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यू॒यम॒स्मान्न॑यत॒ वस्यो॒ अच्छा॒ निरं॑ह॒तिभ्यो॑ मरुतो गृणा॒नाः। जु॒षध्वं॑ नो ह॒व्यदा॑तिं यजत्रा व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥१०॥

English Transliteration

yūyam asmān nayata vasyo acchā nir aṁhatibhyo maruto gṛṇānāḥ | juṣadhvaṁ no havyadātiṁ yajatrā vayaṁ syāma patayo rayīṇām ||

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Pad Path

यू॒यम्। अ॒स्मान्। न॒य॒त॒। वस्यः॑। अच्छ॑। निः। अं॒ह॒तिऽभ्यः॑। म॒रु॒तः॒। गृ॒णा॒नाः। जु॒षध्व॑म्। नः॒। ह॒व्यऽदा॑तिम्। य॒ज॒त्राः॒। व॒यम्। स्या॒म॒। पत॑यः। र॒यी॒णाम् ॥१०॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:55» Mantra:10 | Ashtak:4» Adhyay:3» Varga:18» Mantra:5 | Mandal:5» Anuvak:4» Mantra:10


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे (गृणानाः) स्तुति करते हुए (मरुतः) विद्वान् मनुष्यो ! (यूयम्) आप लोग (वस्यः) अति धन से युक्त (अस्मान्) हम लोगों की रक्षा कीजिये और (अंहतिभ्यः) मारते हैं जिनसे उन अस्त्रों से पृथक् (अच्छा) उत्तम प्रकार (निः, नयत) निरन्तर पहुँचाइये और (नः) हम लोगों की (जुषध्वम्) सेवा करिये। और हे (यजत्राः) मिलनेवाले जनो ! हम लोगों के लिये (हव्यदातिम्) देने योग्य दान को प्राप्त कराइये जिससे (वयम्) हम लोग (रयीणाम्) धनों के (पतयः) पालन करनेवाले (स्याम) होवें ॥१०॥
Connotation: - जिज्ञासुजन विद्वानों की प्रार्थना इस प्रकार करें कि आप लोग हम लोगों को दुष्ट आचरण से अलग करके धर्मयुक्त मार्ग को प्राप्त कराइये ॥१०॥ इस सूक्त में मरुत नाम से विद्वान् आदि के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह पचपनवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

Anvay:

हे गृणाना मरुतो ! यूयं वस्योऽस्मान् रक्षतांहतिभ्यः पृथगच्छा निर्नयत नोऽस्मान् जुषध्वम्। हे यजत्रा ! नो हव्यदातिं नयत यतो वयं रयीणां पतयः स्याम ॥१०॥

Word-Meaning: - (यूयम्) (अस्मान्) (नयत) (वस्यः) वसीयसोऽतिधनाढ्यान् (अच्छा) अत्र संहितायामिति दीर्घः। (निः) नितराम् (अंहतिभ्यः) (मरुतः) विद्वांसो मनुष्याः (गृणानाः) स्तुवन्तः (जुषध्वम्) सेवध्वम् (नः) अस्मान् (हव्यदातिम्) दातव्यदानम् (यजत्राः) सङ्गन्तारः (वयम्) (स्याम) भवेम (पतयः) पालकाः (रयीणाम्) धनानाम् ॥१०॥
Connotation: - जिज्ञासवो विदुषां प्रार्थनामेवं कुर्युर्भवन्तोऽस्मान् दुष्टाचारात् पृथक्कृत्य धर्म्यं पन्थानं प्रापयन्तु ॥१०॥ अत्र मरुद्विद्वदादिगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति पञ्चपञ्चाशत्तमं सूक्तमष्टादशो वर्गश्च समाप्तः ॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - जिज्ञासू लोकांनी विद्वान लोकांना अशी प्रार्थना करावी की, आम्हाला दुष्टाचरणापासून दूर करून धर्ममार्गाने न्या. ॥ १० ॥