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यु॒क्ष्वा हि दे॑व॒हूत॑माँ॒ अश्वाँ॑ अग्ने र॒थीरि॑व । नि होता॑ पू॒र्व्यः स॑दः ॥

English Transliteration

yukṣvā hi devahūtamām̐ aśvām̐ agne rathīr iva | ni hotā pūrvyaḥ sadaḥ ||

Pad Path

यु॒क्ष्व । हि । दे॒व॒ऽहूत॑मान् । अश्वा॑न् । अ॒ग्ने॒ । र॒थीःऽइ॑व । नि । होता॑ । पू॒र्व्यः॑ । स॒दः॒ ॥ ८.७५.१

Rigveda » Mandal:8» Sukta:75» Mantra:1 | Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:24» Mantra:1 | Mandal:8» Anuvak:8» Mantra:1


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SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - (अहम्) मैं उपासक (आर्क्षे) सामान्यतया मनुष्य के निमित्त (श्रुतर्वणि) श्रोतृजनों के निमित्त और (मदच्युति) मनुष्यजाति में आनन्द की वर्षा के लिये (हुवानः) ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूँ और मनुष्यमात्र के जो (स्तुकाविनाम्) ज्ञानविज्ञानसहित (चतुर्णाम्) नयन, कर्ण, घ्राण और रसना ये चारों ज्ञानेन्द्रिय हैं, उनके (शीर्षा) शिर (शर्धांसि+इव) परम बलिष्ठ होवें और (मृक्षा) शुद्ध और पवित्र होवें ॥१३॥
Connotation: - अहम्=इस पद से केवल एक ऋषि का बोध नहीं, किन्तु जो कोई ईश्वर से प्रार्थना करे, उस सबके लिये अहम् पद आया है। इसका आशय यह है कि प्रत्येक ज्ञानी जन अपनी जाति के कल्याण के लिये ईश्वर से प्रार्थना करे, जिससे मनुष्यमात्र के ज्ञानेन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति के लिये चेष्टा करें ॥१३॥
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SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - अहमुपासकः। आर्क्षे=सामान्येन सर्वेषां मनुष्याणां निमित्ते। श्रुतर्वणि=श्रोतॄणां निमित्ते। मदच्युति=आनन्दानां च्योतनाय। हुवानः=परमात्मानं स्तुवन्नस्मि। स्तुकाविनां= विज्ञानादिसहितानाम्। चतुर्णाम्=चक्षुरादीनाम्। शीर्षा=शिरांसि। शर्धांसि इव=बलवन्ति इव भवन्तु। तथा मृक्षा=शुद्धानि भवन्तु ॥१३॥