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आ॒स॒स्रा॒णासः॑ शवसा॒नमच्छेन्द्रं॑ सुच॒क्रे र॒थ्या॑सो॒ अश्वाः॑। अ॒भि श्रव॒ ऋज्य॑न्तो वहेयु॒र्नू चि॒न्नु वा॒योर॒मृतं॒ वि द॑स्येत् ॥३॥

English Transliteration

āsasrāṇāsaḥ śavasānam acchendraṁ sucakre rathyāso aśvāḥ | abhi śrava ṛjyanto vaheyur nū cin nu vāyor amṛtaṁ vi dasyet ||

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Pad Path

आ॒स॒स्रा॒णासः॑। श॒व॒सा॒नम्। अच्छ॑। इन्द्र॑म्। सु॒ऽच॒क्रे। र॒थ्या॑सः। अश्वाः॑। अ॒भि। श्रवः॑। ऋज्य॑न्तः। व॒हे॒युः॒। नु। चि॒त्। नु। वा॒योः। अ॒मृत॑म्। वि। द॒स्ये॒त् ॥३॥

Rigveda » Mandal:6» Sukta:37» Mantra:3 | Ashtak:4» Adhyay:7» Varga:9» Mantra:3 | Mandal:6» Anuvak:3» Mantra:3


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर मनुष्या क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - जो (आसस्राणासः) चारों ओर से गमन करनेवाले (रथ्यासः) वाहनों में श्रेष्ठ (अश्वाः) घोड़े जैसे वैसे (अभि, श्रवः) चारों ओर से सुननेवाले (ऋज्यन्तः) सरल के समान आचरण करते हुए विद्वान् जन (शवसानम्) बलयुक्त (इन्द्रम्) राजा को (नू) शीघ्र (वहेयुः) प्राप्त होवें और जो (चित्) भी इन को (अच्छ) अच्छे प्रकार (सुचक्रे) सुन्दर करता है वह (वायोः) पवन के (अमृतम्) नाशरहित स्वरूप को प्राप्त होकर दुखों की (नु) शीघ्र ही (वि, दस्येत्) उपेक्षा करे ॥३॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे प्रजाजनो ! जैसे राजा आप लोगों की वृद्धि करे, वैसे आप लोग भी इसकी वृद्धि करिये और सब योगाभ्यास करके प्राणों में वर्त्तमान परमात्मा को जान कर दुःखों का नाश करो ॥३॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनर्मनुष्याः किं कुर्युरित्याह ॥

Anvay:

य आसस्राणासः रथ्यासोऽश्वा इवाऽभि श्रव ऋज्यन्तो विद्वांसः शवसानमिन्द्रन्नू वहेयुर्यश्चिदेतानच्छ सुचक्रे स वायोरमृतं प्राप्य दुःखानि नु वि दस्येत् ॥३॥

Word-Meaning: - (आसस्राणासः) समन्ताद्गतिमन्तः (शवसानम्) बलवन्तम् (अच्छ) (इन्द्रम्) राजानम् (सुचक्रे) शोभनं करोति (रथ्यासः) रथेषु साधवः (अश्वाः) तुरङ्गाः (अभि) सर्वतः (श्रवः) ये शृण्वन्ति ते (ऋज्यन्तः) ऋजुरिवाचरन्तः (वहेयुः) प्राप्नुवन्तु (नू) सद्यः। अत्र ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (चित्) अपि (नु) क्षिप्रम् (वायोः) पवनस्य (अमृतस्य) नाशरहितं स्वरूपम् (वि) (दस्येत्) उपक्षाययेत् ॥३॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे प्रजाजना ! यथा राजा युष्मान् वर्धयेत्तथा यूयमप्येनं वर्धयत, सर्वे योगाभ्यासं कृत्वा प्राणस्थं परमात्मानं विदित्वा दुःखानि दहन्तु ॥३॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे प्रजाजनांनो ! जसा राजा तुमची वृद्धी करतो तशी तुम्हीही त्याची वृद्धी करा. सर्वांनी योगाभ्यास करून प्राणांमध्ये असलेल्या परमात्म्याला जाणून दुःखांचा नाश करा. ॥ ३ ॥