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आ यत्सा॒कं य॒शसो॑ वावशा॒नाः सर॑स्वती स॒प्तथी॒ सिन्धु॑माता। याः सु॒ष्वय॑न्त सु॒दुघाः॑ सुधा॒रा अ॒भि स्वेन॒ पय॑सा॒ पीप्या॑नाः ॥६॥

English Transliteration

ā yat sākaṁ yaśaso vāvaśānāḥ sarasvatī saptathī sindhumātā | yāḥ suṣvayanta sudughāḥ sudhārā abhi svena payasā pīpyānāḥ ||

Pad Path

आ। यत्। सा॒कम्। य॒शसः॑। वा॒व॒शा॒नाः। सर॑स्वती। स॒प्तथी॑। सिन्धु॑ऽमाता। याः। सु॒स्वय॑न्त। सु॒ऽदुघाः॑। सु॒ऽधा॒राः। अ॒भि। स्वेन॑। पय॑सा। पीप्या॑नाः ॥६॥

Rigveda » Mandal:7» Sukta:36» Mantra:6 | Ashtak:5» Adhyay:4» Varga:2» Mantra:1 | Mandal:7» Anuvak:3» Mantra:6


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर कैसी स्त्रियाँ श्रेष्ठ होती हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे विद्वानो ! जिन की (सिन्धुमाता) नदियों का परिमाण करनेवाली सी (यत्) जो (सप्तथी) सातवीं (सरस्वती) उत्तम वाणी वर्त्तमान (याः) जो (स्वेन) अपने (पयसा) जल के (साकम्) साथ (पीप्यानाः) बढ़ती हुई नदियों के समान (सुदुघाः) सुन्दर कामों को पूरी करनेवाली (सुधाराः) सुन्दर धाराओं से युक्त (यशसः) कीर्त्ति की (वावशानाः) कामना करती हुई विदुषी स्त्री (अभि, आ, सुष्वयन्त) सब ओर से जाती हैं, वे निरन्तर मान करने योग्य होती हैं ॥६॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे छः अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रिय और मन के बीच कर्मेन्द्रिय वाणी सुन्दर शोभायुक्त है और जैसे जल से पूर्ण नदी शोभा पाती है, वैसे विद्या और सत्य की कामना करती हुई पूर्ण कामनावाली स्त्री श्रेष्ठ और मान करने योग्य हीती है ॥६॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः कीदृश्यः स्त्रियो वरा भवन्तीत्याह ॥

Anvay:

हे विद्वांसो ! यासां सिन्धुमातेव यद्या सप्तथी सरस्वती वर्तत्ते याः स्वेन पयसा साकं पीप्याना नद्य इव सुदुघाः सुधाराः यशसो वावशाना विदुष्यः स्त्रियोऽभ्यासुष्वयन्त ताः सततं माननीया भवन्ति ॥६॥

Word-Meaning: - (आ) (यत्) याः (साकम्) सह (यशसः) कीर्तेः (वावशानाः) कामयमानाः (सरस्वती) उत्तमा वाणी (सप्तथी) सप्तमी। अत्र वा छन्दःसीति मस्य स्थाने थः। (सिन्धुमाता) सिन्धूनां नदीनां परिमाणकर्त्री (याः) (सुष्वयन्त) गच्छन्ति (सुदुघाः) सुष्ठु कामान् पूरयित्र्यः (सुधाराः) शोभना धारा यासां ताः (अभि) (स्वेन) स्वकीयेन (पयसा) उदकेन। पय इत्युदकनाम। (निघं०१.१२)। (पीप्यानाः) वर्धमानाः ॥६॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे पुरुषाः ! यथा षण्णां ज्ञानेन्द्रियमनसां मध्ये कर्मेन्द्रियं वाक् सुशोभिता वर्तते यथा जलेन पूर्णा नद्यः शोभन्ते तथा विद्यासत्ये कामयमाना अलंकामाः सत्यवाचः स्त्रियः श्रेष्ठा माननीयाश्च भवन्तीति विजानीत ॥६॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसे सहा अर्थात पाच ज्ञानेंद्रिये व मन यांच्यामध्ये कर्मेन्द्रिय वाणी शोभून दिसते व जसे जलाने पूर्ण नद्या शोभून दिसतात तसे विद्या व सत्याची कामना पूर्ण करणारी स्त्री श्रेष्ठ व मान देण्यायोग्य असते. ॥ ६ ॥