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न॒हि नु ते॑ महि॒मनः॑ समस्य॒ न म॑घवन्मघव॒त्त्वस्य॑ वि॒द्म। न राध॑सोराधसो॒ नूत॑न॒स्येन्द्र॒ नकि॑र्ददृश इन्द्रि॒यं ते॑ ॥३॥

English Transliteration

nahi nu te mahimanaḥ samasya na maghavan maghavattvasya vidma | na rādhaso-rādhaso nūtanasyendra nakir dadṛśa indriyaṁ te ||

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Pad Path

न॒हि। नु। ते॒। म॒हि॒मनः॑। स॒म॒स्य॒। न। म॒घ॒ऽव॒न्। म॒घ॒व॒त्ऽत्वस्य॑। वि॒द्म। न। राध॑सःऽराधसः। नूत॑नस्य। इन्द्र॑। नकिः॑। द॒दृ॒शे॒। इ॒न्द्रि॒यम्। ते॒ ॥३॥

Rigveda » Mandal:6» Sukta:27» Mantra:3 | Ashtak:4» Adhyay:6» Varga:23» Mantra:3 | Mandal:6» Anuvak:3» Mantra:3


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर मनुष्यों को किसका ध्यान करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे (मघवन्) न्याय से इकट्ठे किये हुए धन से युक्त (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले ! जिन (ते) आपकी (महिमनः) महिमा का और (समस्य) तुल्यता का कोई (नु) भी (नहि) नहीं (ददृशे) देखा जाता है तथा हम लोग (मघवत्त्वस्य) बहुत धन से युक्तपने के तुल्य कुछ भी (न) नहीं (विद्म) जानें और (नूतनस्य) नवीन (राधसोराधसः) धन-धन के तुल्य (नकिः) नहीं देखा जाता है और (ते) आपका (इन्द्रियम्) इन्द्रिय (न) नहीं देखा जाता है, उनकी उपासना को हम लोग करें ॥३॥
Connotation: - हे मनुष्यो ! जिसकी महिमा के समान महिमा, ऐश्वर्यसामर्थ्य के समान सामर्थ्य और स्वरूप नहीं विद्यमान है, उसी सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, जगदीश्वर का निरन्तर ध्यान करो ॥३॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनर्मनुष्यैः किं ध्येयमित्याह ॥

Anvay:

हे मघवन्निन्द्र ! यस्य ते महिमनः समस्य कश्चिन्नु नहि ददृशे वयं मघवत्त्वस्य तुल्यं किंचिदपि न विद्म नूतनस्य राधसोराधसः समः नकिर्ददृशे ते तवेन्द्रियं न ददृशे तस्योपासनं वयं कुर्वीमहि ॥३॥

Word-Meaning: - (नहि) (नु) (ते) (महिमनः) (समस्य) तुल्यस्य (न) (मघवन्) न्यायोपार्जितधनयुक्त (मघवत्त्वस्य) बहुधनयुक्तानां भावस्य (विद्म) विजानीयाम (न) (राधसोराधसः) धनस्यधनस्य (नूतनस्य) नवीनस्य (इन्द्र) परमैश्वर्यप्रदेश्वर (नकिः) (ददृशे) दृश्यते (इन्द्रियम्) (ते) तव ॥३॥
Connotation: - हे मनुष्या ! यस्य महिम्नः समो महिमैश्वर्यसामर्थ्येन समं सामर्थ्यमाकृतिश्च न विद्यते तमेव सर्वव्यापकं सर्वान्तर्यामिनं जगदीश्वरं सततं ध्यायत ॥३॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - हे माणसांनो ! ज्याच्या महानतेप्रमाणे महानता नाही व ऐश्वर्य सामर्थ्याप्रमाणे सामर्थ्य व स्वरूप विद्यमान नाही त्याच सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी जगदीश्वराचे निरंतर ध्यान करा. ॥ ३ ॥