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यजि॑ष्ठं त्वा ववृमहे दे॒वं दे॑व॒त्रा होता॑र॒मम॑र्त्यम् । अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म् ॥

English Transliteration

yajiṣṭhaṁ tvā vavṛmahe devaṁ devatrā hotāram amartyam | asya yajñasya sukratum ||

Pad Path

यजि॑ष्ठम् । त्वा॒ । व॒वृ॒म॒हे॒ । दे॒वम् । दे॒व॒ऽत्रा । होता॑रम् । अम॑र्त्यम् । अ॒स्य । य॒ज्ञस्य॑ । सु॒ऽक्रतु॑म् ॥ ८.१९.३

Rigveda » Mandal:8» Sukta:19» Mantra:3 | Ashtak:6» Adhyay:1» Varga:29» Mantra:3 | Mandal:8» Anuvak:3» Mantra:3


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SHIV SHANKAR SHARMA

ईश की स्तुति दिखलाते हैं।

Word-Meaning: - हे परमदेव ! (त्वा) तुझे ही हम सब (ववृमहे) स्वीकार करते हैं। तुझको ही परमपूज्य समझते हैं, जो तू (यजिष्ठम्) परम यजनीय=पूजनीय है। (देवम्) तू ही सर्वगुणसम्पन्न है (देवत्रा) सूर्य्य, अग्नि, वायु आदि देवों में तू ही (अमर्त्यम्) मरणधर्मी है अर्थात् सूर्य्यादि सब देव मनुष्यवत् मरनेवाले हैं। एक तू ही शाश्वत अनादि अमर्त्य है। तू ही (अस्य) इस दृश्यमान (यज्ञस्य) संसाररूप यज्ञ का (सुक्रतुम्) सुकर्ता है। ऐसे तुझको ही हम मनुष्य पूजें, ऐसी बुद्धि दे ॥३॥
Connotation: - हम मनुष्य केवल ईश्वर की ही उपासना पूजा करें, क्योंकि वही एक पूजनीय है ॥३॥
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! (यजिष्ठम्) अत्यन्त पूजनीय (देवत्रा, देवम्) देवों में भी देव (होतारम्) यज्ञप्रेरक (अमर्त्यम्) मृत्युरहित, विकाररहित (अस्य, यज्ञस्य, क्रतुम्) इस ब्रह्माण्डरूप यज्ञ के करनेवाले (त्वा) आपको (ववृमहे) वरण करते हैं ॥३॥
Connotation: - पूर्व मन्त्र में परमात्मा को स्तुति द्वारा वरण करना वर्णन किया है, अब इस मन्त्र में वरण का हेतु दिखलाया है कि जो परमात्मा सबसे बड़े इस ब्रह्माण्डरूप यज्ञ का प्रवर्तक तथा स्थितिकर्ता है और मृत्युरहित होने से सर्वदा सहायक है तथा सब देवों का भी देवता है, उसीका रक्षार्थ वरण करना उचित है, क्योंकि अन्य साधारणजन अधिक से अधिक एक जन्म का सहायक हो सकता है और वह अनेक जन्म-जन्मान्तरों का सहायक है, अतएव मनुष्य मात्र उसी का वरण कर उसी की स्तुति तथा उपासना में तत्पर हों ॥३॥
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SHIV SHANKAR SHARMA

ईशस्तुतिं दर्शयति।

Word-Meaning: - हे परमदेव ! वयं त्वा=त्वामेव। ववृमहे=वृणीमहे। पूज्यत्वेन त्वामेव स्वीकुर्मः। कीदृशम्। यजिष्ठम्=यतस्त्वमेव यजनीयतमोऽसि। देवम्=सर्वगुणसम्पन्नम्। पुनः। देवत्रा=सूर्य्याग्निवायुप्रभृतिषु। अमर्त्यम्। इमे सर्वे सूर्य्यादयो मनुष्या इव मरणधर्माणो विनश्वराः सन्ति। त्वमेक एवाविनश्वरः शाश्वतः पुराणोऽसि। पुनः। होतारम्=जीवनदातारम्। अस्य=संसारलक्षणस्य यज्ञस्य। सुक्रतुम्=शोभनकर्त्तारम् ॥३॥
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! (यजिष्ठम्) इष्टतमम् (देवत्रा, देवम्) देवेषु देवम् (होतारम्) यज्ञकर्तारम् (अमर्त्यम्) अव्ययम् (अस्य, यज्ञस्य, क्रतुम्) अस्य ब्रह्माण्डयज्ञस्य कर्त्तारम् (त्वा) त्वाम् (ववृमहे) वृणुमः ॥३॥