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नू नो॑ अग्नेऽवृ॒केभिः॑ स्व॒स्ति वेषि॑ रा॒यः प॒थिभिः॒ पर्ष्यंहः॑। ता सू॒रिभ्यो॑ गृण॒ते रा॑सि सु॒म्नं मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीराः॑ ॥८॥

English Transliteration

nū no agne vṛkebhiḥ svasti veṣi rāyaḥ pathibhiḥ parṣy aṁhaḥ | tā sūribhyo gṛṇate rāsi sumnam madema śatahimāḥ suvīrāḥ ||

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Pad Path

नु। नः॒। अ॒ग्ने॒। अ॒वृ॒केभिः॑। स्व॒स्ति। वेषि॑। रा॒यः। प॒थिऽभिः। पर्षि॑। अंहः॑। ता। सूरिऽभ्यः॑। गृ॒ण॒ते। रा॒सि॒। सु॒म्नम्। मदे॑म। श॒तऽहि॑माः। सु॒ऽवीराः॑ ॥८॥

Rigveda » Mandal:6» Sukta:4» Mantra:8 | Ashtak:4» Adhyay:5» Varga:6» Mantra:3 | Mandal:6» Anuvak:1» Mantra:8


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अब विद्वानों के गुणों को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे (अग्ने) विद्वन् ! जो आप (अवृकेभिः) चोरों से भिन्न जनों के साथ (नः) हम लोगों को (स्वस्ति) सुख (वेषि) व्याप्त करते हो तथा (पथिभिः) उत्तम मार्गों से (रायः) धनों को (नू) शीघ्र (पर्षि) पालन करते हो और (सूरिभ्यः) विद्वानों के लिये और (गृणते) स्तुति करते हुए के लिये (सुम्नम्) सुख को (रासि) देते हो तथा (अंहः) अपराध को दूर करते हो उन आपके साथ (ता) उक्त पदार्थों को प्राप्त होकर (शतहिमाः) सौ वर्ष पर्य्यन्त (सुवीराः) श्रेष्ठ वीर हम लोग (मदेम) आनन्द करें ॥८॥
Connotation: - हे मनुष्यो ! चोरी और चोर के सङ्ग और अन्याय से पाप के आचरण का त्याग करके सुख को प्राप्त होकर सौ वर्ष युक्त होओ ॥८॥ इस सूक्त में अग्नि, ईश्वर और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह चौथा सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ ॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अथ विद्वद्गुणानाह ॥

Anvay:

हे अग्ने ! यस्त्वमवृकेभिर्नः स्वस्ति वेषि पथिभी रायो नू पर्षि सूरिभ्यो गृणते च सुम्नं रासि। अंहो दूरीकरोषि तेन सह ता प्राप्य शतहिमाः सुवीरा वयं मदेम ॥८॥

Word-Meaning: - (नू) सद्यः (नः) अस्मान् (अग्ने) विद्वन् (अवृकेभिः) अचोरैः सह (स्वस्ति) सुखम् (वेषि) व्याप्नोषि (रायः) धनानि (पथिभिः) सुमार्गैः (पर्षि) पालयसि (अंहः) अपराधम् (ता) तानि (सूरिभ्यः) विद्वद्भ्यः (गृणते) स्तुतिं कुर्वते (रासि) ददासि (सुम्नम्) सुखम् (मदेम) आनन्देम (शतहिमाः) यावच्छतं वर्षाणि तावत् (सुवीराः) शोभनाश्च ते वीराश्च ॥८॥
Connotation: - हे मनुष्याश्चौर्यं चोरसङ्गममन्यायात् पापाचरणं च विहाय सुखं प्राप्य शतायुषो भवेतेति ॥८॥ अत्राग्नीश्वरविद्वद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति चतुर्थं सूक्तं षष्ठो वर्गश्च समाप्तः ॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - हे माणसांनो! चोरी, चोरांचा संग व अन्यायाने केलेले पापाचरण यांचा त्याग करून सुख प्राप्त करून शंभर वर्षे जगा. ॥ ८ ॥