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यो नः॒ सनु॑त्यो अभि॒दास॑दग्ने॒ यो अन्त॑रो मित्रमहो वनु॒ष्यात्। तम॒जरे॑भि॒र्वृष॑भि॒स्तव॒ स्वैस्तपा॑ तपिष्ठ॒ तप॑सा॒ तप॑स्वान् ॥४॥

English Transliteration

yo naḥ sanutyo abhidāsad agne yo antaro mitramaho vanuṣyāt | tam ajarebhir vṛṣabhis tava svais tapā tapiṣṭha tapasā tapasvān ||

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Pad Path

यः। नः॒। सनु॑त्यः। अ॒भि॒ऽदास॑त्। अ॒ग्ने॒। यः। अन्त॑रः। मि॒त्र॒ऽम॒हः॒। व॒नु॒ष्यात्। तम्। अ॒जरे॑भिः। वृष॑ऽभिः। तव॑। स्वैः। तप॑। त॒पि॒ष्ठ॒। तप॑सा। तप॑स्वान् ॥४॥

Rigveda » Mandal:6» Sukta:5» Mantra:4 | Ashtak:4» Adhyay:5» Varga:7» Mantra:4 | Mandal:6» Anuvak:1» Mantra:4


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे (तपिष्ठ) अत्यन्त तप करनेवाले और (मित्रमहः) बड़े मित्रों से युक्त (अग्ने) विद्वन् ! (यः) जो (सनुत्यः) निश्चित अन्तर्हित अर्थात् मध्य के सिद्धान्तों में प्रकट हुआ अथवा श्रेष्ठ (नः) हम लोगों का (अभिदासत्) चारों ओर से नाश करता है और (यः) जो (अन्तरः) भिन्न हम लोगों से (वनुष्यात्) याचना करे (तम्) उसको (अजरेभिः) वृद्धावस्था से रहित (वृषभिः) बलिष्ठ युवा (तव) आपके (स्वैः) अपने जनों के साथ (तपा) तपयुक्त करो वा तपस्वी होओ। और (तपसा) ब्रह्मचर्य और प्राणायामादि कर्म्म से (तपस्वान्) बहुत तपयुक्त हूजिये ॥४॥
Connotation: - हे मनुष्यो ! जो आप लोगों से याचना करे, उस सुपात्र के लिये यथाशक्ति दान करिये और जो पीड़ा देवे, उसको पीड़ित करो और तपस्वी होकर धर्म का ही आचरण करो ॥४॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनर्म्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥

Anvay:

हे तपिष्ठ मित्रमहोऽग्ने ! यः सनुत्यो नोऽभिदासद्योऽन्तरो नो वनुष्यात् तमजरेभिर्वृषभिस्तव स्वैः सह तपा तपसा तपस्वान् ॥४॥

Word-Meaning: - (यः) (न) अस्मान् (सनुत्यः) निर्णितान्तर्हितेषु सिद्धान्तेषु भवः साधुर्वा। सनुतरिति निर्णितान्तर्हितनाम। (निघं०३.२५) (अभिदासत्) अभिक्षियति (अग्ने) विद्वन् (यः) (अन्तरः) भिन्नः (मित्रमहः) महान्ति मित्राणि यस्य तत्सम्बुद्धौ (वनुष्यात्) याचेत (तम्) (अजरेभिः) जरारहितैः (वृषभिः) बलिष्ठैर्युवभिः (तव) (स्वैः) स्वकीयैः (तपा) तापय तपस्वी भव वा (तपिष्ठ) अतिशयेन तप्त (तपसा) ब्रह्मचर्य्यप्राणायामादिकर्म्मणा (तपस्वान्) बहुतपोयुक्तः ॥४॥
Connotation: - हे मनुष्या ! यो युष्मान् याचेत तस्मै सुपात्राय यथाशक्ति देयम्। यश्च पीडयेत्तं पीडयत तपस्विनो भूत्वा धर्म्ममेवाचरत ॥४॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - हे माणसांनो ! जो तुमची याचना करतो त्या सुपात्रासाठी यथाशक्ती दान द्या व जो त्रास देतो त्याला त्रास द्या. तपस्वी बनून धर्माचे आचरण करा. ॥ ४ ॥