । वः॒ । अ॒मृ॒ताः॒ । अम॑न्दीत् । ए॒क॒ऽद्यूः । दे॒वाः॒ । उ॒त । याः । च॒ । दे॒वीः॒ । तस्मै॑ । ऊँ॒ इति॑ । राधः॑ । कृ॒णु॒त॒ । प्र॒ऽश॒स्तम् । प्रा॒तः । म॒क्षु । धि॒याऽव॑सुः । ज॒ग॒म्या॒त् ॥ ८.८०.१०

Rigveda » Mandal:8» Sukta:80» Mantra:10 | Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:36» Mantra:5 | Mandal:8» Anuvak:8» Mantra:10


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SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे इन्द्र ! हम लोगों को शुभकर्मों में (दृह्यस्व) दृढ़ कर, क्योंकि तू (पूः+असि) भक्तों के मनोरथ का पूरक है और (निष्कृतम्) सबके भाग्य को स्थिर करनेवाले (ते) तेरी ओर हम लोगों की (इयं+ऋत्वियावती) यह सामयिक (धीः) स्तुति प्रार्थना और शुभकृपा (एति) जाती है ॥७॥
Connotation: - यह स्वाभाविक बात है कि जीवों का झुकाव उस परमात्मा की ओर है, इसलिये प्रत्येक विद्वान् का समग्र शुभकर्म उसी की ओर और उसी के उद्देश्य से होता है ॥७॥
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SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे इन्द्र ! त्वम्। अस्मान् शुभकर्मसु। दृह्यस्व=दृढीकुरु। त्वं पूः=मनोरथानां पुरकोऽसि। निष्कृतम्=निष्कर्त्तारम्। ते=त्वाम्। इयं+भद्रा=कल्याणी। ऋत्वियावती= समयानुकूला। धीः=अस्माकं स्तुतिः। एति=प्राप्नोति ॥७॥