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स नो॑ वि॒भावा॑ च॒क्षणि॒र्न वस्तो॑र॒ग्निर्व॒न्दारु॒ वेद्य॒श्चनो॑ धात्। वि॒श्वायु॒र्यो अ॒मृतो॒ मर्त्ये॑षूष॒र्भुद्भूदति॑थिर्जा॒तवे॑दाः ॥२॥

English Transliteration

sa no vibhāvā cakṣaṇir na vastor agnir vandāru vedyaś cano dhāt | viśvāyur yo amṛto martyeṣūṣarbhud bhūd atithir jātavedāḥ ||

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Pad Path

सः। नः॒। वि॒भाऽवा॑। च॒क्षणिः॑। न। वस्तोः॑। अ॒ग्निः। व॒न्दारु॑। वेद्यः॑। चनः॑। धा॒त्। वि॒श्वऽआ॑युः। यः। अ॒मृतः॑। मर्त्ये॑षु। उ॒षः॒ऽभुत्। भूत्। अति॑थिः। जा॒तऽवे॑दाः ॥२॥

Rigveda » Mandal:6» Sukta:4» Mantra:2 | Ashtak:4» Adhyay:5» Varga:5» Mantra:2 | Mandal:6» Anuvak:1» Mantra:2


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर जगदीश्वर कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! (यः) जो (वस्तोः) दिन और (चक्षणिः) प्रकाशक सूर्य और (अग्निः) अग्नि के सदृश स्वयं प्रकाशयुक्त (न) जैसे वैसे (नः) हम लोगों के बीच (विभावा) अत्यन्त प्रकाशवाला और (वेद्यः) जानने योग्य (विश्वायुः) पूर्णावस्थावाला (मर्त्येषु) मरणधर्मयुक्त मनुष्यों में (अमृतः) नाशरहित और (उषर्भुत्) प्रातःकाल में जाना जाता है ऐसा और (अतिथिः) जिसके प्राप्त होने की कोई तिथि विद्यमान नहीं उसके समान वर्त्तमान और (जातवेदाः) उत्पन्न हुओं में विद्यमान वा उत्पन्न हुए पदार्थों को जाननेवाला (वन्दारु) प्रशंसा करने योग्य (चनः) अन्न आदि को (धात्) धारण करता है (सः) वह परमेश्वर हम लोगों का मङ्गल करनेवाला (भूत्) हो ॥२॥
Connotation: - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर सूर्य्य के सदृश अपने से प्रकाशित, जानने योग्य, अजर, अमर, अतिथि के सदृश सत्कार करने योग्य और सर्वत्र व्याप्त है, उसकी सब उपासना करें ॥२॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनर्जगदीश्वरः कीदृशोऽस्तीत्याह ॥

Anvay:

हे मनुष्या ! यो वस्तोश्चक्षणिरग्निर्न नो विभावो वेद्यो विश्वायुर्मर्त्येष्वमृत उषर्भुदतिथिरिव जातवेदा वन्दारु चनो धात्स नो मङ्गलकरो भूत् ॥२॥

Word-Meaning: - (सः) परमेश्वरः (नः) अस्माकम् (विभावा) विशेषभानवान् (चक्षणिः) प्रकाशकः सूर्यः (न) इव (वस्तोः) दिनम् (अग्निः) पावक इव स्वप्रकाशः (वन्दारु) प्रशंसनीयम् (वेद्यः) वेदितुं योग्यः (चनः) अन्नादिकम् (धात्) दधाति (विश्वायुः) पूर्णायुः (यः) (अमृतः) नाशरहितः (मर्त्येषु) मरणधर्मेषु (उषर्भुत्) य उषसि बुध्यते (भूत्) भवेत् (अतिथिः) अविद्यमानतिथिः (जातवेदाः) यो जातेषु विद्यते जातान् सर्वान् वेत्ति वा ॥२॥
Connotation: - अत्रोपमालङ्कारः । हे मनुष्या ! यो जगदीश्वरः सूर्य्यवत्स्वप्रकाशो वेदितुं योग्योऽजरामरोऽतिथिरिव सत्कर्त्तव्यः सर्वत्र व्याप्तोऽस्ति तं सर्वे उपासीरन् ॥२॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - या मंत्रात उपमालंकार आहे. हे माणसांनो, जो जगदीश्वर सूर्याप्रमाणे स्वप्रकाशित, जाणण्यायोग्य, अजर, अमर, अतिथीप्रमाणे सत्कार करण्यायोग्य व सर्वत्र व्याप्त आहे त्याचीच उपासना करा. ॥ २ ॥